योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1560, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
बोला, हे मुनीश्वर ! बड़ा आश्चर्य है, जो तुम कहते हो कि स्वप्न में मुझको उमत्तपा ने उपदेश किया था और फिर जाग्रत में कहते हो कि यह बैठा है । यह तुम्हारी बात कैसे मानिये ? जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करे और कहे कि यह प्रत्यक्ष बैठा है, तो जैसे वह स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही यह तुम्हारा कहना स्पष्ट समझ में नहीं आता । यह अपूर्व बात सुनकर मुझे संशय हुआ है, उसे तुम दूर करो । मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! यह बात अवश्य ही आश्चर्य उपजानेवाली है । परन्तु जैसे यह वृत्तान्त हुआ है, वह संक्षेप से तुमसे कहता हूँ, सुनो ! जब उमत्तपा ने मुझको उपदेश किया, तब मैंने कहा, हे भगवन् ! तुम यहाँ विश्राम करो और जिस प्रकार मैं रहता हूँ, वैसे ही तुम भी रहो । तब मैं वहाँ रहने लगा । उनका उपदेश पाकर मैंने विचारा कि यह जगत् मिथ्या है, मेरा शरीर भी मिथ्या है तो इसके सुख के लिए मैं क्यों यत्न करता हूँ ? इन्द्रियाँ तो ऐसी हैं, जैसे सर्प होते हैं । इनको सेवनेवाला संसाररूप बन्धन से कभी मुक्त नहीं होता । मेरे जीने को धिक्कार है । जो इन इन्द्रियों के सुख की कामना करते हैं वे मूर्ख हैं । वे मृग की नाईं मरुस्थल में जल-पान करने के लिए दौड़ते और थक जाते हैं, पर तृप्ति कभी न होंगे । मैं अविद्या के कारण सुख के निमित्त यत्न करता था, पर इनसे तृप्ति कभी नहीं होती ।
हे बधिक ! ममता के रूप बान्धव ही पैरों की जंजीर और अन्धकूप में गिरने का कारण है । इनसे बँधा हुआ मैं इन्द्रियों के विषयरूपी कूप में गिरा था । अब मैंने विचार किया है कि बन्धन का कारण कुटुम्ब है, उसको मैं त्याग दूँ । फिर विचार किया कि जब तक अविद्या को नष्ट न करूँ, इनके त्याग में भी सुख नहीं प्राप्त होगा । हे बधिक ! ऐसे विचारकर मैं गुरु के पास गया । मन में विचारा कि जगत् भ्रममात्र है और गुरु भी स्वप्नमात्र है, इनसे क्या प्राप्त होगा ? फिर विचारा कि नहीं ये ज्ञानवान् पुरुष हैं और इनको 'अहंभ्रम' का निश्चय है, इससे ये ब्रह्मस्वरूप और कल्याणमूर्ति हैं । इनसे जाकर प्रश्न करूँ । तब