योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1561, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७५७
मैंने जाकर उनको प्रणाम किया और कहा, हे भगवन् ! उस अपने शरीर को देख आऊँ और इसके शरीर को भी देखूँ कि कहाँ है। इस जगत् का विराट्पुरुष है। हे वधिक ! जब इस प्रकार मैंने कहा, तब ऋषि ने हँसकर मुझसे कहा, हे ब्राह्मण ! अब वह तेरा शरीर कहाँ है ? वह शरीर तो दूर गया । अब उसे कहाँ देखेगा ? यह तू आपही जानेगा । तब मैंने हाथ जोड़कर ऋषि से कहा, हे ऋषीश्वर ! अब मैं जाता हूँ । मेरे लौटकर आने तक तुम यहीं बैठे रहना । हे वधिक ! ऐसे कहकर मैं आधिभौतिक देह के अभिमान को त्यागकर अन्त-वाहक शरीर से उड़ा । आकाशमार्ग उड़ता-उड़ता थक गया, परन्तु वह शरीर कहीं न पाया। तब मैं फिर ऋषि के पास आया और कहा, हे पूर्वापर और भूत-अविष्य के जाननेवाले ! वे दोनों शरीर कहाँ गये ? न इस सृष्टि के विराट् का शरीर दिखता है, जिसके मार्ग से मैं आया था और न अपना ही शरीर दिखता है ? हे संशयरूपी अन्धकार के नाशकर्ता सूर्य ! आप इसका कारण बताइये ।
उग्रतपा बोले, हे कमलनयन, तपरूपी कमल वन के सूर्य ज्ञानरूपी कमल के धारण करनेवाले विष्णु की नाभि और आनन्दरूपी कमल की खान ! तुम सब कुछ जानते हो और आत्मपद में जागे हो ! तुम तो योगी-श्वर हो । ध्यान करके देखो, जिसमें सब वृत्तान्त तुमको देख पड़े । हे मुनीश्वर ! यह जगत् असत्यरूप है। इसमें कोई वस्तु स्थिर नहीं। विचार कर देखो, जिसमें शरीर की अवस्था तुमको देख पड़े । और जो मुझसे पूछते हो तो मैं कहता हूँ । हे मुनीश्वर ! जिस वन में तुम रहते थे और जहाँ तुम्हारे शरीर थे, उस वन में एक समय अग्नि लगी और सब प्रकार के वृक्ष और बेलें जल गईं । जल भी अग्नि से खौलने लगा और वनचारी पशु-पक्षी सब जल गये और महाकष्ट को प्राप्त हुए । उन्हीं के साथ तुम्हारा शरीर भी जल गया और कुटी भी जल गई । मुनी-श्वर बोले, हे भगवन् ! उस अग्नि से जो सम्पूर्ण वन जल गया तो उसका कारण कौन था ? उग्रतपा बोले हे मुनीश्वर ! यह जगत्, जिसमें हम और तुम बैठे हैं, इसी का विराट् है । जिसके शरीर में तुमने