योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1562, कुल 1734 में से
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प्रवेश किया था और जिसमें उसका और तुम्हारा समाधिवाला शरीर है, उसका विराट् और है—वह सृष्टि उस विराट् का शरीर है । हे मुनीश्वर ! उस विराट् के शरीर में क्षोभ होने के कारण अग्नि उत्पन्न हुई और शरीर, वृक्ष इत्यादि सब जल गये । इस सृष्टि के विराट् का नाम ब्रह्मा है । उस ब्रह्मा का विराट् और है । उसका विराट् आत्मा है, जो सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें कुछ और नहीं बना । जिस पुरुष को उसका प्रमाद है, उसको उपद्रव और कारण-कार्यरूप पदार्थ भासित होते हैं । उससे वह कर्मों के अनुसार दुःख-सुख भोगता है । और जिसको स्वरूप का साक्षात्कार हुआ है, उसको जगत् आत्मा दिखता है, अर्थात् सब ओर से ब्रह्म भासित होता है ।
हे मुनीश्वर ! जब इस प्रकार वन के सब पशु-पक्षी जले, तब तुम्हारी कुटी में भी आग लगी । इससे वह कुटी और तुम्हारा शरीर अग्नि से जल गया । जिसके शरीर में तुमने प्रवेश किया था, वह भी जल गया । तुम्हारा शिष्य और उसका ओज भी जल गया । तुम दोनों की संवित् आकाशरूप हो गई । वह अग्नि भी वन को जलाकर अन्तर्धान हो गई । जैसे अगस्त्य मुनि समुद्र का आचमन करके अन्तर्धान हो गये थे, वैसे ही वह अग्नि भी वन को जलाकर अन्तर्धान हो गई । अब तुम्हारे शरीर की राख भी नहीं रही । जैसे स्वप्नसृष्टि जाग्रत् में नहीं दिखाई देती, वैसे ही तुम्हारे शरीर अदृष्ट हो गये । हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् स्वप्नमात्र है । मैं तुम्हारे स्वप्न में हूँ और सब जगत् का अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है । वह सबका अपना रूप है, जगत् उसी का आभास है । जैसे संकल्पसृष्टि, स्वप्ननगर और गन्धर्वनगर असत् होता है, वैसे ही यह जगत् भी है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् तुम्हारे स्वप्न में स्थित है । तुमको चिरकाल की प्रतीति से नाना प्रकार का जाग्रतरूप कारण-कार्य सत्य होकर भासित होता है । मुनीश्वर बोले, हे भगवन् ! जो यह स्वप्ननगर सत्य हो गया है, तो सभी स्वप्ननगर सत्य होंगे ? उग्रतपा बोले, हे मुनीश्वर ! प्रथम तुम सत्य को जानो कि सत्य क्या वस्तु है । यह जगत् जो