योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1563, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७५६
तुमको भासित होता है, वह सभी स्वप्ननगर है। इसमें कोई पदार्थ सत्य नहीं। इस जगत् को तुम समाधिवाले शरीर की अपेक्षा असत्य कहते हो, पर जिसको तुम जाग्रत् शरीर कहते हो उसे किसकी अपेक्षा असत्य कहोगे ? यह तो अदृष्टरूप है, इससे इसको स्वप्न जानो। जिस सत्ता में यह समाधिवाला शरीर भी स्वप्न है, उस सत्ता को जानो, तब तुमको सत्यपद की प्राप्ति होगी। जैसे यह जगत् आत्मसत्ता में आभास जगा है, वैसे ही वह भी है।
तुम जागकर देखो तो इसमें और उसमें कुछ भेद नहीं है। सब जगत् जो दिखता है, वह सब आत्मरूप रत्न का प्रकाश या चमत्कार है। जैसे सूर्य की किरणों में अनहोता ही जल भासित होता है, वैसे ही सब जगत् आत्मा में अनहोता दिखता है, और आत्मा के प्रमाद से सत्य प्रतीत होता है। तुम अपने स्वभाव में स्थित होकर देखो।
मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! उग्रतपा ऋषीश्वर रात्रि के समय इस प्रकार कहते हुए शय्या पर सो गये। जब कुछ काल में जागे, तब मैंने कहा कि हे भगवन् ! और वृत्तान्त मैं फिर पूछूँगा, प्रथम यह संशय दूर करो कि व्याध का गुरु तुमने मुझको किस निमित्त कहा। मैं तो व्याध को जानता भी नहीं ? उग्रतपा बोले, हे दीर्घतपस्वी ! ध्यान करके देखो, तुम तो सब कुछ जानते हो। जैसा वृत्तान्त है, उसको जानोगे। जो मुझसे पूछते हो तो मैं भी कहता हूँ। यह वृत्तान्त तो बड़ा है, पर मैं तुमको संक्षेप से बताता हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे देश में राजा के बान्धव और सब लोग अपना धर्म जब छोड़ देंगे, तब दुर्भिक्ष पड़ेगा और वर्षा न होगी। इससे लोग दुःख पावेंगे और मर-मर जावेंगे। तुम्हारे कुटुम्बी भी मरेंगे और कुटी भी नष्ट हो जायगी। वृक्ष सब फल, फूल से रहित होंगे। केवल तुम और मैं, दोनों वन में रह जावेंगे; क्योंकि हमको सुखदुःख की वासना नहीं है, हम विदितवेद हैं—विदित-वेद को दुःख कैसे हो ? हे मुनीश्वर ! कुछ समय तो इस प्रकार चेष्टा होगी। फिर कुटी के चौफेर फूल, फल, तमालवृक्ष, कल्पतरु, कमल-सरोवर आदि नाना प्रकार का सामग्री होगी। बड़ी सुगन्ध फैलेगी।