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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1564, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1564

७६० ✼ योगवाशिष्ठ ✼

मोर और कोकिला विराजेंगे और भौंरे कमल पर गुञ्जार करेंगे । निदान ऐसा विलास प्रकट होगा, मानो इन्द्र का नन्दनवन आकर लगा है । ऐसी बहार फिर होगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रात्रिसंवादो नाम द्विशताधिकाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३८ ॥

मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! उम्रतपा ऋषीश्वर ने मुझसे फिर कहा कि हे मुनीश्वर ? इस प्रकार वह वन होगा । तब तुम और मैं एक समय तप करने को उठेंगे । वहाँ एक व्याध मृग के पीछे दौड़ता तुम्हारी कुटी के निकट आवेगा । उसको तुम सुन्दर और पवित्र कथा उपदेश करोगे । उसमें स्वप्न का प्रसंग चलेगा ! उस प्रसंग में वह स्वप्न और जाग्रत् का वृत्तान्त पूछेगा । उससे तुम स्वप्न का प्रसंग कहोगे और उस स्वप्न के प्रसंग में परमार्थ का उपदेश करोगे, क्योंकि संत का स्वभाव यही है । तुम मेरे समागम का उपदेश करोगे । तुम्हारे वचनों को सुनकर वह पुरुष विरक्तचित्त होकर तप करेगा । उससे उसका अन्तःकरण निर्मल होगा और वह सत्यपद को प्राप्त होगा । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार होगा, यह मैंने तुमसे संक्षेप से कहा है । तुम भी ध्यान करके देखो । इसी कारण मैंने तुमको व्याध का गुरु कहा है । हे व्याध ! इस प्रकार जब उम्रतपा ने मुझसे कहा, तब मैं सुनकर विस्मित हुआ कि इन्होंने क्या कहा ? बड़ा आश्चर्य है, ईश्वर की नीति जानी नहीं जाती कि क्या होना है । हे वधिक ! इस प्रकार मेरी और उनकी चर्चा हुई । तब रात्रि व्यतीत हो गई और मैंने स्नान करके प्रीति बढ़ाने के निमित्त भली प्रकार उनकी सेवा की, तब वह वहाँ रहने लगे । फिर मैं विचार करने लगा कि यह जगत् क्या है, इसका कारण कौन है और मैं क्या हूँ । तब मैंने विचार किया कि यह जगत् अकारण है, किसी का बनाया नहीं । यह स्वप्नमात्र है । आत्मरूपी चन्द्रमा की जगतरूपी चाँदनी है; उसी का यह चमत्कार है । वही आत्मसत्ता घट, पट आदि आकार होकर भासित होती है, वास्तव में न कोई कर्म है, न क्रिया है, न कर्ता है, न मैं हूँ और न जगत् है । जो तू कहे कि