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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1565, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1565

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७६१

क्यों नहीं, सब अर्थ और ग्रहण-त्याग तो सिद्ध होते हैं, तो ग्रहण और त्याग पिण्ड से होता है और पिण्ड तत्त्वों से होता है। सो यह पिण्ड तो न किसी तत्त्व से बना है और न किसी माता-पिता से है। यह तो स्वप्न में प्रकट हुआ है तो इसका कारण किसे कहिये ?

और जो कहिये कि भ्रममात्र है, तो भ्रम का कारण कौन है ? और भ्रान्ति का द्रष्टा कौन है ? जिस शरीर से दिखता था, उसका द्रष्टारूप मैं तो भस्म हो गया। इससे जगत् और कुछ वस्तु नहीं; केवल आदि-अन्त से रहित आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वही मेरा स्वरूप है। वहाँ यह जगतरूप होकर भासित होता है, पर केवल ब्रह्मसत्ता स्थिर है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश आदि सब पदार्थ आत्मरूप है। जैसे समुद्र तरङ्गरूप होकर दिखता है, परन्तु कुछ और नहीं होता, वैसे ही आत्मा नाना प्रकार का होकर भासित होता है पर कुछ और नहीं होता, ब्रह्मसत्ता ही निराभास है। आभास भी कुछ हुआ नहीं, केवल चैतन्यसत्ता ऐसे रूप होकर दिखती है। हे वधिक ! इस प्रकार विचारकर मैं विगतज्वर होकर मुनीश्वर के वचनों से पर्वत की नाईं अपने स्वभाव में अटल स्थित हुआ। जो कुछ इष्ट-अनिष्ट पदार्थ प्राप्त होता, उसमें सम रहता था। अभिलाषा से रहित सब अपनी चेष्टाएँ करता था। अपने स्वभाव में स्थित रहता था। हे वधिक ! सुख भोगने के लिए न मुझको जीने की इच्छा है और न मरने की इच्छा है। न जीने में हर्ष है और न मरने में शोक है। मैं सदा आत्मपद में स्थित हूँ। मुझको कुछ संशय नहीं है। सम्पूर्ण संशय स्फुरण में है, सो स्फुरण मुझमें नहीं रहा, इसलिए संसार भी नहीं है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३६ ॥

मुनीश्वर बोले, हे व्याध ! इस प्रकार जब मैंने निर्णय किया, तब मेरे तीनों ताप नष्ट हो गये। मैं वीतराग होकर निःशङ्क हुआ। तब मुझको किसी पदार्थ की तृष्णा नहीं रही। मैं निरहंकार हुआ। अनात्मा में जो आत्मअभिमान था, वह निवृत्त होकर निर्वाण, निरा-