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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1566, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1566

७६२ योगवाशिष्ठ

धार और निराधेय हुआ। अपने स्वभाव में आत्मत्व स्थित होकर मैं सर्वात्मा हुआ। हे बधिक ! जो कुछ शरीर का प्रारब्ध है, उसमें मैं यथाशास्त्र विचरता हूँ; परन्तु कर्तृत्व का अभिमान नहीं है। जगत् मुझको आत्मरूप दिखता है। और तृष्णा करनेवाली मिथ्याबुद्धि का अभाव है। मैं जानता हूँ कि आभास कुछ वस्तु नहीं—चिदाकाश आत्मसत्ता अपने रूप में स्थित है। हे बधिक ! मुनीश्वर का कहा वृत्तान्त सत्य होता गया। तुम मेरे पास आये हो इसलिए जो कुछ उपदेश मैंने किया है; वह परम पावन और सबका सार है। जिस प्रकार जगत् के पदार्थ, तुम और मैं का जो वृत्तान्त है, वह मैंने तुमसे कहा। व्याध ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यदि इस प्रकार है तो तुम, मैं और ब्रह्मादिक भी सब स्वप्न के हुए। और असत्य ही सत्य की नाईं भासित होते हैं। मुनीश्वर बोले, हे व्याध ! तुम, मैं और ब्रह्मा से लेकर तृण तक सब स्वप्न के पदार्थ हैं। यह जगत् का सत्य है, न असत्य और न सत्यासत्य के मध्य है, न अनिर्वचनीय है, क्योंकि अनुभवरूप है। हे व्याध ! जो अनुभव से देखिये तो वही रूप है, और जो अनुभव से भिन्न कहिये तो है ही नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव में स्फुरती है, और जो अधिष्ठान की ओर देखिये तो वही रूप है। उससे भिन्न कहने में नहीं आता।

हे बधिक ! जैसे कोई नगर देखता है और वह दूर है, तो यदि याद करके देखिये तो दिखता है, परन्तु कुछ बना नहीं, स्मृतिमात्र है। वैसे ही सब पदार्थ संकल्पमात्र हैं, कुछ बने नहीं। अपने स्वभाव में स्थित होकर देख। तू तो बोधवान् है, मिथ्याभ्रम में पड़ा है ? हे व्याध ! मेरे उपदेश से तुझे विश्राम हुआ कि नहीं हुआ ? मैं जानता हूँ कि परमपद सत्ता में तुमने क्षणभर भी विश्राम नहीं पाया, क्योंकि दृढ़ भावना नहीं हुई। हे बधिक ! परमपद पाने का मार्ग यही है सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों का विचार ही न करे, किन्तु उसमें दृढ़ अभ्यास करे। इस मार्ग के बिना शान्ति नहीं होती। जब दृढ़ अभ्यास हो तब शान्ति हो और चित्त का निर्वाण हो, तब द्वैत-अद्वैत की कल्पना मिटे। इसी