योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1567, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७६३
को निर्वाण कहते हैं। जब तक चित्त का निर्वाण नहीं होता, तब तक राग-द्वेष नहीं मिटता, और जब अभ्यास के बल से चित्त का निर्वाण हो जाता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मपद, शान्त शिवपद प्राप्त होता है, जो मान और मोह से रहित है, जिसने कुसंग को त्यागा है और किसी के संग से नहीं बँधता, जो अध्यात्मविचार नित्य करता है, जिसकी सब कामनाएँ निवृत्त हुई हैं, जो इष्ट के रागद्वेषरूपी द्वन्द्वों से मुक्त है, जो सुख दुःख में सम है, ऐसा ज्ञानवान् पुरुष अविनाशी आत्मपद को पाता है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे यथार्थोपदेशो नाम द्विशताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४० ॥
अग्नि बोले, हे राजा विपश्चित् ! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा तब बधिक को बड़ा आश्चर्य हुआ ! मुनीश्वर के वचन सुनकर वह मूर्तिवत् निश्चल हो गया। जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है, वैसे ही वह आश्चर्य-चकित हुआ। वह संशय के समुद्र में डूब गया। जैसे चाक पर चढ़ा बर्तन घूमता है, वैसे ही वह संशय में चक्कर खाने लगा। उसने मुनीश्वर का उपदेश सुना, परन्तु अभ्यास के बिना आत्मपद में विश्रान्ति न पाई। हे राजन् ! मुनि के परम वचनों को उसने अङ्गीकार नहीं किया। जैसे राख में डाली आहुति निरर्थक होती है, वैसे ही मूर्ख को उपदेश करना निरर्थक होता है। मूर्खता से ही वह संशय में रहा और विचारने लगा कि यह संसार अविद्यक है तो मैं इसका अन्त लूँ, जिससे मुझको आत्मपद दिखे। इसलिए तप करूँ। हे राजा विपश्चित् ! इस प्रकार विचारकर वह उठा और तप करने लगा। पवित्र चेष्टा अङ्गीकार करके उसने व्याध का धर्म त्याग दिया। निदान सहस्र वर्ष तक बड़ा तप किया, परन्तु मन में कामना यही रक्खी कि मेरा शरीर बड़ा हो और दिन-दिन बहुत भोजन बढ़े; मैं अविद्यक संसार का अन्त लूँ कि कहाँ तक चला जाता है; क्योंकि जब अविद्या का अन्त आवेगा, तब आत्मा का दर्शन होगा। सहस्र वर्ष के उपरान्त जब समाधि से उठा तो गुरु के निकट जाकर प्रणाम किया और बोला,