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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1568, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1568

७६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे भगवन् ! मैंने इतने समय तक तप किया है, परन्तु मुझको शान्ति नहीं हुई। मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तुझको जो मैंने उपदेश दिया था, उसका तूने भली भाँति अभ्यास नहीं किया, इस कारण तुझको शान्ति नहीं हुई।

हे वधिक ! मैंने तेरे हृदय में ज्ञानरूपी अग्नि की चिनगारी डाली थी, परन्तु तूने अभ्यासरूपी पवन से उसे प्रज्वलित न किया, इससे वह ढक गई—जैसे बड़े काष्ठ के नीचे रञ्चक चिनगारी ढक जाती है। हे वधिक ! तू न मूर्ख है और न पण्डित, क्योंकि जो तू पण्डित होता तो आत्मपद में स्थित पाता। जब अविद्या नष्ट होगी और अभ्यास की दृढ़ता होगी, तब ज्ञान और शान्ति का उदय होगा। जो तेरा भविष्य है, वह मैं तुझसे कहता हूँ। हे व्याध ! यही तूने भली प्रकार विचारा है कि संसार अविद्यक है और इसका अन्त लूँ कि कहाँ तक चला जाता है। अब तेरे चित्त में यही निश्चय है और आगे तू यही करेगा कि सौ युग तक उग्र तप करेगा। तब तुझपर परमेष्ठी ब्रह्मा प्रसन्न होंगे और देवताओं सहित तेरे समीप आकर तुझसे कहेंगे कि कुछ वर माँग। तब तू कहेगा, हे देव ! जगत् अविद्यक है; यह अविद्या किसी और अणु में है। जैसे दर्पण में किसी जगह मलीनता होती है तो उसका नाश होने पर ही दर्पण शुद्ध होता है, वैसे ही आत्मा के किसी कोण में अविद्यारूपी मलीनता है; उसका नाश होने पर चिदात्मा का साक्षात्कार होगा। इसलिए जब अविद्यारूपी जगत् का अन्त देखूँगा, तब मुझको आत्मा भासित होगा। मेरा शरीर घड़ी-घड़ी में योजन तक बढ़ता जावे। जैसे गरुड़ का वेग होता है, वैसे ही मेरा शरीर बढ़ता जाय और मृत्यु भी मेरे वश में हो। शरीर भी आरोग्य रहे और ब्रह्माण्ड खप्पर को मैं नाँघ जाऊँ। जहाँ मेरी इच्छा हो, वहाँ चला जाऊँ और मुझको कोई न रोके। जब मैं संसार का अन्त देखूँगा, तब आत्मा को प्राप्त होऊँगा। हे देव ! इतने वर दो कि मेरा मनोरथ पूर्ण हो; और कुछ नहीं चाहिए।

हे वधिक ! जब इस प्रकार तू वर माँगेगा, तब ब्रह्माजी कहेंगे कि

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