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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७६१

क्यों नहीं, सब अर्थ और ग्रहण-त्याग तो सिद्ध होते हैं, तो ग्रहण और त्याग पिण्ड से होता है और पिण्ड तत्त्वों से होता है। सो यह पिण्ड तो न किसी तत्त्व से बना है और न किसी माता-पिता से है। यह तो स्वप्न में प्रकट हुआ है तो इसका कारण किसे कहिये ?

और जो कहिये कि भ्रममात्र है, तो भ्रम का कारण कौन है ? और भ्रान्ति का द्रष्टा कौन है ? जिस शरीर से दिखता था, उसका द्रष्टारूप मैं तो भस्म हो गया। इससे जगत् और कुछ वस्तु नहीं; केवल आदि-अन्त से रहित आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वही मेरा स्वरूप है। वहाँ यह जगतरूप होकर भासित होता है, पर केवल ब्रह्मसत्ता स्थिर है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश आदि सब पदार्थ आत्मरूप है। जैसे समुद्र तरङ्गरूप होकर दिखता है, परन्तु कुछ और नहीं होता, वैसे ही आत्मा नाना प्रकार का होकर भासित होता है पर कुछ और नहीं होता, ब्रह्मसत्ता ही निराभास है। आभास भी कुछ हुआ नहीं, केवल चैतन्यसत्ता ऐसे रूप होकर दिखती है। हे वधिक ! इस प्रकार विचारकर मैं विगतज्वर होकर मुनीश्वर के वचनों से पर्वत की नाईं अपने स्वभाव में अटल स्थित हुआ। जो कुछ इष्ट-अनिष्ट पदार्थ प्राप्त होता, उसमें सम रहता था। अभिलाषा से रहित सब अपनी चेष्टाएँ करता था। अपने स्वभाव में स्थित रहता था। हे वधिक ! सुख भोगने के लिए न मुझको जीने की इच्छा है और न मरने की इच्छा है। न जीने में हर्ष है और न मरने में शोक है। मैं सदा आत्मपद में स्थित हूँ। मुझको कुछ संशय नहीं है। सम्पूर्ण संशय स्फुरण में है, सो स्फुरण मुझमें नहीं रहा, इसलिए संसार भी नहीं है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २३६ ॥

मुनीश्वर बोले, हे व्याध ! इस प्रकार जब मैंने निर्णय किया, तब मेरे तीनों ताप नष्ट हो गये। मैं वीतराग होकर निःशङ्क हुआ। तब मुझको किसी पदार्थ की तृष्णा नहीं रही। मैं निरहंकार हुआ। अनात्मा में जो आत्मअभिमान था, वह निवृत्त होकर निर्वाण, निरा-

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धार और निराधेय हुआ। अपने स्वभाव में आत्मत्व स्थित होकर मैं सर्वात्मा हुआ। हे बधिक ! जो कुछ शरीर का प्रारब्ध है, उसमें मैं यथाशास्त्र विचरता हूँ; परन्तु कर्तृत्व का अभिमान नहीं है। जगत् मुझको आत्मरूप दिखता है। और तृष्णा करनेवाली मिथ्याबुद्धि का अभाव है। मैं जानता हूँ कि आभास कुछ वस्तु नहीं—चिदाकाश आत्मसत्ता अपने रूप में स्थित है। हे बधिक ! मुनीश्वर का कहा वृत्तान्त सत्य होता गया। तुम मेरे पास आये हो इसलिए जो कुछ उपदेश मैंने किया है; वह परम पावन और सबका सार है। जिस प्रकार जगत् के पदार्थ, तुम और मैं का जो वृत्तान्त है, वह मैंने तुमसे कहा। व्याध ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यदि इस प्रकार है तो तुम, मैं और ब्रह्मादिक भी सब स्वप्न के हुए। और असत्य ही सत्य की नाईं भासित होते हैं। मुनीश्वर बोले, हे व्याध ! तुम, मैं और ब्रह्मा से लेकर तृण तक सब स्वप्न के पदार्थ हैं। यह जगत् का सत्य है, न असत्य और न सत्यासत्य के मध्य है, न अनिर्वचनीय है, क्योंकि अनुभवरूप है। हे व्याध ! जो अनुभव से देखिये तो वही रूप है, और जो अनुभव से भिन्न कहिये तो है ही नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि अनुभव में स्फुरती है, और जो अधिष्ठान की ओर देखिये तो वही रूप है। उससे भिन्न कहने में नहीं आता।

हे बधिक ! जैसे कोई नगर देखता है और वह दूर है, तो यदि याद करके देखिये तो दिखता है, परन्तु कुछ बना नहीं, स्मृतिमात्र है। वैसे ही सब पदार्थ संकल्पमात्र हैं, कुछ बने नहीं। अपने स्वभाव में स्थित होकर देख। तू तो बोधवान् है, मिथ्याभ्रम में पड़ा है ? हे व्याध ! मेरे उपदेश से तुझे विश्राम हुआ कि नहीं हुआ ? मैं जानता हूँ कि परमपद सत्ता में तुमने क्षणभर भी विश्राम नहीं पाया, क्योंकि दृढ़ भावना नहीं हुई। हे बधिक ! परमपद पाने का मार्ग यही है सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों का विचार ही न करे, किन्तु उसमें दृढ़ अभ्यास करे। इस मार्ग के बिना शान्ति नहीं होती। जब दृढ़ अभ्यास हो तब शान्ति हो और चित्त का निर्वाण हो, तब द्वैत-अद्वैत की कल्पना मिटे। इसी

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७६३

को निर्वाण कहते हैं। जब तक चित्त का निर्वाण नहीं होता, तब तक राग-द्वेष नहीं मिटता, और जब अभ्यास के बल से चित्त का निर्वाण हो जाता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मपद, शान्त शिवपद प्राप्त होता है, जो मान और मोह से रहित है, जिसने कुसंग को त्यागा है और किसी के संग से नहीं बँधता, जो अध्यात्मविचार नित्य करता है, जिसकी सब कामनाएँ निवृत्त हुई हैं, जो इष्ट के रागद्वेषरूपी द्वन्द्वों से मुक्त है, जो सुख दुःख में सम है, ऐसा ज्ञानवान् पुरुष अविनाशी आत्मपद को पाता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे यथार्थोपदेशो नाम द्विशताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४० ॥

अग्नि बोले, हे राजा विपश्चित् ! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा तब बधिक को बड़ा आश्चर्य हुआ ! मुनीश्वर के वचन सुनकर वह मूर्तिवत् निश्चल हो गया। जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है, वैसे ही वह आश्चर्य-चकित हुआ। वह संशय के समुद्र में डूब गया। जैसे चाक पर चढ़ा बर्तन घूमता है, वैसे ही वह संशय में चक्कर खाने लगा। उसने मुनीश्वर का उपदेश सुना, परन्तु अभ्यास के बिना आत्मपद में विश्रान्ति न पाई। हे राजन् ! मुनि के परम वचनों को उसने अङ्गीकार नहीं किया। जैसे राख में डाली आहुति निरर्थक होती है, वैसे ही मूर्ख को उपदेश करना निरर्थक होता है। मूर्खता से ही वह संशय में रहा और विचारने लगा कि यह संसार अविद्यक है तो मैं इसका अन्त लूँ, जिससे मुझको आत्मपद दिखे। इसलिए तप करूँ। हे राजा विपश्चित् ! इस प्रकार विचारकर वह उठा और तप करने लगा। पवित्र चेष्टा अङ्गीकार करके उसने व्याध का धर्म त्याग दिया। निदान सहस्र वर्ष तक बड़ा तप किया, परन्तु मन में कामना यही रक्खी कि मेरा शरीर बड़ा हो और दिन-दिन बहुत भोजन बढ़े; मैं अविद्यक संसार का अन्त लूँ कि कहाँ तक चला जाता है; क्योंकि जब अविद्या का अन्त आवेगा, तब आत्मा का दर्शन होगा। सहस्र वर्ष के उपरान्त जब समाधि से उठा तो गुरु के निकट जाकर प्रणाम किया और बोला,

७६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

हे भगवन् ! मैंने इतने समय तक तप किया है, परन्तु मुझको शान्ति नहीं हुई। मुनीश्वर बोले, हे वधिक ! तुझको जो मैंने उपदेश दिया था, उसका तूने भली भाँति अभ्यास नहीं किया, इस कारण तुझको शान्ति नहीं हुई।

हे वधिक ! मैंने तेरे हृदय में ज्ञानरूपी अग्नि की चिनगारी डाली थी, परन्तु तूने अभ्यासरूपी पवन से उसे प्रज्वलित न किया, इससे वह ढक गई—जैसे बड़े काष्ठ के नीचे रञ्चक चिनगारी ढक जाती है। हे वधिक ! तू न मूर्ख है और न पण्डित, क्योंकि जो तू पण्डित होता तो आत्मपद में स्थित पाता। जब अविद्या नष्ट होगी और अभ्यास की दृढ़ता होगी, तब ज्ञान और शान्ति का उदय होगा। जो तेरा भविष्य है, वह मैं तुझसे कहता हूँ। हे व्याध ! यही तूने भली प्रकार विचारा है कि संसार अविद्यक है और इसका अन्त लूँ कि कहाँ तक चला जाता है। अब तेरे चित्त में यही निश्चय है और आगे तू यही करेगा कि सौ युग तक उग्र तप करेगा। तब तुझपर परमेष्ठी ब्रह्मा प्रसन्न होंगे और देवताओं सहित तेरे समीप आकर तुझसे कहेंगे कि कुछ वर माँग। तब तू कहेगा, हे देव ! जगत् अविद्यक है; यह अविद्या किसी और अणु में है। जैसे दर्पण में किसी जगह मलीनता होती है तो उसका नाश होने पर ही दर्पण शुद्ध होता है, वैसे ही आत्मा के किसी कोण में अविद्यारूपी मलीनता है; उसका नाश होने पर चिदात्मा का साक्षात्कार होगा। इसलिए जब अविद्यारूपी जगत् का अन्त देखूँगा, तब मुझको आत्मा भासित होगा। मेरा शरीर घड़ी-घड़ी में योजन तक बढ़ता जावे। जैसे गरुड़ का वेग होता है, वैसे ही मेरा शरीर बढ़ता जाय और मृत्यु भी मेरे वश में हो। शरीर भी आरोग्य रहे और ब्रह्माण्ड खप्पर को मैं नाँघ जाऊँ। जहाँ मेरी इच्छा हो, वहाँ चला जाऊँ और मुझको कोई न रोके। जब मैं संसार का अन्त देखूँगा, तब आत्मा को प्राप्त होऊँगा। हे देव ! इतने वर दो कि मेरा मनोरथ पूर्ण हो; और कुछ नहीं चाहिए।

हे वधिक ! जब इस प्रकार तू वर माँगेगा, तब ब्रह्माजी कहेंगे कि

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

७६५

ऐसा ही हो । तब तेरा तप से दुर्बल हुआ शरीर फिर चन्द्रमा और सूर्य की नाईं प्रकाशमान होगा और घड़ी-घड़ी में योजनपर्यन्त बढ़ता जावेगा । जैसे गरुड़ तीक्ष्ण वेग मे चलता है, वैसे ही तेरा शरीर वेग से बढ़ता जावेगा । जैसे प्रातःकाल का सूर्य उदय होता है और प्रकाश बढ़ता जाता है, वैसे ही तेरा शरीर बढ़ता जावेगा और चन्द्रमा-सूर्य और अग्नि की नाईं प्रकाशमान होगा । ब्रह्माजी वर देकर अन्तर्धान हो जावेंगे और अपनी ब्रह्मपुरी में पहुँचेंगे । तेरा शरीर प्रलयकाल के समुद्र की नाईं बढ़ता जावेगा । जैसे वायु से सूखे तृण उड़ते हैं, वैसे ही तुझको ब्रह्माण्ड उड़ते दिखेंगे । तब तेरा शरीर बढ़ता-बढ़ता ब्रह्माण्ड खप्पर को भी नाँघ जावेगा । उसके आगे आकाश दिखेगा, फिर ब्रह्माण्ड दिखेगा । आगे फिर ब्रह्माण्ड दिखेगा । इसी प्रकार तू कई ब्रह्माण्ड नाँघता जावेगा, परन्तु तुझको खेद कुछ न होगा । निदान महाआकाश को भी तू ढक लेगा । जहाँ किसी तत्त्व का आवरण आवेगा, उसको तू वर प्राप्त देह से सूक्ष्मता सहित नाँघता जावेगा । हे बधिक ! इसी प्रकार तू कई सृष्टियाँ नाँघ जावेगा, जो इन्द्रजाल सदृश होंगी । जो दीर्घदर्शी हैं, वे इनको असत्य जानते हैं, और जो प्राकृत-जन हैं, उनको जगत् सत्य लगता है । ज्ञानवान् को जगत् मिथ्या भासित होता है । उस मिथ्या जगत् को तू नाँघता जावेगा और वहाँ जा पहुँचेगा, जहाँ अनन्तसृष्टि फुरती दिखेंगी । जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही तुझको सृष्टियाँ उपजती देख पड़ेंगी, परन्तु जिसमें सृष्टि जगती है, उस अधिष्ठान का तुझको ज्ञान न होगा । वहाँ तू देखेगा कि मैं बड़ा उत्कृष्ट हुआ हूँ । जब तुझको ऐसा अभिमान होगा तब उसके साथ ही तप का फल वैराग्य भी उदय होगा । उसी के साथ यह संस्कार तेरे हृदय में जगेगा, जिससे तू उस शरीर का निरादर करेगा और कहेगा कि हा कष्ट ! हा कष्ट ! हे देव ! क्या शरीर तुमने मुझको दिया है ।

जगत् का अन्त लेने को मैंने शरीर बढ़ाया था, पर उसका तो अन्त कहीं न आया, क्योंकि अविद्या नष्ट नहीं हुई । अविद्या तब नष्ट होती

७६६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, जब ज्ञान होता है और आत्मज्ञान तब होता है, जब सतशास्त्रों का विचार और सन्तों का सङ्ग होता है। जब संग और सतशास्त्र मुझको प्राप्त हों, तब ज्ञान उपजेगा। यह तो मुझको ऐसा शरीर प्राप्त हुआ है, जिसका बड़ा भार उठाये फिरता हूँ। अनेक सुमेरु पर्वत भी इसके आगे तृण से हल्के हैं। ऐसा भारी मेरा शरीर है। इस शरीर से मैं किसकी संगति करूँ और किस प्रकार शास्त्र श्रवण करूँ? यह शरीर मुझको दुःखदायी है, इससे इस शरीर का त्याग करूँगा। हे बधिक! ऐसे विचारकर तू प्राणायाम करेगा और उसकी धारणा से शरीर त्याग देगा। जैसे पक्षी फल को खाकर गुठली को त्याग देता है और जैसे इन्द्र के वज्र से खण्डित हुए पर्वत गिरते हैं, वैसे ही एक सृष्टि-भ्रम में तेरा शरीर गिरेगा। उसके नीचे कई पर्वत, नदियाँ और जीव चूर्ण होंगे। वहाँ बड़ा खेद होगा। तब सब देवता चण्डिका की आराधना करेंगे। तब वह चण्डिका भगवती तेरे शरीर को भक्षण कर जावेगी। तब सृष्टि में फिर कल्याण होगा। इस वन में जो तमाल वृक्ष हैं, उनके नीचे तू तप करेगा। यह मैंने तेरा भविष्य कहा। अब जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर।

व्याध बोला, हे भगवन्! बड़ा कष्ट है कि मैं इतने खेद को प्राप्त होऊँगा। इससे कोई ऐसा उपाय करो, जिससे यह भावना निवृत्त हो जावे।

मुनीश्वर बोले, हे बधिक! जो कुछ होना है, वह कभी अन्यथा नहीं होता—जो कुछ शरीर की प्रारब्ध है, वह अवश्य होती है। जैसे चिल्ले से छूटा बाण तब तक चला जाता है जब तक उसमें वेग होता है, और जब वेग समाप्त हो जाता है, तब वह पृथ्वी पर गिर पड़ता है, अन्यथा नहीं गिरता, वैसे ही जैसा प्रारब्ध का वेग है, वैसा ही होगा। भावी टलने की नहीं। अतः जीव उसमें बायाँ चरण दाहिने और दाहिना बायें नहीं कर सकता—जो होना है, वही होगा। ज्योतिषशास्त्रवाले जो भविष्य दशा पहले कहते हैं, वैसा ही होता है, क्योंकि होनी होती है—जो न हो तो क्यों कहें। इससे भावी मिटती नहीं। हे बधिक! मैंने तुझको दो मार्ग बताये हैं। जब तक कर्म की कल्पना स्पर्श करती है, तब तक जीव कर्म के बन्धन से नहीं छूटता। और जो कर्म की कल्पना

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६७

आत्मा को स्पर्श न करे तो कोई कर्म बन्धन नहीं करता, क्योंकि उसको अद्वैत आत्मा का अनुभव होता है और द्वैतरूप कर्म नहीं दिखाई देते । सब सुख-दुःख आत्मरूप हो जाते हैं। कर्म तब तक बन्धन करते हैं, जब तक आत्मबोध नहीं हुआ । जब आत्मबोध होता है, तब सब कर्म भस्म हो जाते हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भविष्यत्कथावर्णनं नाम द्विशताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४१ ॥

व्याध बोला, हे भगवन् ! यह जो तुमने मुझसे कहा वह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ । शरीर गिरने के उपरान्त मेरी क्या दशा होगी ? मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! जब तेरा शरीर गिरेगा, तब तेरी संवित् प्राण-वासना सहित आकाशरूप महासूक्ष्म अणु के समान हो जावेगी । उस संवित् में तुझको फिर नाना प्रकार का जगत् दिखेगा । पृथ्वी, देश, काल, पदार्थ सब भासित होंगे । जैसे सूक्ष्म संवित् में स्वप्न का जगत् भासित होता है, वैसे ही तुझको जगत् भासित होगा । वहाँ तेरी संवित् में यह फुरेगा कि मैं अष्टवसुओं के समान राजा हूँ । मेरे पिता का नाम इन्द्र और माता का नाम प्रद्युम्न की पुत्री बधलेखा है । मेरे पिता मुझको राज्य देकर वन को गये हैं और तप करने लगे हैं । चारों ओर समुद्रपर्यन्त मेरा राज्य है । हे बधिक ! वहाँ तेरा नाम विदूरथ होगा । कई सौ वर्ष तक तू राज्य करेगा और नाना प्रकार के विषयों को भोगेगा । हे बधिक ! विदूरथ नाम का एक राजा पृथ्वी पर होगा । वह तेरे साथ शत्रुता करेगा । तेरी पृथ्वी और सीमा लेने का यत्न करेगा । तब तू मन में विचार करेगा कि मैं बड़ा सिद्ध हूँ, और कई सौ वर्ष मैंने निर्विघ्न भोग भोगे हैं। अब इस विदूरथ नाम के शत्रु का नाश करूँ । हे बधिक ! उसको मारने के लिए तू सेना लेकर चढ़ाई करेगा । वह तेरी चारों प्रकार की सेना नाश को प्राप्त होगी । इस प्रकार हाथी, घोड़े, रथ और प्यादेवाली दोनों ओर की सेना नष्ट होगी । तुम दोनों रथ से उतरकर परस्पर युद्ध करोगे । तुम्हारे भी बहुत शस्त्र लगेंगे और शरीर घायल होगा । तो भी तू शत्रु के सम्मुख

७६८ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

जाकर युद्ध करेगा। अंत में उसकी टाँग काटकर कुल्हाड़े से उसको मारकर अपने घर लौटेगा। सब दिक्पाल तुझसे डरने लगेंगे। तू बड़ा तेजस्वी होगा।

बड़ा आश्चर्य है कि विदूरथ को जीतकर जब तू यमपुरी भेजेगा, तब कहेगा कि हे मन्त्रियो ! इसमें क्या आश्चर्य है ? मेरे भय से तो दिक्पाल भी काँपते हैं। प्रलयकाल के समुद्र और मेघ के समान मेरी सेना है, जिसका ओरछोर नहीं है। मेरे विदूरथ को जीतने में क्या आश्चर्य है ? तब मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! इतनी सेना तुम्हारे साथ है तो क्या हुआ, उस विदूरथ की स्त्री लीला को तुम नहीं जानते। उसने तप करके एक देवी को प्रसन्न किया है, जिसके क्रोध करने से सम्पूर्ण विश्व का नाश हो सकता है। वह माता सरस्वती ज्ञानशक्ति और सब भूतों के हृदय में स्थित है। जैसा उसमें कोई अभ्यास करता है, उसे सरस्वती सिद्ध करती है। हे राजन् ! वह राजा और उसकी स्त्री लीला सरस्वती से मोक्ष माँगते थे कि किसी प्रकार हम संसारबन्धन से मुक्त हों, इस कारण वे मुक्त हुए और तुम्हारी जय हुई। राजा पूछेगा, हे अज्ञ ! जो सरस्वती मेरे हृदय में स्थित है, तो मुझको मुक्त क्यों नहीं करती ? मैं भी तो सदा सरस्वती की उपासना करता हूँ। मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! सरस्वती ही चित्संवित् है। उसमें जैसा निश्चय होता है, वही सिद्ध होता है। हे राजन् ! तुम सदा अपनी जय ही माँगते थे, इससे तुम्हारी जय हुई और वह मुक्ति माँगता था, इससे उसकी मुक्ति हुई। उसका पिछला संस्कार उज्ज्वल था, इससे मुक्त हुआ, और तुम्हारा पिछले जन्म का संस्कार तामसी था, इस कारण तुमको मोक्ष की इच्छा न हुई और शान्ति भी न प्राप्त हुई। आदि परमात्मसत्ता से सब पदार्थ प्रकट हुए हैं। केवल आत्मसत्ता, जो निष्किञ्चन पद है, सदा अपने स्वभाव में स्थित है। उसी में चेतनता (संवेदन) फुरती है। 'अहं अस्मि' अर्थात् 'मैं हूँ' इस भावना का नाम चित्त है। इसी चेतनता ने देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदि दृश्य जगत् की कल्पना की है। उस कल्पना से विश्व चित्त में स्थित है और चित्त ने आत्मा से फुरा

❀ निर्वाण प्रकरण ❀ ७६६

कर प्रमाद से देहादिक की कल्पना की है। राजा पूछेगा, हे साधो ! आत्मा तो निष्किञ्चन और केवल निर्विकार है, उसमें तामसी देह कहाँ से उपजी ? मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! जैसे स्वप्न में प्रमाद से तामसी देह दिखती है, परन्तु होती नहीं, वैसे ही ये आकार भी दिखते हैं, परन्तु होते नहीं, अज्ञान से भासित होते हैं। इससे तुझको प्रमाद हुआ है, इसी से वासना के अनुसार जन्म पाता फिरा है। इस प्रकार तेरे बहुत जन्म बीते हैं। परन्तु पिछला शरीर जो तूने भोगा है, वह तामस-तामसी था, इस कारण तुझको मोक्ष की इच्छा नहीं हुई।

हे राजन् ! तुम्हारे जो जन्म बीते हैं, उनको मैं जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते। राजा कहेगा, हे निर्मल आत्मा ! तामस-तामसी किसको कहते हैं ? मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! एक सात्त्विक-सात्त्विकी है, दूसरा केवल सात्त्विकी है, तीसरा राजस-राजसी है, एक तामस-तामसी है, और एक केवल तामसी है। इन्हें अलग-अलग सुनो। हे राजन् ! निर्विकल्प अद्वैत, चिन्मात्र सत्ता से जो संवित् फुरी है, जिसकी अहंप्रतीति अधिष्ठान में रही है, जो निश्चय को नहीं प्राप्त हुए और अनात्मभाव को भी स्पर्श नहीं किया, ऐसे जो ब्रह्मादिक हैं, वे सात्त्विक-सात्त्विकी हैं। जिनको सात्त्विकी पदार्थ भासित होने लगे हैं और स्वरूप का प्रमाद है, उनका बुद्धि से स्पर्श हो अथवा न हो, वे केवल सात्त्विकी हैं। जिनकी संवित् का बुद्धि से सम्बन्ध हुआ है और नाना प्रकार के राजसी पदार्थों में सत्य प्रतीति हुई है, जिन्हें राजसकर्मों में दृढ़ अभ्यास है और उसके अनुसार शरीर को धारण करते चले गये, पर स्वरूप की ओर नहीं आये और चिरकाल तक ऐसे ही रहे, वे राजस-राजसी हैं। जिनको बोध में अहंप्रतीति नहीं, स्वरूप का प्रमाद है, जगत् सत्य भासित होता है, राजसी पदार्थों में अधिक प्रीति है और राजसी कर्मों का अभ्यास है, उसके अनुसार जन्म पाते हैं और फिर शीघ्र ही स्वरूप की ओर आते हैं, वे केवल राजसी हैं, और राजस-राजसी से श्रेष्ठ हैं। जिनको स्वरूप का प्रमाद है और जगत् में सत्य प्रतीति हुई है एवम् उस जगत् के ताम कर्मों में दृढ़ अभ्यास हुआ है, वे महामूढ़ उसमें चिरकाल तक

७७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जन्म पाते चले जाते हैं, यदि दैव-संयोग से कभी मुक्त पुरुष की संगति प्राप्त भी होती है तो उसे छोड़ जाते हैं, वे तामस-तामसी हैं। जिनको स्वरूप का प्रमाद हुआ है और तामसी कर्मों की रुचि है, वे उन कर्मों के अनुसार जन्म पाते जाते हैं। जो हट पड़े और तामसी कर्मों को त्यागकर मोक्षपरायण होते हैं, वे केवल तामसी हैं। पर वे तामस-तामसी से श्रेष्ठ हैं। हे राजन् ! तुम तामस-तामसी थे, इस कारण सरस्वती से तुम अपनी जय ही माँगते रहे और मोक्ष का अभ्यास तुमने नहीं किया ।

राजा पूछेगा, हे निर्मलचित्त, मन्त्रिन् ! मैं तामस-तामसी था, इस कारण मोक्ष की इच्छा न की, परन्तु अब मुझसे तुम वही उपाय कहो जिससे मेरा अहंभाव निवृत्त हो और आत्मपद की प्राप्ति हो। मन्त्री कहेगा, हे राजन् ! निश्चय करके जानो, जो कोई कैसे ही पदार्थ की इच्छा करे, वह पदार्थ अभ्यास से अवश्य प्राप्त होता है। जिसकी भावना करके वह अभ्यास करता है, वह पदार्थ निसन्देह प्राप्त होता है। जो जिसका दृढ़ अभ्यास करता है, वह वही रूप हो जाता है। त्रिलोकी में ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो अभ्यास से न मिल सके । जो प्रथम दिन में कोई विकर्म किसी से हुआ हो और अगले दिन शुभ कर्म करे तो वह विकर्म लुप्त हो जाता है और शुभ कर्म ही मुख्य हो जाता है। जब तुम आत्मपद का अभ्यास करोगे, तब तुमको आत्मपद प्राप्त होगा, और तुम्हारा तामस-तामसी भाव निवृत्त हो जावेगा। हे राजन् ! जो पुरुष कोई पदार्थ पाने की इच्छा करता है और हटकर नहीं फिरता तो वह अवश्य उसको पाता है। मनुष्य को देह-इन्द्रियों का अभ्यास दृढ़ हो रहा है, उससे फिर-फिर देह और इन्द्रियाँ ही पाता है। जब उनसे पलटकर आत्मा का अभ्यास करे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और देह-इन्द्रियों का वियोग हो जावेगा। इसलिए आप भी सदा आत्मपद का अभ्यास करें तो उससे आपको आत्मपद प्राप्त होगा।

इतना कह फिर मुनीश्वर बोले, हे बधिक ! इस प्रकार जब तू

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७७१

सिद्ध राजा होगा और मन्त्री तुझको उपदेश करेगा, तब तू राज्य को त्यागकर वन में जायगा और उपदेश करनेवाला मन्त्री दूसरे मन्त्रियों और सेना सहित तुझसे कहेंगे कि तू राज्य कर, परन्तु तेरा चित्त विरक्त होगा और तू राज्य अङ्गीकार न करेगा। उस वन में किसी सन्त के स्थान में जाकर तू ठहरेगा और परम वैराग्य संपन्न होगा, तब उनकी बातों का और प्रसंग का तुझ पर प्रभाव होगा। यदि सन्तों से कुछ न माँगिये तो भी वे अमृतरूपी वचनों की वर्षा करते हैं—जैसे पुष्पों से बिना माँगे ही सुगन्ध प्राप्त होती है, वैसे ही सन्तजनों से माँगे बिना ही ज्ञान का अमृत प्राप्त होता है। जब मनुष्य सन्तों के अमृत-वचन सुनता है, तब उसके मन में यह विचार उत्पन्न होता है कि 'मैं कौन हूँ', 'यह जगत् क्या है' और 'जगत् किससे उपजा है'? निदान तू उनका उपदेश पाकर जानेगा कि मैं अचेत चिन्मात्रस्वरूप हूँ और जगत् मेरा आभास है। चित्त का फुरना ही जगत् का कारण है। वह चित्त ही मुझमें नहीं है, तो जगत् कैसे हो? जगत् तो मुझ में नहीं है; मैं अपने ही रूप में स्थित हूँ। हे बधिक! इस प्रकार जब तू मन को सब विषयों से शून्य करके अपने स्वरूप में स्थित होगा, तब परमानन्द निर्वाण पद तुझे प्राप्त होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे सिद्धनिर्वाणवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४२ ॥

मुनीश्वर बोले, हे बधिक! इस प्रकार जो तेरी भावी थी, वह सब मैंने तुझसे कही। अब जो भला जान पड़े, वह कर। अग्नि बोले, हे राजा विपश्चित्! मुनीश्वर ने जब बधिक से इस प्रकार कहा, तब उसे आश्चर्य हुआ। वह वहाँ से उठकर मुनीश्वर सहित स्नान करने गया। निदान दोनों तप करने और शास्त्र को विचारने लगे। कुछ काल के उपरान्त मुनीश्वर का निर्वाण हो गया। केवल बधिक ही यह विचार कर कि किसी प्रकार मेरी अविद्या नष्ट हो, तप करने लगा। हे राजा विपश्चित्! सौ युग तक जब बधिक ने तप किया, तब ब्रह्माजी देवताओं को साथ लेकर आये और बोले कि कुछ वर माँग। तब बधिक

७७२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

ने कहा कि मेरा शरीर बड़ा हो और मैं अविद्या को देखूँ। हे राजन् ! यद्यपि बधिक ने जाना कि यह वर माँगने से मेरा भला न होगा, परन्तु दृढ भावना के बल से जानकर भी यही वर माँगा कि घड़ी-घड़ी में मेरा शरीर योजन भर बढ़े। ब्रह्माजी ने कहा कि ऐसा ही होगा। ब्रह्माजी यह कहकर जब अन्तर्धान हो गये, तब उसका शरीर बढ़ने लगा। एक घड़ी में एक योजन बढ़ते-बढ़ते कल्पपर्यन्त बढ़ता गया और कई ब्रह्माण्डों तक चला गया। पर जिस ओर को वह देखता था, उस ओर अविद्यारूपी अनन्त सृष्टियाँ उसे दिखती थीं। निदान जब वह चलते-चलते थक गया, तब उसने विचारा कि अविद्या का तो अन्त नहीं आता, इस शरीर को मैं कहाँ तक उठाये फिरूँ ? अब इसका त्याग करूँ, तभी आत्मपद पाऊँगा। हे राजा विपश्चित् ! तब उसने प्राण को ऊपर खींचकर शरीर को त्याग दिया। यह वही शरीर यहाँ आ पड़ा है। जिस ब्रह्माण्ड से यह गिरा है, वह हमारे स्वप्न की सृष्टि है, अर्थात् यह अन्य सृष्टि का था, इस सृष्टि में इसकी स्वप्नवत् प्रतिभा हुई थी, और यहाँ जाग्रत् दृष्टि में आ पड़ा है। पृथ्वी, पहाड़ आदि सबको उसने नाश कर डाला है। जहाँ से यह गिरा है, वहाँ आकाश में तरुवर की नाईं दिखता था और यहाँ इस प्रकार गिरा है, जैसे इन्द्र का वज्र हो।

हे विपश्चितों में श्रेष्ठ ! वही बधिक का महाशव था। जब उसका शरीर गिरा, तब भगवती ने उसका रक्तपान किया, इसलिए उसका नाम रक्ता—भगवती हुआ। उसके शरीर का शेष अंश सो पृथ्वी हुआ। जब चिरकाल व्यतीत हुआ, तब मृत्तिका पृथ्वी हो गई और उस पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ा। ब्रह्माजी ने जो नवीन सृष्टि रची है उस पृथ्वी पर अब कल्याण हुआ है। इससे अब जहाँ तेरी इच्छा हो, वहाँ जा और मैं भी अब जाता हूँ। इन्द्र को यज्ञ करना है और उन्होंने मेरा आवाहन किया है, वहाँ मैं जाता हूँ। भास बोले, हे राजा दशरथ ! इस प्रकार मुझसे कहकर अग्नि देवता अन्तर्धान हो गये। जैसे महा-श्याम मेघ से दामिनी चमक कर अन्तर्धान हो जाती है, वैसे ही अग्नि

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७७३

जब अन्तर्धान हो गये, तब मैं वहाँ से चला । और एक सृष्टि में गया तो वहाँ और प्रकार के शास्त्र और ही प्रकार के प्राणी देखे । फिर आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ ऐसे प्राणी देखे, जिनकी टाँगें काठ की और आचरण मनुष्य का था । आगे और सृष्टि में गया तो उसमें लोगों के शरीर तो पाषाण के थे, पर वे दौड़ते और सब व्यवहार करते थे । उसके उपरान्त और सृष्टि में गया । वहाँ शास्त्ररूपी उनकी मूर्ति थी । उसके आगे गया तो वहाँ क्या देखा कि प्राणी बैठे ही रहते हैं और जोर से बातें करते हैं, पर न कुछ खाते हैं और न पीते हैं । हे राजा दशरथ ! इस प्रकार जब मैं चिरकाल तक फिरता रहा, पर अविद्या का अन्त कहीं न आया, तब मैंने विचार किया कि आत्मज्ञानी हो जाऊँ, तब अन्त आवेगा, और किसी प्रकार अन्त न आवेगा । इस प्रकार विचार कर मैं एक वन में गया और ज्ञान की सिद्धि के लिए तप करने लगा । जब कुछ काल तप किया तब चित्त में यह भावना उपजी कि किसी प्रकार सन्तों के निकट जाऊँ तो उनकी संगति से मुझको शान्तिपद प्राप्त होगा ।

हे राजन् ! यह विचार कर मैं वहाँ से चला और कल्पवृक्ष के वन में आया । वहाँ एक पुरुष मुझको मिला । उसने कहा, हे साधो ! तू कहाँ जा रहा है, मेरे पास तो आ ? तब मैंने उससे पूछा कि तू कौन है ? उसने कहा कि मैं तेरा तप हूँ, जो तूने किया है । अब तू कुछ वर माँग, वह मैं तुझको दे दूँ । तब मैंने कहा कि हे साधो ! मेरी इच्छा यही है कि मैं आत्मपद को पाऊँ । उसने कहा, हे साधो ! अब तुझे मृग का एक जन्म और पाना है । जब वह तेरा शरीर अग्नि में जलेगा, तब तू मनुष्य का शरीर पावेगा और ज्ञानवानों की सभा में जावेगा । उस सभा में जब तू मनुष्य-शरीर धरेगा, तब तुझे सब जन्मों और कर्मों की स्मृति हो जावेगी और स्वरूप की प्राप्ति होगी । इस-लिए तू अब मृगशरीर धारण कर । हे राजा दशरथ ! इस प्रकार जब उसने कहा, तब मैंने सोचा कि मृग होऊँ । मुझे स्वप्नरूप प्रतिभा जगी जिससे मैं मृग हो गया । तुम्हारी सृष्टि में एक पहाड़ की कन्दरा में मैं

७७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

विचरता था। इतने में उसका राजा शिकार खेलने चला और उसने मुझको देख मेरे पीछे घोड़ा दौड़ाया। आगे-आगे मैं दौड़ता जाता था और पीछे घोड़ा था, पर उसका वेग ऐसा तीव्र था कि उसने मुझको पकड़ लिया और अपने घर ले आया। तीन दिन उसने मुझे घर में रखा, परन्तु मेरी बहुत सुन्दर क्रीड़ा देखी, इस कारण प्रसन्नता से यहाँ ले आया। हे राजा दशरथ! अब मैंने मृग के शरीर को त्यागकर मनुष्य का शरीर पाया है। तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब तुमसे मैंने कहा।

वाल्मीकिजी बोले, हे अङ्ग! जब इस प्रकार विपश्चित् कह चुका तब रामजी ने विपश्चित् से प्रश्न किया कि हे विपश्चित्! वह मृग तो और सृष्टि का था, यहाँ क्योंकर आया? भास बोले, हे रामजी! जहाँ वह मिला था वह स्थान भी और सृष्टि का था। एक समय दुर्वासा ऋषीश्वर आकाशमार्ग में ध्यान लगायेबैठे थे कि उसी मार्ग से इन्द्र पृथ्वी पर यज्ञ करने के लिए चले आ रहे थे। दुर्वासा को शव जानकर इन्द्र ने उनको लात से ठुकराया। तब दुर्वासा ने समाधि से उठकर इन्द्र की ओर देखा और शाप दिया कि हे शक्र! तूने मुझे जानकर भी गर्व करके पैर लगाया, इसलिए तेरे यज्ञ को एक शव नष्ट करेगा और जिस स्थान पर वह गिरेगा, वह पृथ्वी भी नष्ट होगी। इस ऋषि ने जब ऐसे शाप दिया और इन्द्र यज्ञ करने लगे, तब और सृष्टि से वह शव आ गिरा और पृथ्वी चूर्ण हो गई। वह तो उस प्रकार गिरा और मैं तपरूपी मुनीश्वर के वर से मृग होकर तुम्हारी सभा में आया। हे रामजी! जो स्वप्न की सृष्टि का था, वह जो असत्य होता तो प्रकट न होता और जो सत्य होता तो स्वप्नरूप न होता। हे रामजी! तुम हमारी स्वप्न की सृष्टि में हो और हम तुम्हारी सृष्टि के स्वप्न में हैं। जैसे स्वप्न पदार्थों का होना हुआ है, वैसे ही शव का और मृग का भी होना हुआ है। जैसे यह सृष्टि है, वैसे ही वह सृष्टि भी है। जो यह सृष्टि सत्य है तो वह भी सत्य है; परन्तु वास्तव में न यह सत्य है और न वह सत्य है। यह भी भ्रममात्र है और वह भी भ्रममात्र है। सत्य

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ७७५

वस्तु वही है, जो मनसहित षट्इन्द्रियों से अगम्य है और वह आत्म-सत्ता है, जिससे यह सब है और जिसमें सब है । ऐसी आत्मसत्ता परमसत्ता है और उसमें सब कुछ बनता है । हे रामजी ! जगत् संकल्प-मात्र है, संकल्प का मिलना क्या आश्चर्य है ? छाया और धूप की तरह सत्य और झूठ और ज्ञान और अज्ञान इकट्ठे नहीं होते, परन्तु आत्मा में इकट्ठे होते दीखते हैं ।

हे रामजी ! जब मनुष्य शयन करता है, तब अनुभवरूप होता है, फिर स्वप्न में स्वप्न-नगर भासित होता है, छाया और धूप भी भासित होता है और ज्ञान-अज्ञान, सच-झूठ भी भासित होते हैं । जैसे आकाश में विरुद्ध पदार्थ भासित होते हैं, वैसे ही संकल्प से संकल्प मिल जाता है; इसमें क्या आश्चर्य है ? सब जगत् आकाशवत् शून्य निराकार निर्विकार है । निराकार में आकार और निर्विकार में विकार दिखते हैं, यही आश्चर्य है । सब आकार जो दृष्टिगोचर होते हैं, वे वही निराकाररूप हैं; ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । जगत् को असत्य कहते भी नहीं बनता । जो असत्य होता है तो प्रलय होकर पृथ्वी, अप्, तेज और वायु से आकाश फिर प्रकट न होता । पर प्रलय होने के बाद ये फिर उत्पन्न होते हैं, इससे असत्य नहीं हैं । चैतन्यरूप आत्मा का ही स्वभाव है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । हे रामजी ! जब प्रलय होता है, तब सब भूत पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और फिर उत्पन्न होते हैं । इसी से यह सृष्टि आत्मा का आभासमात्र है । ब्रह्मसत्ता में अनन्त जगत् फुरते हैं, पर जीव अपनी-अपनी सृष्टि ही को जानते-हैं । सब जीव ब्रह्मरूपी समुद्र के कण हैं, उनमें से एक सृष्टि को दूसरा नहीं जानता । जैसे सिद्धों की सृष्टि अपने अपने अनुभव में जगती है और जैसे स्वप्न की सृष्टि भिन्न भिन्न होती है, वैसे ही यह अपनी-अपनी सृष्टि अलग है और मिल भी जाती है । आत्मा में सब कुछ बनता है । जो अनादि और आदि, विधि और निषेध, विकार और निर्विकार इकट्ठे नहीं होते, वे आकाश में आत्म-सत्ता और स्वप्न में इकट्ठे दिखते हैं । इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । जगत्

७७६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कुछ भिन्न वस्तु नहीं; आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर दिखती है ।

हे राम ! चार सत्ता इस जगत् में फुरी हैं—सारथी, गोपती, समान ब्रह्मसत्ता और अविद्या। इनमें से सारथी और गोपतीसत्ता तो जिज्ञासु की भावना में भासित होती है, समानसत्ता ज्ञानी को भासित होती है और अविद्या अज्ञानी को भासित होती है । ये चारों भी ब्रह्म से भिन्न नहीं, ब्रह्म ही के नाम हैं । ब्रह्मसत्ता स्वभाव चेतनता से ऐसे ही भासित होती है । जैसे वायु फुरने से चलती जान पड़ती है और ठहरने से अचल लगती है, वैसे ही चेतनता (फुरने) से नाना प्रकार के कौतुक उठते हैं और फुरने से रहित चेतन निर्विकल्प हो जाता है । ऐसा पदार्थ कोई नहीं जिसमें सत्य न हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं, जिसमें असत्य न हो—सब समान है । जैसे आकाश के फूल हैं, वैसे ही घट, पटादिक हैं, और जैसे इनके उत्थान का अनुभव होता है, वैसे ही उनका अनुभव होता है । सब पदार्थ सत्ता ही से सत्य भासित होते हैं । सब शब्द अर्थ जो प्रकट हुए हैं वे सब मिट जाते हैं । इससे असत्य हैं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है, कभी अन्यथा नहीं होती । जो मरकर न जन्मे तो आनन्द है, क्योंकि मुक्त प्राणी और जो मरकर जन्म लेता है, वह भी अविनाशी हुआ, इसलिए शोक करना व्यर्थ है ।

हे रामजी ! जगत् के आदि में भी ब्रह्मसत्ता थी और अन्त में भी वही रहेगी । जब आदि और अन्त में वही है, तब मध्य में भी उसे ही जानिये । इससे सब जगत् आत्मरूप है और सब शब्द अर्थसंयुक्त हैं । सब शब्द और अर्थाकार का अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता ही है । जिसको यथार्थ अनुभव होता है, उसको ऐसे भासित होता है और जिसको यथार्थ अनुभव नहीं होता, उसको नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, पर आत्मा में जगत् कुछ बना नहीं, सब आकाशरूप है और ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । ब्रह्म से भिन्न जो कुछ दिखता है, वह भ्रममात्र और नाशरूप है । सब दृश्य पदार्थ नाशरूप हैं । जिसने उन्हें सत्य जाना, उससे हमको कुछ प्रयोजन नहीं । जो दूसरा कुछ बना नहीं तो मैं क्या कहूँ ? जिसमें ये पदार्थ आभास फुरते हैं, उस अधिष्ठान को

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७७७

देखे तो सब वही रूप भासित होंगे । जो पुरुष स्वभाव में स्थित है, उसको ये वचन सोहते हैं । मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखी हैं और उनके भिन्न-भिन्न आचार भी देखे हैं । दसों दिशाओं में मैं फिरा हूँ और बहुत भोग भोगे हैं; बड़ी-बड़ी विभूति पाई और देखी और अनेक प्रकार की चेष्टाएँ की हैं, परन्तु मुझको सब स्वप्न प्रतीत हुआ, क्योंकि सब भोग पदार्थ और कर्म अविद्या के रचे हुए हैं । उसी अविद्या का अन्त होने को मैं अनेक युग पर्यन्त फिरा, पर अन्त कहीं न पाया । वशिष्ठजी की कृपा से अब मुझको स्वरूप का साक्षात्कार हुआ, अविद्या नष्ट हुई और मैं परमानन्द को प्राप्त हुआ हूँ ।

इति श्रीयो० निर्वाण० द्विशताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४३ ॥

वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! जब इस प्रकार विपश्चित् ने कहा, तब सायंकाल हुआ और सूर्य अन्तर्धान हो गये—मानों विपश्चित् का वृत्तान्त देखने को अन्य सृष्टि में गये—और नौबत-नगाड़े बजने लगे, मानो राजा दशरथ की जय-जय करते हैं । उस समय राजा दशरथ ने धन, रत्न और वस्त्राभूषण से राजा विपश्चित् का यथायोग्य पूजन किया । दशरथ आदि सब राजाओं ने वशिष्ठजी को प्रणाम किया और परस्पर प्रणाम करके सब सभासद् अपने-अपने स्थानों को गये । सबने स्नान करके यथाक्रम भोजन किया और नियम करके विचार-सहित रात्रि व्यतीत की । जब सूर्य की किरणें उदय हुईं तो फिर अपने-अपने स्थान पर आकर परस्पर नमस्कार करके बैठे । तब वशिष्ठजी पूर्व के प्रसंग को लेकर बोले, हे राम ! यह अविद्या अविद्यमान है । है नहीं, पर भासित होती है, यही आश्चर्य है । जो वस्तु सदा विद्यमान है, वह नहीं भासित होती । अविद्या है नहीं, पर सदा भासित होती है, इसी से इसका नाम अविद्या है । हे राम ! आत्मसत्ता अनुभव-रूप है । इसका अनुभव होना अनिश्चित हो रहा है । अविद्याकृत जगत् जो कभी कुछ हुआ नहीं वह स्पष्ट होकर भासित होता है—यही अविद्या है । हे राम ! सिद्ध राजा के मन्त्री का उपदेश भी तुमने सुना और विपश्चित् का वृत्तान्त भी विपश्चित् के मुख से ही सुना । अब

७७८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

इस विपश्चित की अविद्या मेरे आशीर्वाद और यथार्थ वचनों से नष्ट होती है और अब यह जीवन्मुक्त होकर विचरेगा। मेरे उपदेश से इसकी अविद्या अब नष्ट होती है। अतः जीवन्मुक्त होकर जहाँ-जहाँ इसकी इच्छा हो विचरे। जब जीव आत्मा की ओर आता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है।

आत्मतत्त्व को यथार्थ न जानने ही का नाम अविद्या है, जो आत्मज्ञान से नष्ट हो जाती है। जैसे अन्धकार तब तक रहता है, जब तक सूर्य उदय नहीं हुआ। जब सूर्य उदय होता है, तब अन्धकार नष्ट हो जाता है। वैसे ही अविद्या तब तक अनन्त है, जब तक मनुष्य आत्मा की ओर नहीं आता। पर जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब अविद्या का अत्यन्त अभाव हो जाता है। अविद्या अविद्यमान है, पर असम्यक्दर्शी को सत्य भासित होती है। जैसे मृगतृष्णा का जल अविद्यमान है, और विचार करने से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही भली प्रकार विचार करने से अविद्या का अभाव हो जाता है। हे राम! अविद्यारूपी विष की बेल देखने भर को फूल सहित सुन्दर दिखती है, परन्तु स्पर्श करने से काँटे चुभते हैं और उसके फल भक्षण करने से कष्ट होता है। ये सब इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध देखने भर को सुन्दर लगते हैं। ये ही फूल फल हैं, पर जब इनका स्पर्श करते हैं, तब तृष्णा-रूपी कण्टक चुभते हैं और इन्द्रियों के भोग भोगने से राग, द्वेष और कष्ट प्राप्त होता है। हे राम! अविद्या भीतर से खोखली है, पर बाहर से बड़े अर्थ से युक्त लगती है। जैसे आकाश में इन्द्रधनुष नानाप्रकार के रंगों सहित दिखता है, परन्तु भीतर से शून्य है—अनहोती ही दिखता है, वैसे ही अविद्या अनहोती ही दिखती है। और जैसे इन्द्रधनुष जलरूप मेघ के आश्रय से रहता है, वैसे ही यह अविद्या जड़ मूर्खों के आश्रय में रहती है। अविद्यारूपी धूल जिसको स्पर्श करती है, उसको ढक लेती है। जब तक अर्थ नहीं जाना, तब तक भासती है और विचार करने से कुछ नहीं निकलता। जैसे सीपी में रूपा दिखता है, पर विचार से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही विचार से अविद्या

  • निर्वाण प्रकरण * ७७६

का भी अभाव हो जाता है। विचार से ही अविद्या नष्ट हो जाती है। वह चञ्चल है और भासती है।

हे राम ! अविद्यारूपी नदी में तृष्णारूपी जल, इन्द्रियों के विषय-रूपी भँवर और रागद्वेषरूपी ग्राह हैं। जो पुरुष इस नदी के प्रवाह में पड़ता है, उसको बड़े कष्ट प्राप्त होते हैं। जो तृष्णारूपी प्रवाह में बहते हैं, उनको अविद्यारूपी नदी का अन्त नहीं मिलता, और जो किनारे के सामने होकर वैराग्य और अभ्यासरूपी नाव पर बढ़कर पार हुए हैं, उनको कोई कष्ट नहीं होता। जो पदार्थ अविद्यारूप हैं, उनमें जो भावना करते हैं, वे मूर्ख हैं। यह सब अविद्या का विलास है। एक ऐसी सृष्टि है, जिसमें सैंकड़ों चन्द्रमा, और सहस्रों सूर्य उदय होते हैं। कई ऐसी सृष्टियाँ हैं, जिनमें जीव सदा समताभाव को लिये विचरते हैं और सदा आनन्दित रहते हैं। कई ऐसी सृष्टि हैं, जिनमें अन्धकार कभी नहीं होता। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ प्रकाश और तम जीवों के अधीन हैं, अर्थात् जितना प्रकाश चाहें उतना ही करें। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ जीव न मरते हैं, और न बूढ़े होते हैं, सदा एकरस रहते हैं और प्रलय-काल में सब इकट्ठे ही मरते हैं। कहीं ऐसी सृष्टि है, जहाँ स्त्री कोई नहीं। कहीं पहाड़-जैसे जीवों के शरीर हैं। हे राम ! इस प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, सो सब अविद्या का विलास है। जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वायु बिना नहीं उठते, वैसे ही परमात्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग अविद्यारूपी वायु के संयोग से उठते हैं और मिट भी जाते हैं।

हे राम ! बड़े-बड़े मणि, मोती, सुवर्ण और धातुमय स्थान; भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य चारों प्रकार के तृप्त करनेवाले पदार्थ; घृतमय स्थान; ऊख के रस के समुद्र; माखन, दही और दूध के समुद्र; अमृत के तालाब; बड़े-बड़े कल्प और तमाल वृक्ष आदि सुन्दर स्थान और सुन्दर अप्सरा और बड़े दिव्य वस्त्र आदि जो पदार्थ हैं, वे सब संकल्परूप अविद्या के रचे हुए हैं। जो इनकी तृष्णा करते हैं वे मूर्ख हैं। उनके जीने को धिक्कार है। हे राम ! यह अविद्या का विलास है। विचार करने से कुछ नहीं निकलता। जैसे मरुस्थल में अनहोती नदी भासती है और

७८० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

विचार करने से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मविचार करने से अविद्या के विलासरूप जगत् का अभाव हो जाता है । जिसको आत्मा का प्रमाद है, उसको देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि इष्ट-अनिष्ट अनेक प्रकार के पदार्थ दिखते हैं और कारण-कार्य भाव से जगत् भी स्पष्ट दिखता है, पर जिसको आत्मा का अनुभव हुआ है, उसको सब आत्मा ही दिखता है। हे राम! एक दृष्ट और दूसरी अदृष्ट सृष्टि है । यह जो प्रत्यक्ष दिखती है, वह दृष्ट सृष्टि है और जो देखने में नहीं आती वह अदृष्ट सृष्टि है । पर दोनों तुल्य हैं। सिद्ध लोग आकाश में जो सृष्टि रच लेते हैं, वह संकल्पमात्र होती है । उनकी सृष्टि परस्पर अदृष्ट है और अनेक प्रकार की रचना है। उनकी सुवर्ण की पृथ्वी है । वह रत्न और मणियों से जड़ी हुई है । उसमें अनेक प्रकार के पदार्थ हैं अमृत के कुण्ड भरे हुए हैं । उनके अधीन तम और प्रकाश है और अनेक प्रकार की रचना बनी हुई है । वह सब संकल्पमात्र है । इसी प्रकार यह जगत् संकल्पमात्र है । जैसा-जैसा संकल्प होता है, वैसी ही वैसी सृष्टि आत्मा में ही भासित होती है । हे राम! आत्मारूपी डिब्बे में सृष्टिरूपी अनेक रत्न हैं । जिस पुरुष को आत्मदृष्टि प्राप्त हुई है, उसको सब सृष्टि आत्मरूप है । और जिसको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई है, उसको सब जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है । जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही पदार्थ होकर भासित होता है । जो कुछ जगत् दिखता है, वह सब संकल्पमात्र है । जो तुमको ऐसा तीव्र संवेग हो कि आकाश में नगर स्थित हो तो वही दिखने लगे ।

हे राम! जिस ओर मनुष्य दृढ़ निश्चय करता है, वही सिद्ध होता है । जो आत्मा की ओर एकाग्र होता है, तो वही सिद्ध होता है और जो दोनों ओर जाता है तो भटकता है । जो जगत् की सत्यता को छोड़कर आत्मपरायण हो रहे तो तीव्र भावना से मोक्ष प्राप्त होती है । और जो संसार की ओर भावना होती है, तो संसार की प्राप्ति होती है । निदान जैसा अभ्यास करता है, वही सिद्ध होता है । वास्तव में सृष्टि कुछ हुई नहीं, वही रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, उसके अनुसार