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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1580, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1580

७७६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कुछ भिन्न वस्तु नहीं; आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर दिखती है ।

हे राम ! चार सत्ता इस जगत् में फुरी हैं—सारथी, गोपती, समान ब्रह्मसत्ता और अविद्या। इनमें से सारथी और गोपतीसत्ता तो जिज्ञासु की भावना में भासित होती है, समानसत्ता ज्ञानी को भासित होती है और अविद्या अज्ञानी को भासित होती है । ये चारों भी ब्रह्म से भिन्न नहीं, ब्रह्म ही के नाम हैं । ब्रह्मसत्ता स्वभाव चेतनता से ऐसे ही भासित होती है । जैसे वायु फुरने से चलती जान पड़ती है और ठहरने से अचल लगती है, वैसे ही चेतनता (फुरने) से नाना प्रकार के कौतुक उठते हैं और फुरने से रहित चेतन निर्विकल्प हो जाता है । ऐसा पदार्थ कोई नहीं जिसमें सत्य न हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं, जिसमें असत्य न हो—सब समान है । जैसे आकाश के फूल हैं, वैसे ही घट, पटादिक हैं, और जैसे इनके उत्थान का अनुभव होता है, वैसे ही उनका अनुभव होता है । सब पदार्थ सत्ता ही से सत्य भासित होते हैं । सब शब्द अर्थ जो प्रकट हुए हैं वे सब मिट जाते हैं । इससे असत्य हैं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है, कभी अन्यथा नहीं होती । जो मरकर न जन्मे तो आनन्द है, क्योंकि मुक्त प्राणी और जो मरकर जन्म लेता है, वह भी अविनाशी हुआ, इसलिए शोक करना व्यर्थ है ।

हे रामजी ! जगत् के आदि में भी ब्रह्मसत्ता थी और अन्त में भी वही रहेगी । जब आदि और अन्त में वही है, तब मध्य में भी उसे ही जानिये । इससे सब जगत् आत्मरूप है और सब शब्द अर्थसंयुक्त हैं । सब शब्द और अर्थाकार का अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता ही है । जिसको यथार्थ अनुभव होता है, उसको ऐसे भासित होता है और जिसको यथार्थ अनुभव नहीं होता, उसको नाना प्रकार का जगत् भासित होता है, पर आत्मा में जगत् कुछ बना नहीं, सब आकाशरूप है और ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । ब्रह्म से भिन्न जो कुछ दिखता है, वह भ्रममात्र और नाशरूप है । सब दृश्य पदार्थ नाशरूप हैं । जिसने उन्हें सत्य जाना, उससे हमको कुछ प्रयोजन नहीं । जो दूसरा कुछ बना नहीं तो मैं क्या कहूँ ? जिसमें ये पदार्थ आभास फुरते हैं, उस अधिष्ठान को