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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1581, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1581

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७७७

देखे तो सब वही रूप भासित होंगे । जो पुरुष स्वभाव में स्थित है, उसको ये वचन सोहते हैं । मैंने अनन्त सृष्टियाँ देखी हैं और उनके भिन्न-भिन्न आचार भी देखे हैं । दसों दिशाओं में मैं फिरा हूँ और बहुत भोग भोगे हैं; बड़ी-बड़ी विभूति पाई और देखी और अनेक प्रकार की चेष्टाएँ की हैं, परन्तु मुझको सब स्वप्न प्रतीत हुआ, क्योंकि सब भोग पदार्थ और कर्म अविद्या के रचे हुए हैं । उसी अविद्या का अन्त होने को मैं अनेक युग पर्यन्त फिरा, पर अन्त कहीं न पाया । वशिष्ठजी की कृपा से अब मुझको स्वरूप का साक्षात्कार हुआ, अविद्या नष्ट हुई और मैं परमानन्द को प्राप्त हुआ हूँ ।

इति श्रीयो० निर्वाण० द्विशताधिकत्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४३ ॥

वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! जब इस प्रकार विपश्चित् ने कहा, तब सायंकाल हुआ और सूर्य अन्तर्धान हो गये—मानों विपश्चित् का वृत्तान्त देखने को अन्य सृष्टि में गये—और नौबत-नगाड़े बजने लगे, मानो राजा दशरथ की जय-जय करते हैं । उस समय राजा दशरथ ने धन, रत्न और वस्त्राभूषण से राजा विपश्चित् का यथायोग्य पूजन किया । दशरथ आदि सब राजाओं ने वशिष्ठजी को प्रणाम किया और परस्पर प्रणाम करके सब सभासद् अपने-अपने स्थानों को गये । सबने स्नान करके यथाक्रम भोजन किया और नियम करके विचार-सहित रात्रि व्यतीत की । जब सूर्य की किरणें उदय हुईं तो फिर अपने-अपने स्थान पर आकर परस्पर नमस्कार करके बैठे । तब वशिष्ठजी पूर्व के प्रसंग को लेकर बोले, हे राम ! यह अविद्या अविद्यमान है । है नहीं, पर भासित होती है, यही आश्चर्य है । जो वस्तु सदा विद्यमान है, वह नहीं भासित होती । अविद्या है नहीं, पर सदा भासित होती है, इसी से इसका नाम अविद्या है । हे राम ! आत्मसत्ता अनुभव-रूप है । इसका अनुभव होना अनिश्चित हो रहा है । अविद्याकृत जगत् जो कभी कुछ हुआ नहीं वह स्पष्ट होकर भासित होता है—यही अविद्या है । हे राम ! सिद्ध राजा के मन्त्री का उपदेश भी तुमने सुना और विपश्चित् का वृत्तान्त भी विपश्चित् के मुख से ही सुना । अब