योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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इस विपश्चित की अविद्या मेरे आशीर्वाद और यथार्थ वचनों से नष्ट होती है और अब यह जीवन्मुक्त होकर विचरेगा। मेरे उपदेश से इसकी अविद्या अब नष्ट होती है। अतः जीवन्मुक्त होकर जहाँ-जहाँ इसकी इच्छा हो विचरे। जब जीव आत्मा की ओर आता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है।
आत्मतत्त्व को यथार्थ न जानने ही का नाम अविद्या है, जो आत्मज्ञान से नष्ट हो जाती है। जैसे अन्धकार तब तक रहता है, जब तक सूर्य उदय नहीं हुआ। जब सूर्य उदय होता है, तब अन्धकार नष्ट हो जाता है। वैसे ही अविद्या तब तक अनन्त है, जब तक मनुष्य आत्मा की ओर नहीं आता। पर जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब अविद्या का अत्यन्त अभाव हो जाता है। अविद्या अविद्यमान है, पर असम्यक्दर्शी को सत्य भासित होती है। जैसे मृगतृष्णा का जल अविद्यमान है, और विचार करने से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही भली प्रकार विचार करने से अविद्या का अभाव हो जाता है। हे राम! अविद्यारूपी विष की बेल देखने भर को फूल सहित सुन्दर दिखती है, परन्तु स्पर्श करने से काँटे चुभते हैं और उसके फल भक्षण करने से कष्ट होता है। ये सब इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध देखने भर को सुन्दर लगते हैं। ये ही फूल फल हैं, पर जब इनका स्पर्श करते हैं, तब तृष्णा-रूपी कण्टक चुभते हैं और इन्द्रियों के भोग भोगने से राग, द्वेष और कष्ट प्राप्त होता है। हे राम! अविद्या भीतर से खोखली है, पर बाहर से बड़े अर्थ से युक्त लगती है। जैसे आकाश में इन्द्रधनुष नानाप्रकार के रंगों सहित दिखता है, परन्तु भीतर से शून्य है—अनहोती ही दिखता है, वैसे ही अविद्या अनहोती ही दिखती है। और जैसे इन्द्रधनुष जलरूप मेघ के आश्रय से रहता है, वैसे ही यह अविद्या जड़ मूर्खों के आश्रय में रहती है। अविद्यारूपी धूल जिसको स्पर्श करती है, उसको ढक लेती है। जब तक अर्थ नहीं जाना, तब तक भासती है और विचार करने से कुछ नहीं निकलता। जैसे सीपी में रूपा दिखता है, पर विचार से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही विचार से अविद्या