सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1583, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1583
  • निर्वाण प्रकरण * ७७६

का भी अभाव हो जाता है। विचार से ही अविद्या नष्ट हो जाती है। वह चञ्चल है और भासती है।

हे राम ! अविद्यारूपी नदी में तृष्णारूपी जल, इन्द्रियों के विषय-रूपी भँवर और रागद्वेषरूपी ग्राह हैं। जो पुरुष इस नदी के प्रवाह में पड़ता है, उसको बड़े कष्ट प्राप्त होते हैं। जो तृष्णारूपी प्रवाह में बहते हैं, उनको अविद्यारूपी नदी का अन्त नहीं मिलता, और जो किनारे के सामने होकर वैराग्य और अभ्यासरूपी नाव पर बढ़कर पार हुए हैं, उनको कोई कष्ट नहीं होता। जो पदार्थ अविद्यारूप हैं, उनमें जो भावना करते हैं, वे मूर्ख हैं। यह सब अविद्या का विलास है। एक ऐसी सृष्टि है, जिसमें सैंकड़ों चन्द्रमा, और सहस्रों सूर्य उदय होते हैं। कई ऐसी सृष्टियाँ हैं, जिनमें जीव सदा समताभाव को लिये विचरते हैं और सदा आनन्दित रहते हैं। कई ऐसी सृष्टि हैं, जिनमें अन्धकार कभी नहीं होता। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ प्रकाश और तम जीवों के अधीन हैं, अर्थात् जितना प्रकाश चाहें उतना ही करें। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ जीव न मरते हैं, और न बूढ़े होते हैं, सदा एकरस रहते हैं और प्रलय-काल में सब इकट्ठे ही मरते हैं। कहीं ऐसी सृष्टि है, जहाँ स्त्री कोई नहीं। कहीं पहाड़-जैसे जीवों के शरीर हैं। हे राम ! इस प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, सो सब अविद्या का विलास है। जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वायु बिना नहीं उठते, वैसे ही परमात्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग अविद्यारूपी वायु के संयोग से उठते हैं और मिट भी जाते हैं।

हे राम ! बड़े-बड़े मणि, मोती, सुवर्ण और धातुमय स्थान; भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य चारों प्रकार के तृप्त करनेवाले पदार्थ; घृतमय स्थान; ऊख के रस के समुद्र; माखन, दही और दूध के समुद्र; अमृत के तालाब; बड़े-बड़े कल्प और तमाल वृक्ष आदि सुन्दर स्थान और सुन्दर अप्सरा और बड़े दिव्य वस्त्र आदि जो पदार्थ हैं, वे सब संकल्परूप अविद्या के रचे हुए हैं। जो इनकी तृष्णा करते हैं वे मूर्ख हैं। उनके जीने को धिक्कार है। हे राम ! यह अविद्या का विलास है। विचार करने से कुछ नहीं निकलता। जैसे मरुस्थल में अनहोती नदी भासती है और