योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
- निर्वाण प्रकरण * ७७६
का भी अभाव हो जाता है। विचार से ही अविद्या नष्ट हो जाती है। वह चञ्चल है और भासती है।
हे राम ! अविद्यारूपी नदी में तृष्णारूपी जल, इन्द्रियों के विषय-रूपी भँवर और रागद्वेषरूपी ग्राह हैं। जो पुरुष इस नदी के प्रवाह में पड़ता है, उसको बड़े कष्ट प्राप्त होते हैं। जो तृष्णारूपी प्रवाह में बहते हैं, उनको अविद्यारूपी नदी का अन्त नहीं मिलता, और जो किनारे के सामने होकर वैराग्य और अभ्यासरूपी नाव पर बढ़कर पार हुए हैं, उनको कोई कष्ट नहीं होता। जो पदार्थ अविद्यारूप हैं, उनमें जो भावना करते हैं, वे मूर्ख हैं। यह सब अविद्या का विलास है। एक ऐसी सृष्टि है, जिसमें सैंकड़ों चन्द्रमा, और सहस्रों सूर्य उदय होते हैं। कई ऐसी सृष्टियाँ हैं, जिनमें जीव सदा समताभाव को लिये विचरते हैं और सदा आनन्दित रहते हैं। कई ऐसी सृष्टि हैं, जिनमें अन्धकार कभी नहीं होता। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ प्रकाश और तम जीवों के अधीन हैं, अर्थात् जितना प्रकाश चाहें उतना ही करें। कई ऐसी सृष्टि हैं, जहाँ जीव न मरते हैं, और न बूढ़े होते हैं, सदा एकरस रहते हैं और प्रलय-काल में सब इकट्ठे ही मरते हैं। कहीं ऐसी सृष्टि है, जहाँ स्त्री कोई नहीं। कहीं पहाड़-जैसे जीवों के शरीर हैं। हे राम ! इस प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड फुरते हैं, सो सब अविद्या का विलास है। जैसे समुद्र में वायु से तरङ्ग उठते हैं, वायु बिना नहीं उठते, वैसे ही परमात्मरूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरङ्ग अविद्यारूपी वायु के संयोग से उठते हैं और मिट भी जाते हैं।
हे राम ! बड़े-बड़े मणि, मोती, सुवर्ण और धातुमय स्थान; भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य चारों प्रकार के तृप्त करनेवाले पदार्थ; घृतमय स्थान; ऊख के रस के समुद्र; माखन, दही और दूध के समुद्र; अमृत के तालाब; बड़े-बड़े कल्प और तमाल वृक्ष आदि सुन्दर स्थान और सुन्दर अप्सरा और बड़े दिव्य वस्त्र आदि जो पदार्थ हैं, वे सब संकल्परूप अविद्या के रचे हुए हैं। जो इनकी तृष्णा करते हैं वे मूर्ख हैं। उनके जीने को धिक्कार है। हे राम ! यह अविद्या का विलास है। विचार करने से कुछ नहीं निकलता। जैसे मरुस्थल में अनहोती नदी भासती है और
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विचार करने से उसका अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मविचार करने से अविद्या के विलासरूप जगत् का अभाव हो जाता है । जिसको आत्मा का प्रमाद है, उसको देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि इष्ट-अनिष्ट अनेक प्रकार के पदार्थ दिखते हैं और कारण-कार्य भाव से जगत् भी स्पष्ट दिखता है, पर जिसको आत्मा का अनुभव हुआ है, उसको सब आत्मा ही दिखता है। हे राम! एक दृष्ट और दूसरी अदृष्ट सृष्टि है । यह जो प्रत्यक्ष दिखती है, वह दृष्ट सृष्टि है और जो देखने में नहीं आती वह अदृष्ट सृष्टि है । पर दोनों तुल्य हैं। सिद्ध लोग आकाश में जो सृष्टि रच लेते हैं, वह संकल्पमात्र होती है । उनकी सृष्टि परस्पर अदृष्ट है और अनेक प्रकार की रचना है। उनकी सुवर्ण की पृथ्वी है । वह रत्न और मणियों से जड़ी हुई है । उसमें अनेक प्रकार के पदार्थ हैं अमृत के कुण्ड भरे हुए हैं । उनके अधीन तम और प्रकाश है और अनेक प्रकार की रचना बनी हुई है । वह सब संकल्पमात्र है । इसी प्रकार यह जगत् संकल्पमात्र है । जैसा-जैसा संकल्प होता है, वैसी ही वैसी सृष्टि आत्मा में ही भासित होती है । हे राम! आत्मारूपी डिब्बे में सृष्टिरूपी अनेक रत्न हैं । जिस पुरुष को आत्मदृष्टि प्राप्त हुई है, उसको सब सृष्टि आत्मरूप है । और जिसको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई है, उसको सब जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है । जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही पदार्थ होकर भासित होता है । जो कुछ जगत् दिखता है, वह सब संकल्पमात्र है । जो तुमको ऐसा तीव्र संवेग हो कि आकाश में नगर स्थित हो तो वही दिखने लगे ।
हे राम! जिस ओर मनुष्य दृढ़ निश्चय करता है, वही सिद्ध होता है । जो आत्मा की ओर एकाग्र होता है, तो वही सिद्ध होता है और जो दोनों ओर जाता है तो भटकता है । जो जगत् की सत्यता को छोड़कर आत्मपरायण हो रहे तो तीव्र भावना से मोक्ष प्राप्त होती है । और जो संसार की ओर भावना होती है, तो संसार की प्राप्ति होती है । निदान जैसा अभ्यास करता है, वही सिद्ध होता है । वास्तव में सृष्टि कुछ हुई नहीं, वही रूप है । जैसी-जैसी भावना होती है, उसके अनुसार
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जगत् भासित होता है । जिसकी भावना धर्म की ओर होती है और जो सकाम होता है, उसको स्वर्गादिक सुख भासित होते हैं और जिसकी भावना अधर्म में होती है, उसको नरकादिक भासित होते हैं। शुभ कर्मों से शान्ति की आशा हो सकती है । शुभ भी दो प्रकार के हैं—एक से स्वर्गसुख भासित होते हैं और दूसरे को सिद्ध की भावना से सिद्ध-लोक भासित होते हैं । जिसको अशुभ भावना होती है, उसको नाना प्रकार के नरक दिखते हैं । हे राम ! जब यह संवित् अनात्म में आत्म-अभिमान करती है और उनके कर्मों में अपने को कर्त्ता जानती है, वह पाप करके ऐसे अनेक दुःखों को प्राप्त होती है, जो कहे नहीं जाते—जैसे पहाड़ों में दब जाने से बड़ा कष्ट होता है अथवा अङ्गारों की वर्षा और अन्धे कूप में गिरने से कष्ट होता है । पर-स्त्री के भोगने से अङ्गारों में जलना होता है और अग्नि-तप्त लोहे को कण्ठ लगाना पड़ता है । जिस स्त्री ने परपुरुष को भोगा है, वह अन्धे कूपरूप ओखली में खड्गरूपी मूसल से कुटती है । जो देहाभिमानी देवतों, पितरों और अतिथि को दिये विना भोजन करता है, उसको भी यम के दूत बड़ा कष्ट देते हैं । खड्ग और बरछी से उसके मांस को काटते और प्रहार करते हैं । वे परलोक में क्षुधा और तृष्णा से कष्ट पाते हैं । जिन नेत्रों से व्यभिचारियों ने पर-स्त्री देखी हैं, उन पर छुरी का प्रहार होता है । एक वृक्ष है, जिसके पत्ते खड्ग के प्रहार की नाईं लगते हैं और शूली के ऊपर चढ़ने से लेकर अनेक कष्ट उनको प्राप्त होते हैं । जो शुभकर्म करते हैं, वे स्वर्ग भोगते हैं । इससे जीव जैसे-जैसे कर्म करते हैं, उनके अनुसार जगत् देखते हैं और जिन-जिन भावों का चिन्तन करते शरीर त्यागते हैं, वे उनको प्राप्त होते हैं । केवल वासनामात्र संसार है । जैसा निश्चय होता है वैसा ही भासित होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्वर्गनरकप्रारब्धवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४४ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो तुमने मुनीश्वर और वधिक का वृत्तान्त कहा, सो बड़ा आश्चर्यरूप है । यह वृत्तान्त स्वाभाविक हुआ
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है अथवा किसी कारण कार्य से हुआ है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे समुद्र से तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही ब्रह्म में यह प्रतिभा स्वाभाविक उठती है । और जैसे पवन में फुरना स्वाभाविक होता है वैसे ही आत्मा का चमत्कार जगत् की रचना स्वाभाविक होती है । सो वही रूप है, उससे भिन्न नहीं । चिन्मात्र में जो चेतना जगी है, वह जैसी जगी है, वैसे ही स्थित है । जबतक इससे भिन्न और स्फुरण नहीं होता, तबतक वही रहता है । जिस प्रतिभा में कार्यकारण भासित होती है—जैसे शुद्ध चिदाकाश में स्वप्न की सृष्टि भासित होती है—उसमें साररूप वही है । वही चित्त के चमत्कार से जगता है—जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, सो समुद्ररूप हैं, उससे भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही सब शब्द अर्थ से युक्त जगत् जो भासता है, वही चिन्मात्र है, भिन्न कुछ वस्तु नहीं । जिनका ऐसा यथार्थ अनुभव हुआ है, उनको जगत् स्वप्नरूप और संकल्पनगर भा दिखता है । पृथ्वी आदि पदार्थ पिण्डाकार नहीं दिखते सब ब्रह्म रूप भासित होता है । हे राम ! जो वस्तु व्यभिचारी और नाशवान् है, वह अविद्यारूप है, और जो अव्यभिचारी और अविनाशी है वह ब्रह्मसत्ता है । वह ब्रह्मसत्ता ज्ञानसंविद्रूप है और अपने भाव को कदापि नहीं त्यागती । वह अनुभव से सर्वदा प्रकाश पाती है । उसमें अविद्या कैसे हो ? जैसे समुद्र में धूल का अभाव है, वैसे ही आत्मा में अविद्या का अभाव है । जो सब आकार दिखते हैं, वे सब चिदाकाश रूप हैं—जैसे तुम अपने मन में संकल्प रचकर इन्द्र हो बैठो और चेष्टा भी इन्द्र की सी करने लगो, अथवा ध्यान में इन्द्र को रचो और ध्यान से प्रतिभा सिद्ध हो आवे तो जबतक वह संकल्प रहेगा, तब तक वही भासित होगा । जब इन्द्र का संकल्प क्षीण हो जायगा, तब इन्द्र की चेष्टा भी निवृत्त हो जायगी । सो संकल्प से वही चिन्मात्र इन्द्ररूप होकर भासित होता है; वैसे ही यह सब जगत् जो दिखता है, वह सब चिन्मात्ररूप है पर संवेदन द्वारा पिण्डाकार होकर भासित होता है । जब संवेदन जगना निवृत्त होता है, तब सब जगत् आत्मरूप भासित होता है ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८३
ब्रह्मसत्ता तो सदा अपने आप में स्थित है, पर जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही भासता है—सब जगत् उसी का चमत्कार है। जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप होते हैं, वैसे ही निराकार परमात्मा में जगत् भी आकाश-रूप है। भिन्न कुछ नहीं, सब ब्रह्मस्वरूप है। इसका नाम परमबोध है। जब इस बोध की दृढ़ता होती है, तब मोक्ष होता है। जिसको सम्यक्-बोध होता है, उसको सब जगत् ब्रह्मस्वरूप अपना ही रूप भासित होता है। जिसको सम्यग्बोध नहीं हुआ, उसको नाना प्रकार का द्वैतरूप जगत् भासित होता है। हे राम! जिसकी बुद्धि शास्त्रों के अभ्यास से तीक्ष्ण हुई है और वैराग्य के अभ्यास से सम्पन्न और निर्मल है, उसको आत्मपद प्राप्त होता है। जिसकी बुद्धि शास्त्र के अर्थ से निर्मल नहीं हुई, उसको अज्ञान से जगत् भासित होता है। जैसे किसी पुरुष के नेत्र में दोष होता है तो उसको आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं और भ्रम से तारे दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से जगत् भासित होता है। यह सब जाग्रत् जगत् स्वप्नमात्र है। जब जीव स्वप्न में होता है, तब स्वप्न भी जाग्रत् लगता है, जाग्रत् स्वप्न हो जाता है, जाग्रत् में स्वप्न का अभाव हो जाता है और जाग्रत् सत्य प्रतीत होता है। अल्प-काल का नाम स्वप्न है और दीर्घकाल का नाम जाग्रत् है, पर आत्मा में दोनों तुल्य हैं। जैसे जो दो भाई जोड़े जन्मते हैं, वे नाममात्र के दो होते हैं, वास्तव में एकरूप हैं, वैसे ही जाग्रत् स्वप्न-तुल्य ही हैं। जब पुरुष शरीर को त्यागता है, तब परलोक जाग्रत् हो जाता है और यह जगत् स्वप्नवत् हो जाता है। जैसे जीव स्वप्न से जागकर स्वप्न के पदार्थों को भ्रममात्र जानता है और जाग्रत् को सत् जानता है, वैसे ही जब जीव परलोक को जाता है, तब इस जगत् को स्वप्न जानता है और कहता है कि स्वप्न-सा मैंने देखा था और उसे परलोक सत्य भासित होता है। फिर वहाँ से गिरकर इस लोक में आ पड़ता है, तब इस लोक को सत्य जानता है और जाग्रत् मानता है, तथा उस परलोक को स्वप्नभ्रम मानता है।
हे राम! जब तक शरीर से सम्बन्ध है, तब तक जीव अनेक बार
७८४ ✤ योगवाशिष्ठ ✤
जाग्रत् देखता है और अनन्त स्वप्न देखता है । हे राम ! जैसे मृत्युपर्यन्त अनेक स्वप्न आते हैं, वैसे ही मोक्षपर्यन्त अनेक जाग्रतरूप जगत् भासते हैं । तब जीव भ्रमान्तर में इनकी सत्यता और जाग्रत् में स्वप्न के पदार्थ स्मरण करता है । जैसे सिद्ध प्रबुद्ध होकर अपने जन्म को स्मरण करता है और कहता है कि सब भ्रममात्र थे, वैसे ही यह जीव जब जागेगा, तब कहेगा कि सब भ्रममात्र प्रतिभा मुझको भासित हुई थी । न कोई बँधा है और न कोई मुक्त है, क्योंकि दृश्य अविद्याकृत बन्धन-मोक्ष ऐसा है कि जब चित्त की वृत्ति निर्विकल्प होती है, तब मोक्ष भासित होता है और जब तक वासना का विकल्प सत्य है, तब तक बन्धन प्रतीत होता है । हे राम ! आत्मा में बन्धन या मोक्ष दोनों नहीं हैं, क्योंकि बन्धन हो तो मोक्ष भी हो, पर जब बन्धन ही नहीं तो मोक्ष कैसे हो ? बन्धन और मोक्ष दोनों, चित्तसंवेदन में भासते हैं, इससे चित्त को निर्वाण करो, तब सब कल्पना मिट जावेगी । जितने पदार्थों का प्रतिपादन करनेवाले शब्द हैं, उनको त्यागकर निर्मल ज्ञानमात्र जो आत्मसत्ता है, उसमें स्थित हो रहो । खाना, पीना, बोलना, चलना आदि सब कर्म करो, परन्तु हृदय से परमपद पाने का यत्न करो । हे राम ! प्रथम नेति-नेति करके सब शब्दों का अभाव करो । फिर अभाव का भी अभाव करो । तब उसके पीछे जो शेष रहेगा, वह आत्मसत्ता परम निर्वाणरूप है । उसी में स्थित हो रहो । जो कुछ अपना आचार कर्म है, उसे यथाशास्त्र करके हृदय से सब कल्पनाओं का त्याग करो—इस प्रकार आत्मसत्ता में स्थित हो रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणोपदेशो नाम द्विशताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे सब चिदाकाश आत्मरूप हैं । ज्ञानवान् को सदा वही भासित होता है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । रूप, दृश्य, अवलोक, इन्द्रियाँ और मनस्कार के स्फुरण का नाम संसार है । सो यह भी आत्मरूप है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । जैसे अपनी ही संवित् स्वप्न
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ७८५
में रूप, अवलोक और मनस्कार होकर दिखती है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न भासित होते हैं। जो जागा है, उसको अपना रूप भासित होता है। जैसे अपनी चैतन्यता ही स्वप्नपुर होकर दिखती है, वैसे ही जगत् के पूर्व जो चैतन्यसत्ता थी, वही जगत् रूप होकर भासित होती है। जगत् आत्मा से कुछ भिन्न वस्तु नहीं, वही स्वरूप है। जैसे जल का स्वभाव द्रवीभूत होता है, इससे तरंगरूप होकर भासित होता है, वैसे ही आत्मा का स्वभाव चैतन्य है। वही आत्मसत्ता चेतनता से जगत् आकार होकर भासती है। इस प्रकार जानकर परम शान्ति निर्वाणपद में स्थित हो रहो। हे राम ! जगत् कुछ है नहीं, और प्रत्यक्ष भासता है; असत् ही सत् होकर भासित होता है। यही आश्चर्य है कि निष्किञ्चन और किञ्चन की नाईं होकर भासित होता है। आत्मसत्ता सदा अद्वैत और निर्विकार है, परन्तु अज्ञानदृष्टि से नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं। जब सब विकारों को निषेध से असत् रूप जानिये, तब सबका अभाव होने पर आत्मसत्ता शेष रहती है। जैसे शून्य स्थान में अनहोता वेताल दिखता है, वैसे ही अज्ञानी को अनहोता जगत् आत्मा में भासित होता है। जो पुरुष स्वभाव में स्थित हैं, उनको जगत् भी अद्वैतरूप आत्मा दिखता है। जब सतशास्त्रों और सन्तों की संगति होती है और उनके तात्पर्य अर्थ में दृढ़ अभ्यास होता है, तब स्वभावसत्ता में स्थिति होती है।
जिन पदार्थों को पाने के लिए मनुष्य यत्न करता है, वे मायिक पदार्थ बिजली की चमक के समान उदय होते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। ये पदार्थ विचार बिना सुन्दर दिखते हैं और इनकी इच्छा मूर्ख करते हैं, क्योंकि उनको जगत् सत्य प्रतीत होता है। ज्ञानवान् को जगत् के पदार्थों की तृष्णा नहीं होती, क्योंकि वह जगत् को मृगतृष्णा की नाईं असत्य जानता है और ब्रह्मभावना में दृढ़ है। अज्ञानी को जगत् की भावना है, इससे ज्ञानी के निश्चय को अज्ञानी नहीं जानता। पर अज्ञानी के निश्चय को ज्ञानी जानता है। जैसे सोये हुए पुरुष को निद्रा-दोष से स्वप्न आता है, और उसमें जगत् दिखता है, पर
७८६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जाग्रत् पुरुष जो उसके निकट बैठा है, उसका वह स्वप्न का जगत् नहीं दिखता। वह असत् है, इसलिए उसके निश्चय को स्वप्नवाला नहीं जानता और स्वप्नवाले के निश्चय को वह जाग्रत्वाला नहीं जानता। वैसे ही ज्ञानी के निश्चय को अज्ञानी नहीं जानता। मृत्तिका की सेना को बालक सेना मानता है, पर जो जाननेवाले बड़े पुरुष हैं उनको वह सब सेना मृत्तिकारूप दिखती है। जब वह बालक भी भली प्रकार जानने लगता है, तब उसकी दृष्टि में भी सेना और वेताल का अभाव हो जाता है, मृत्तिका ही भासती है। वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् ब्रह्मरूप ही जान पड़ता है। हे राम! जब पुरुष को आत्मा का अनुभव होता है, तब जगत् के पदार्थों की इच्छा नहीं रहती। जैसे स्वप्न में किसी को मणि प्राप्त होती है तो वह प्रीति करके उसको रखता है, पर जब जागता है, तब उसे भ्रम जानकर उसकी इच्छा नहीं करता, वैसे ही जब जीव आत्मपद में जागेगा, तब जगत् के पदार्थों की इच्छा न करेगा। जैसे जो कोई मरुस्थल की नदी को असत्य जानता है, वह उसमें जलपान के लिए यत्न नहीं करता, वैसे ही जो जगत् को असत्य जानता है, वह उसके पदार्थों की इच्छा नहीं करता। जिस शरीर के लिए मनुष्य यत्न करता है, वह शरीर भी क्षणभंगुर है। जैसे पत्ते पर जो जल की बूँद स्थित होती है, वह क्षणभंगुर और असार है और पवन लगने से क्षण भर में गिर जाती है, वैसे ही यह शरीर भी नाशवान् है। जैसे धूप से तपा हुआ मृग मरुस्थल की नदी को सत्य जानकर जलपान करने के लिए दौड़ता है और मूर्खता के कारण कष्ट पाता है, परन्तु तृप्त नहीं होता, वैसे ही मूर्ख मनुष्य विषयों और पदार्थों को सत्य जानकर उनके लिए यत्न करता और कष्ट पाता है और कभी तृप्त नहीं होता।
हे राम! पुरुष अपना मित्र आप ही है और अपना शत्रु भी आप ही है। जब सत्यमार्ग में विचरता है और अपना उद्धार करता है, तब पुरुष-प्रयत्न से आप ही अपना मित्र होता है, और जब सत्यमार्ग में नहीं विचरता और पुरुष-प्रयत्न करके अपना उद्धार नहीं करता है, तब
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८७
वह जन्ममरण-संसार में अपने को डालता है। वह अपना आप ही शत्रु है। जो यत्न करके अपना उद्धार करता है, वह अपने ऊपर दया करता है। हे राम ! जो इन्द्रियों के विषयरूपी कीचड़ में गिरा हुआ है और अपने ऊपर दया नहीं करता, वह महा अज्ञान तम को प्राप्त होता है। जो पुरुष इन्द्रियों को जीतकर आत्मपद में स्थित नहीं होता, उसको शान्ति भी नहीं मिलती। जब बाल-अवस्था होती है, तब शून्यबुद्धि होती है; वृद्धावस्था में अङ्ग क्षीण हो जाते हैं और यौवन अवस्था में इन्द्रियों को नहीं जीत सकता, तो फिर कब कुछ करेगा ? जो तिर्यक् आदि योनियाँ हैं, वे मृतकवत हैं। यत्न का समय यौवनअवस्था है, क्योंकि बालअवस्था तो जड़ मूढ़रूप है और वृद्धअवस्था महानिर्बल सी है। उसमें अपने अङ्ग ही उठाने कठिन हो जाते हैं। तो विचार का क्या फल हुआ-वह तो बालकवत है। इससे यौवन अवस्था में ही कुछ यत्न हो सकता है। जो इस अवस्था में लम्पट रहा, वह महाअनिष्ट नरक को प्राप्त होगा। हे राम ! विषयों से प्रसन्न न होना। यह शरीर नाशरूप है तो विषय क्यों भोगे ? वेद-शास्त्र सुनकर भी जानता है और अनुभव करके भी जानता है कि यह शरीर नाशवान् है। पर उसी शरीर में सत्य की भावना करके जो विषयों के सेवन का यत्न करता है उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। वास्तव में वही सच्चा मूर्ख है। इससे जो इन्द्रियों को जीतेगा, वह फिर जन्म न पावेगा। हे राम ! तुम जागो और अपने को अविनाशी और अच्युत परमानन्दरूप जानो। यह जगत् मिथ्या है-इसको त्याग दो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकषट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४६ ॥
श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! तुम सत्य कहते हो कि इन्द्रियों को जीते बिना शान्ति नहीं होती। इससे इन्द्रियों को जीतने का उपाय कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष को बड़े भोग प्राप्त हुए हैं और उसने इन्द्रियों को जीता नहीं तो वह शोभा नहीं पाता। जो त्रिलोकी का राज्य प्राप्त किया और इन्द्रियाँ न जीतीं तो उसकी कुछ
७८८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
प्रशंसा नहीं। जो बड़ा शूरवीर है, पर उसने इन्द्रियों को नहीं जीता, उसकी भी शोभा कुछ नहीं। जिसकी बड़ी आयु है, पर उसने इन्द्रियाँ नहीं जीतीं तो उसका वह जीना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार इन्द्रियाँ जीती जाती हैं और आत्मपद प्राप्त होता है, सो सुनो। हे राम! इस पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य चिन्मात्र है। उसमें जो संवित् जगी है, उस ज्ञानसंवित् का अन्तःकरण और दृश्य जगत् से सम्बन्ध हुआ है—उसी का नाम जीव है। जहाँ से चित्त जगता है, वही चित्त को स्थिर करो, तब इन्द्रियों का अभाव हो जावेगा। इन्द्रियों का नायक मन है। जब मनरूपी मतवाले हाथी को वैराग्य और अभ्यासरूपी जंजीर से जकड़ कर वश करो, तब तुम्हारी जय होगी और इन्द्रियाँ रोकी जा सकेंगी। जैसे राजा को वश करने से सब सेना भी वश हो जाती है, वैसे ही मन को स्थिर करने से सब इन्द्रियाँ वश हो जावेंगी। हे राम! जब इन्द्रियों को वश करोगे, तब शुद्ध आत्मसत्ता तुमको भासित होगी। जैसे वर्षाकाल के न रहने पर शरत्काल में शुद्ध निर्मल आकाश दिखता है कुहरे और बादल का अभाव हो जाना है, वैसे ही जब मनरूपी वर्षाकाल और वासनारूपी कुहरे का अभाव हो जायगा, तब पीछे शुद्ध निर्मल आत्मसत्ता ही भासित होगी। हे राम! ये सब पदार्थ जो जगत् में दिखते हैं, वे असत्य हैं—जैसे मरुस्थल की नदी असत्य होती है—इनमें तृष्णा करना अज्ञान है। जो पदार्थ प्रत्यक्ष प्राप्त हों, उनको त्यागकर जब आत्मा की ओर वृत्ति आवे, तब जानिये कि मुझको इन्द्र का पद प्राप्त हुआ है।
विषयों में आसक्त होना ही बड़ी कृपणता है। इनसे उपराम होना ही बड़ी उदारता है। इससे मन को वश करो, जिसमें तुम्हारी जय हो। जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ में पृथ्वी जब तपती है, तब जो पैर में जूता होता है, तो तपन नहीं लगती, वैसे ही अपना मन वश करने से जगत् आत्मरूप हो जाता है। हे राम! जिस प्रकार जनेन्द्र ने मन को वश किया था, वैसे ही तुम भी मन को वश करो। जिस-जिस ओर मन जावे, उस-उस ओर से उसे रोको। जब दृश्य जगत् की ओर से मन को
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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रोकोगे, तब वृत्ति संवित् ज्ञान की ओर आवेगी। जब संवित् ज्ञान की ओर आई तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का अनुभव होगा। तीर्थ, दान और तप करके संवित् का अनुभव होना कठिन है, परन्तु मन को स्थिर करने से सुगम ही अनुभव की प्राप्ति होती है। मन स्थिर करने का उपाय यही है कि सन्तों की संगति करे और रात-दिन सत्शास्त्रों को विचारे। सर्वदा यही उपाय करने से शीघ्र ही मन स्थिर होता है, और जब मन स्थिर होता है, तब आत्म-पद का अनुभव होता है। जिसको आत्मपद प्राप्त हुआ है, वह संसार-समुद्र में नहीं डूबता। चित्तरूपी समुद्र में तृष्णारूपी जल और कामना-रूपी लहरें हैं। जिस पुरुष ने शम और सन्तोष से इन्द्रियाँ जीती हैं, वह चित्तरूप समुद्र में गोते न खायगा। जिसने इन्द्रियों को जीतकर आत्म-पद पाया है, उसको नानात्व जगत् फिर नहीं भासित होता। जैसे मरुस्थल की निराकार नदी में लहरें उठती हैं, पर जब निकट जाकर भली प्रकार देखिये तो वह लहरों के साथ बहती नहीं दिखती, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है। जब भली प्रकार विचार करके देखिये, तब नानात्व नहीं दिखता, आत्मसत्ता ही किञ्चन करके जगत्रूप होकर भासती है। जैसे जल अपने द्रव स्वभाव से तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मसत्ता चेतनता से जगत्रूप होकर भासती है।
हे राम ! जब आत्मबोध होता है, तब फिर दृश्यभ्रम नहीं भासता। जैसे साकाररूप नदी का भाव निवृत्त होता है तो फिर बहती है और जो निराकार नदी का सद्भाव निवृत्त होता है तब फिर नदी का सद्भाव होता है। निराकार मृगतृष्णा की नदी जब ज्यों की त्यों जानो तब फिर सत् नहीं होती। हे राम ! वास्तव में न कर्म हैं; न इन्द्रियाँ हैं, न कर्त्ता है अर्थात् कुछ उपजा नहीं। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की क्रिया और कर्म दिखते हैं, परन्तु सब आकाशरूप हैं, कुछ बनी नहीं, वैसे ही यह भी जानो। आकाशरूप आत्मा में आकाशरूप जगत् स्थित है। जैसे अवयवी और अवयव में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। और जैसे अवयव अवयवी का रूप है, वैसे ही जगत्
७६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻
आत्मा का रूप है। जब आत्मा में स्थित होगी, तब अहं-त्वं आदि शब्दों का अभाव हो जायगा और 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी न रहेंगे। 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी अज्ञानी को समझाने के लिए कहे हैं। जो वृद्ध, ज्ञानवान् हैं, वे इन शब्दों पर हँसते और कहते हैं कि अद्वैतपात्र में इन शब्दों का प्रवेश कहाँ है? जिनको यह अवस्था प्राप्त हुई है, उनको न बन्धन है और न मोक्ष है। हे राम! सुषुप्ति और तुरीयावस्था में कुछ थोड़ा ही भेद है। सुषुप्ति में अज्ञान और जड़ता रहती है और तुरीया-वस्था में अज्ञान और जड़ता नहीं रहना है। वह चैतन्य अनुभव सत्ता-रूप है। स्वप्न में जाग्रत् में भी भेद नहीं है। परन्तु इतना भेद है कि अल्पकाल की अवस्था को स्वप्न और चिरकाल की अवस्था को जाग्रत् कहते हैं।
हे राम! जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति, ये तीनों स्वप्न और सुषुप्ति-रूप हैं। जाग्रत् और स्वप्न ये उभय स्वप्नरूप हैं; सुषुप्ति अज्ञानरूप है; जाग्रत् तुरीयरूप है, और जाग्रत् कोई नहीं। जिसके जागने से फिर भ्रम प्राप्त हो, उसको जाग्रत् कैसे कहिये? उसको तो भ्रममात्र जानिये। जिस जागने से फिर भ्रम को प्राप्त हो, उसका नाम जाग्रत् है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, इन चारों अवस्थाओं में चिन्मात्र घनीभूत हो रहा है। वह चारों को नहीं देखता। ज्ञानवान् प्राण का स्पन्दन रोककर आत्मा की ओर चित्त को लगाते हैं, परस्पर ज्ञानमात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं और ज्ञान की ही कथा-कीर्तन करते और उससे प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत् पुरुष जो निरन्तर प्रीति-पूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्मविषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शान्ति को प्राप्त होते हैं। जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है। जो अज्ञानी हैं, वे रागद्वेष से जलते हैं। जिनको आत्मा का दृढ़ अभ्यास हुआ है, उनको शान्ति और आत्मस्थिति प्राप्त होती है। उन्हें उस स्थित के आगे इन्द्र का राज्य भी सूखे तृण सा-तुच्छ लगता है। सब जगत् उनको आत्मरूप दिखता है। जो अज्ञानी
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है, उनको नाना प्रकार के जगत् दिखते हैं। जैसे सोये हुए पुरुष को स्वप्न की सृष्टि सत्य भासती है, वैसे ही जाग्रत् को स्वप्न की सृष्टि भी अपना रूप जान पड़ती है। ज्ञानवान् को सब आत्मरूप दिखता है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता। जब आत्म-अभ्यास का बल हो और अनात्मा के अभाव का अभ्यास दृढ़ हो, तब जगत् का अभाव हो जाता है और अद्वैतसत्ता का भान होता है।
हे राम ! मैंने तुमको बहुत उपदेश किया है। जब इसका अभ्यास होगा, तब इसका फल ब्रह्मबोध हो प्राप्त होगा। वह बोध अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता। जो एक तृण लुप्त करना होता है तो भी कुछ यत्न करना होता है। यह तो त्रिलोकी लुप्त करनी है। हे राम ! जैसे बड़ा भार जिस पर पड़ता है, उससे वह बड़े ही बल से उठता है, बिना बड़े बल नहीं उठता, वैसे ही जीव पर दृश्यरूपी बड़ा भार पड़ा है, जब आत्मरूपी अभ्यास का बड़ा बल हो, तब वह इसको निवृत्त करे, नहीं तो निवृत्त नहीं होता। यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, इसको बारम्बार विचारो। मैंने तो तुमको बहुत प्रकार से और बहुत बार समझाया है। हे राम ! अज्ञानी को ऐसे बहुत कहने से भी कुछ फल नहीं होता। तुमको जो मैंने उपदेश किया है, वह सब शास्त्रों और वेदों का सिद्धान्त है। जिस प्रकार वेद का पाठ करते हैं, उसी प्रकार इसका पाठ कीजिये और विचारिये, इसके रहस्य को हृदय में धारण करिए। तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और अन्य शास्त्र भी इसके अवलोकन से सुगम हो जावेंगे। यदि नित्य इस शास्त्र को श्रद्धासहित सुने और कहे तो अज्ञानी जीव को भी अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। जो एक बार सुनकर कहने लगा है कि एक बार तो सुना है कि फिर क्या सुनना है, उसकी भ्रान्ति निवृत्त न होगी। जो बारम्बार सुने-विचारे और कहे तो उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। सब शास्त्रों से उत्तम युक्ति की संहिता मैंने कही है जो शीघ्र ही मन में बैठ जाती है। जो पुरुष मेरे शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, उनको बोध होता है और दूसरे शास्त्रों का अर्थ भी भली भाँति खुल जाता है। जैसे
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नमक का अधिकारी व्यञ्जन है। उसमें डाला गया नमक स्वादिष्ट होता है और प्रीति सहित ग्रहण किया जाता है, वैसे ही जो इस शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, वे और शास्त्रों का भी सुन्दर अर्थ करेंगे।
हे राम ! किसी और पक्ष को मानकर इसे सुनना त्यागा न चाहिए। जैसे किसी के पिता का खारी कुआँ था और उसके निकट एक मीठे जल का भी कुआँ था, पर वह अपने पिता का कूप मानकर खारी ही जल पीता था और निकट के मीठे जल के कुएँ का त्याग करता था, वैसे ही अपने पक्ष को मानकर मेरे शास्त्र का त्याग न करना। जो ऐसे जानकर मेरे शास्त्र को न सुनेगा, उसको ज्ञान न प्राप्त होगा। जो पुरुष इस शास्त्र में दोष का आरोपण करेगा कि यह सिद्धान्त यथार्थ नहीं कहा, उसको कभी ज्ञान न प्राप्त होगा—वह आत्महन्ता है, उसके वाक्य न सुनना। जो प्रीतिपूर्वक पूज्य भाव करके श्रद्धा से सुनेगा और विचार कर पाठ करेगा, उसको निर्मल ज्ञान प्राप्त होगा और उसके कर्म भी निर्मल होंगे। इससे यह नित्यप्रति विचारने योग्य है। हे राम ! तुमको मैंने अपने किसी स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं किया, केवल दया करके किया है। तुम जो किसी से कहना तो स्वार्थ के बिना दया करके कहना।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रिययज्ञवर्णनं नाम द्विशताधिकसप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा में जगत् कुछ हुआ नहीं। जब शुद्ध चिन्मात्र में अहँ जगता है, तब वही संवेदन जगना जगद्रूप भासित होता है। और जब वह अधिष्ठान की ओर देखता है, तब वही संवेदन अधिष्ठानरूप हो जाता है, अपने रूप को त्यागकर अचेत चिन्मात्र होता है। हे राम ! स्फुरण और अस्फुरण, दोनों में वही है। परन्तु फुरने से जगत् भासता है। वह जगत् भी कुछ और वस्तु नहीं वही रूप है। जब संवित् संवेदन फुरने से रहित होती है, तब चिन्मात्र-रूप हो जाती है। इस कारण ज्ञानवान् को जगत् आत्मरूप भासता है, ब्रह्म से भिन्न नहीं दिखता। जैसे किसी पुरुष का मन और जगह गया
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होता है तो उसके आगे शब्द होने पर भी वह उसे नहीं सुनाई देता, वह कहता है कि मैंने देखा या सुना कुछ नहीं, क्योंकि जिस ओर चित्त होता है, उसी का अनुभव होता है वैसे ही जिनका मन आत्मा की ओर लगता है, उनको सब आत्मा ही दिखता है—आत्मा से भिन्न जगत् नहीं प्रतीत होता। पर जिसको आत्मसत्ता का प्रमाद है और जगत् की ओर चित्त है, उसको जगत् ही दिखता है। हे राम! ज्ञानवान् के निश्चय में ब्रह्म ही है और अज्ञानी के निश्चय में जगत्। तब ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय एक कैसे हो? जो मनुष्य स्वप्न देख रहा है, उसे स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत् को वह जगत् नहीं दिखता। तब उनका एक ही निश्चय कैसे हो? जगत् के आदि और अन्त दोनों में ब्रह्मसत्ता है और मध्य में भी उसे ही जानो—आत्मसत्ता ही चेतनता से जगतरूप होकर दिखती है। जैसे स्वप्न की सृष्टि के आदि में भी ब्रह्मसत्ता होती है; अन्त में भी ब्रह्मसत्ता होती है और मध्य में जो भासित होता है, वह भी वही है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही यह जगत् आदि, अन्त और मध्य में भी आत्मा से भिन्न नहीं।
ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय है कि जगत् कुछ उपजा नहीं और न उपजेगा, केवल आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और सब ब्रह्म ही है। अहं-त्वं आदि अज्ञान से भासित होता है। जैसे स्वप्न में अहं-त्वं आदि का अनुभव होता है तो अहं-त्वं आदि भी कुछ नहीं, सब अनुभव-रूप है, वैसे ही यह सब जगत् अनुभवरूप है। हे राम! जैसे एक ही रस फूल, फल, टहनी और वृक्ष होकर दिखता है, रस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही नानात्वरूप जगत् दिखता है परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं है, जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर अपने-अपने अनुभव से भिन्न नहीं परन्तु स्वरूप के विस्मरण से आकाररूप दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् का आकार जो दिखता है, वह ज्ञानरूप से भिन्न नहीं है। सब जगत् आत्मरूप है, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न लगता है। यह सब जगत् अपना आप रूप है। जब आत्मरूप है तब ग्राह्य-ग्राहकभाव कैसे हो? यह मिथ्या भ्रम है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, घट, पट आदिक
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सब जगत् ब्रह्मरूप है। ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय रहता है कि अचेत चिन्मात्र अपने रूप में स्थित है। ब्रह्मादिक भी कुछ स्फुरित होकर उदय नहीं हुए, ज्यों के त्यों हैं। उत्थान कुछ नहीं हुआ। परन्तु अज्ञानी के निश्चय में नाना प्रकार का जगत् और उत्पत्ति, स्थित, प्रलय, ब्रह्मादिक सब हैं। हे राम! यह कुछ उपजा नहीं, कारणत्व के अभाव से सदा एकरस आत्मसत्ता ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकाष्टचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब जाग्रत् और स्वप्न का निर्णय सुनो। जब मनुष्य सो जाता है, तब स्वप्न की सृष्टि देखता है। वह जाग्रतरूप भासित होती है। और जब स्वप्न निवृत्त होता है, तब फिर यह सृष्टि देखता है तो यही जाग्रत् होकर भासित होती है। यहाँ सोकर स्वप्न में जाग्रत् होती है और वहाँ सोकर यहाँ जाग्रत् होती है। तो स्वप्न जाग्रत् हुआ। जाग्रत् जो वस्तु है वह आत्मसत्ता है। उसमें जागना वही जाग्रत् में जाग्रत् है, और सब स्वप्न-जाग्रत् है। जब मनुष्य यहाँ शयन करता है, तब स्वप्न का जगत् सत्य होकर दिखता है और यह असत्य हो जाता है, और स्वप्न में वहाँ शयन करता है, अर्थात् जब स्वप्न से निवृत्त होता है और जाग्रत् में जागता है, तब वह असत्य हो जाता है, और वह स्वप्न जाग्रत् में स्मरण हो आता है। जब जाग्रत् में सोया और स्वप्न में जागा, तब जाग्रत् स्वप्नभाव को प्राप्त हुई, और जब स्वप्न से उठकर जाग्रत् में आया तब स्वप्नरूप जाग्रत् स्मृति भाव को प्राप्त हुई। जब सब जाग्रत् हुई तो हे राम! स्वप्न तो कोई न हुआ। इसको सब जगह जाग्रत् हुई। और जाग्रत् तो कोई न हुई, क्योंकि जब जाग्रत् से स्वप्न में गया, तब स्वप्न जाग्रतरूप हो गया और जाग्रत् स्वप्न हो गई, और जब स्वप्न से जाग्रत् में आया, तब जाग्रत् जाग्रतरूप हो गई और स्वप्न जाग्रत्-स्वरूप हो गई। तो हुआ यह कि जाग्रत् कोई नहीं, सब स्वप्न और असत्यरूप है।
अपने काल में यह जाग्रत् है और स्वप्नरूप है। जब प्राणी यहाँ से
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मृतक होता है, तब यह जगत् स्वप्नरूप होता है, स्वप्नरूप परलोक जाग्रत् हो जाता है और जाग्रत् स्मृति प्रत्यक्ष हो जाती है तो उसमें वह नहीं रहता और उसमें वह नहीं रहता। और जाग्रत्, स्वप्न, दोनों में परलोक नहीं रहता। इस जाग्रत् में देखिये तो स्वप्न और परलोक दोनों नहीं दिखते और स्वप्न में इस जाग्रत् और परलोक दोनों का अभाव हो जाता है। तो यह सिद्ध हुआ कि सब स्वप्नमात्र है। हे राम! चिरकाल की प्रतीति को जाग्रत् और अल्पकाल की प्रतीति को स्वप्न कहते हैं। जो आदि स्वप्न हुआ और उसमें दृढ़ अभ्यास हो गया, इससे जाग्रत् होकर भासित होती है; इसलिए जो आकार तुमको सत्य लगते हैं, वे सब निराकार आकाशरूप हैं, कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्न में त्रिलोकी-जगत्भ्रम उदय होता है, परन्तु सब आकाशरूप होता है, वैसे ही ये जगत् के पदार्थ अविद्या से साकार दिखते हैं। ये सब निराकार और आकाशरूप हैं। जब आत्मतत्त्व अधिष्ठान में जागोगे, तब सभी आकाशरूप दिखेंगे। अद्वैत आत्मतत्त्व में जो ग्राह्य-ग्राहकभाव दिखता है, सो मिथ्या कल्पना है, वास्तव में कुछ नहीं। सब जगत् मृगतृष्णा के जलसरीखा मिथ्या है। उसमें ग्रहण और त्याग क्या कीजिये? इन दोनों की कल्पना को दूर करो। यह हो और यह न हो, इस कल्पना को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो रहो, तब सम्पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकोनपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ २४९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! इन अर्थों का जो आश्रयभूत है, वह मैं तुमसे कहता हूँ। इस जगत् के आदि में अद्वैत चिन्मात्र था, उसमें किसी शब्द की प्रवृत्ति न थी—अशब्द पद था। फिर उसमें जागना जगा और उसका आभास जगत् हुआ। उस आभास में जिनका अधिष्ठान की अहंप्रतीति है, उनको जगत् आकाशरूप दिखता है, और वह संसार में नहीं डूबता, क्योंकि उसके अज्ञान का अभाव है। जो डूबता नहीं, वह निकलता भी नहीं; उसके लिए अज्ञान की निवृत्ति
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और ज्ञान का भी अभाव है, क्योंकि वह स्वतः ज्ञानस्वरूप है। जिनको अधिष्ठान का प्रमाद हुआ है, उनको दोनों अवस्थाएँ होती हैं। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् आत्मरूप दिखता है और जो ज्ञान से रहित है, उसको भिन्न भिन्न नामरूपवाला जगत् भासित होता है। हे राम! आत्मा निराख्यात है। वह चारों आख्यातों से रहित निराभाससत्ता है। चारों आख्यात उसमें आभास हैं। एक आख्यात, दूसरा विपर्य-याख्यात, तीसरा असत्याख्यात और चौथा आत्माख्यात, ये चार आख्यात हैं। आख्यात ज्ञान को कहते हैं। यह ज्ञान 'कि मैं अपने को नहीं जानता,' आख्यात है। अपने को देह-इन्द्रियरूप जानने का नाम विपर्ययाख्यात है। जगत् असत्य जानने का नाम असत्याख्यात है और आत्मा को आत्मा जानने का नाम आत्माख्यात है। ये चारों आख्यात चिन्मात्र आत्मतत्त्व के आभास हैं। आत्मसत्ता निर्विकल्प अचेत चिन्मात्र है। उसमें वाणी की गति ही नहीं है। हे राम! जगत् भी वही स्वरूप है, और कुछ बना नहीं। वह तत्त्व घनशिला की नाईं अविन्त्य स्वरूप है।
इस पर एक आख्यान है, जो श्रवणों का भूषण है, इसलिए तुमसे कहता हूँ। वह द्वैतदृष्टि का नाशकर, ज्ञानरूपी कमल का विकास करनेवाला सूर्य और परमपावन है। उसे सुनो। हे राम! एक बड़ी शिला है, जिसका कोटि योजन तक विस्तार है। वह अनन्त है, किसी ओर उसका अन्त नहीं आता, वह शुद्ध, निर्मल और निरासाध है, अर्थात् अणु-अणु से पुष्ट नहीं हुई, अपनी सत्ता से पूर्ण और परम सुन्दर है। जैसे शालग्राम की प्रतिमा सुन्दर होती है, वैसे ही वह सुन्दर है। जैसे शालग्राम पर शंख, चक्र, गदा और पद्म की रेखा होती हैं, वैसे ही उस पर रेखा है, और वही रूप है। वह वज्र से भी कठिन, शिला की नाईं निर्विकार और निराकार अचेतन परमार्थ है। यह जो कुछ चेतनता भासित होती है, वही उस पर रेखा है। अनन्त कल्प बीत गये हैं, परन्तु उसका नाश नहीं होता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये सब भी उस पर रेखा हैं। वह आप पृथ्वी आदि भूतों से
७६८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह शिला परमात्मा है। मैंने उसे शिलारूप इसलिए कहा कि यह घन चैतन्यरूप है, उससे इतर कुछ नहीं। वह अचिन्त्यरूप है। उस पर पञ्चतत्त्व रेखा है। वे रेखा भी वही रूप हैं। एक रेखा बड़ी है, जिसमें और रेखा रहती हैं। वह बड़ी रेखा आकाश है, जिसमें और तत्त्व रहते हैं। सब पदार्थ आकाश में हैं, सो सब वही रूप है। तुम भी वही रूप हो और मैं भी वही रूप हूँ। और कुछ हुआ नहीं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सब पदार्थ और कर्म जो भासित होते हैं, वे सब ब्रह्मरूपी शिला की रेखा है और कुछ हुआ नहीं। सब काल में ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। नाना प्रकार के व्यवहार भी देखे जाते हैं, परन्तु वही रूप हैं, और कुछ है ही नहीं। वैसे ही वह जानो। घट, पट, पहाड़ कन्दरा, स्थावर, जङ्गम, जगत् सब आत्मरूप है। आत्मा ही फुरने से ऐसे दिखता है। जैसे जल की लहरें होकर दिखता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है। और सब पदार्थ पवित्र, अपवित्र, सत्य, असत्य, विद्या, अविद्या, सब आत्मसत्ता ही के नाम हैं, इतर वस्तु कुछ नहीं है। ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम ! सभी वज्र ब्रह्मरूप है और चिन्मात्र घन ही सबमें व्याप रही है। पर परमार्थसत्ता घन शान्तरूप है और ये सब परमार्थ भी घनरूप हैं, इसलिए संकल्प-रूपी कल्पना को त्यागकर उसमें स्थित हो रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो पुरुष स्वभावसत्ता में स्थित हुए हैं, उनको ये चारों आख्यात कहे हैं। जितने और शब्दार्थ हैं, वे शशा के सींग की तरह असत्य हैं। जगत् का निश्चय उनमें नहीं रहता और सब ब्रह्माण्ड उनको आकाश सा दिखता है। आख्यात की कल्पना भी उन्हें कुछ नहीं फुरती। और सब जगत् जो दीखता है, वह निराकार परम चिदाकाशरूप है, परम निर्वाणसत्ता से युक्त दिखता है और उसी से निर्वाण हो जाता है, इसलिए वही स्वरूप है। हे राम ! जब इस प्रकार जानकर तुम उस पद में स्थित होगे, तब बड़ा शब्द करते हुए
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६६
भी तुम निश्चय से पाषाण-शिलासदृश मौन रहोगे और देखोगे, खाओगे, पियोगे, सूँघोगे, परन्तु तुम्हारे अपने निश्चय में कुछ न फुरेगा। जैसे पाषाण की शिला फुरना नहीं फुरता, वैसे ही तुम रहोगे-जो पैरों से दौड़ते जाओगे तो भी निश्चय ही चलायमान न होगे। जैसे आकाश और सुमेरु पर्वत अचल है, वैसे ही तुम भी स्थित रहोगे। क्रिया तो सब करोगे, परन्तु हृदय में क्रिया का अभिमान तुमको कुछ न होगा, केवल स्वभावसत्ता में स्थित होंगे। जैसे मूढ़ बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, सो वह अविचारसिद्धि है और विचार किये से कुछ नहीं रहता, वैसे ही मूर्ख अज्ञानी आत्मा में मिथ्या आकार की कल्पना करते हैं। विचार करने से सब आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। जैसे मरुस्थल में नदी तब तक दिखती है, जबतक विचार करके नहीं देखता और विचार करने से नदी नहीं रहती वैसे ही यह जगत् विचार करने से नहीं रहता। जगत् चैतन्यरूपी रत्न की चमक है। चैतन्य आत्मा का किञ्चन फुरने से ही जगतरूप भासित होता है।
रामजी बोले, हे भगवन्! इस जगत् का कारण मैं स्मृति को मानता हूँ। वह स्मृति अनुभव से होती है और स्मृति से अनुभव होता है। स्मृति और अनुभव परस्पर कारण हैं। जब अनुभव होता है, तब उसको स्मृति भी होती है। तो वह स्मृतिसंस्कार फिर स्वप्न में जगतरूप हो क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् किसी संस्कार से नहीं उपजा और किसी अनुभव का संस्कार नहीं है। काकतालीय न्याय से अकस्मात् प्रकट हुआ है। हे राम! यह जगत् आभासमात्र है। आभास का अभाव कभी नहीं होता, क्योंकि वह उसका चमत्कार है। इतर कुछ बना हो तो उसका नाश भी हो, पर आत्मा से भिन्न तो कुछ हुआ ही नहीं, नाश कैसे और किसका हो? यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। आत्मसत्ता अपने स्वभाव में स्थित है और जगत् उसका आभास है। हे राम! तुम जो स्मृति को कारण कहते हो, सो कारण-कार्यभाव आभास वहाँ भासित होते हैं, जहाँ द्वैत है। स्वरूप में तो कुछ कारण-कार्य भाव नहीं है। जैसे स्वप्न के मरुस्थल में