योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1590, कुल 1734 में से
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जाग्रत् पुरुष जो उसके निकट बैठा है, उसका वह स्वप्न का जगत् नहीं दिखता। वह असत् है, इसलिए उसके निश्चय को स्वप्नवाला नहीं जानता और स्वप्नवाले के निश्चय को वह जाग्रत्वाला नहीं जानता। वैसे ही ज्ञानी के निश्चय को अज्ञानी नहीं जानता। मृत्तिका की सेना को बालक सेना मानता है, पर जो जाननेवाले बड़े पुरुष हैं उनको वह सब सेना मृत्तिकारूप दिखती है। जब वह बालक भी भली प्रकार जानने लगता है, तब उसकी दृष्टि में भी सेना और वेताल का अभाव हो जाता है, मृत्तिका ही भासती है। वैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् ब्रह्मरूप ही जान पड़ता है। हे राम! जब पुरुष को आत्मा का अनुभव होता है, तब जगत् के पदार्थों की इच्छा नहीं रहती। जैसे स्वप्न में किसी को मणि प्राप्त होती है तो वह प्रीति करके उसको रखता है, पर जब जागता है, तब उसे भ्रम जानकर उसकी इच्छा नहीं करता, वैसे ही जब जीव आत्मपद में जागेगा, तब जगत् के पदार्थों की इच्छा न करेगा। जैसे जो कोई मरुस्थल की नदी को असत्य जानता है, वह उसमें जलपान के लिए यत्न नहीं करता, वैसे ही जो जगत् को असत्य जानता है, वह उसके पदार्थों की इच्छा नहीं करता। जिस शरीर के लिए मनुष्य यत्न करता है, वह शरीर भी क्षणभंगुर है। जैसे पत्ते पर जो जल की बूँद स्थित होती है, वह क्षणभंगुर और असार है और पवन लगने से क्षण भर में गिर जाती है, वैसे ही यह शरीर भी नाशवान् है। जैसे धूप से तपा हुआ मृग मरुस्थल की नदी को सत्य जानकर जलपान करने के लिए दौड़ता है और मूर्खता के कारण कष्ट पाता है, परन्तु तृप्त नहीं होता, वैसे ही मूर्ख मनुष्य विषयों और पदार्थों को सत्य जानकर उनके लिए यत्न करता और कष्ट पाता है और कभी तृप्त नहीं होता।
हे राम! पुरुष अपना मित्र आप ही है और अपना शत्रु भी आप ही है। जब सत्यमार्ग में विचरता है और अपना उद्धार करता है, तब पुरुष-प्रयत्न से आप ही अपना मित्र होता है, और जब सत्यमार्ग में नहीं विचरता और पुरुष-प्रयत्न करके अपना उद्धार नहीं करता है, तब