योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1591, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७८७
वह जन्ममरण-संसार में अपने को डालता है। वह अपना आप ही शत्रु है। जो यत्न करके अपना उद्धार करता है, वह अपने ऊपर दया करता है। हे राम ! जो इन्द्रियों के विषयरूपी कीचड़ में गिरा हुआ है और अपने ऊपर दया नहीं करता, वह महा अज्ञान तम को प्राप्त होता है। जो पुरुष इन्द्रियों को जीतकर आत्मपद में स्थित नहीं होता, उसको शान्ति भी नहीं मिलती। जब बाल-अवस्था होती है, तब शून्यबुद्धि होती है; वृद्धावस्था में अङ्ग क्षीण हो जाते हैं और यौवन अवस्था में इन्द्रियों को नहीं जीत सकता, तो फिर कब कुछ करेगा ? जो तिर्यक् आदि योनियाँ हैं, वे मृतकवत हैं। यत्न का समय यौवनअवस्था है, क्योंकि बालअवस्था तो जड़ मूढ़रूप है और वृद्धअवस्था महानिर्बल सी है। उसमें अपने अङ्ग ही उठाने कठिन हो जाते हैं। तो विचार का क्या फल हुआ-वह तो बालकवत है। इससे यौवन अवस्था में ही कुछ यत्न हो सकता है। जो इस अवस्था में लम्पट रहा, वह महाअनिष्ट नरक को प्राप्त होगा। हे राम ! विषयों से प्रसन्न न होना। यह शरीर नाशरूप है तो विषय क्यों भोगे ? वेद-शास्त्र सुनकर भी जानता है और अनुभव करके भी जानता है कि यह शरीर नाशवान् है। पर उसी शरीर में सत्य की भावना करके जो विषयों के सेवन का यत्न करता है उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं। वास्तव में वही सच्चा मूर्ख है। इससे जो इन्द्रियों को जीतेगा, वह फिर जन्म न पावेगा। हे राम ! तुम जागो और अपने को अविनाशी और अच्युत परमानन्दरूप जानो। यह जगत् मिथ्या है-इसको त्याग दो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकषट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४६ ॥
श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! तुम सत्य कहते हो कि इन्द्रियों को जीते बिना शान्ति नहीं होती। इससे इन्द्रियों को जीतने का उपाय कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष को बड़े भोग प्राप्त हुए हैं और उसने इन्द्रियों को जीता नहीं तो वह शोभा नहीं पाता। जो त्रिलोकी का राज्य प्राप्त किया और इन्द्रियाँ न जीतीं तो उसकी कुछ