योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1592, कुल 1734 में से
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प्रशंसा नहीं। जो बड़ा शूरवीर है, पर उसने इन्द्रियों को नहीं जीता, उसकी भी शोभा कुछ नहीं। जिसकी बड़ी आयु है, पर उसने इन्द्रियाँ नहीं जीतीं तो उसका वह जीना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार इन्द्रियाँ जीती जाती हैं और आत्मपद प्राप्त होता है, सो सुनो। हे राम! इस पुरुष का स्वरूप अचिन्त्य चिन्मात्र है। उसमें जो संवित् जगी है, उस ज्ञानसंवित् का अन्तःकरण और दृश्य जगत् से सम्बन्ध हुआ है—उसी का नाम जीव है। जहाँ से चित्त जगता है, वही चित्त को स्थिर करो, तब इन्द्रियों का अभाव हो जावेगा। इन्द्रियों का नायक मन है। जब मनरूपी मतवाले हाथी को वैराग्य और अभ्यासरूपी जंजीर से जकड़ कर वश करो, तब तुम्हारी जय होगी और इन्द्रियाँ रोकी जा सकेंगी। जैसे राजा को वश करने से सब सेना भी वश हो जाती है, वैसे ही मन को स्थिर करने से सब इन्द्रियाँ वश हो जावेंगी। हे राम! जब इन्द्रियों को वश करोगे, तब शुद्ध आत्मसत्ता तुमको भासित होगी। जैसे वर्षाकाल के न रहने पर शरत्काल में शुद्ध निर्मल आकाश दिखता है कुहरे और बादल का अभाव हो जाना है, वैसे ही जब मनरूपी वर्षाकाल और वासनारूपी कुहरे का अभाव हो जायगा, तब पीछे शुद्ध निर्मल आत्मसत्ता ही भासित होगी। हे राम! ये सब पदार्थ जो जगत् में दिखते हैं, वे असत्य हैं—जैसे मरुस्थल की नदी असत्य होती है—इनमें तृष्णा करना अज्ञान है। जो पदार्थ प्रत्यक्ष प्राप्त हों, उनको त्यागकर जब आत्मा की ओर वृत्ति आवे, तब जानिये कि मुझको इन्द्र का पद प्राप्त हुआ है।
विषयों में आसक्त होना ही बड़ी कृपणता है। इनसे उपराम होना ही बड़ी उदारता है। इससे मन को वश करो, जिसमें तुम्हारी जय हो। जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ में पृथ्वी जब तपती है, तब जो पैर में जूता होता है, तो तपन नहीं लगती, वैसे ही अपना मन वश करने से जगत् आत्मरूप हो जाता है। हे राम! जिस प्रकार जनेन्द्र ने मन को वश किया था, वैसे ही तुम भी मन को वश करो। जिस-जिस ओर मन जावे, उस-उस ओर से उसे रोको। जब दृश्य जगत् की ओर से मन को