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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1593, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1593

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

७८६

रोकोगे, तब वृत्ति संवित् ज्ञान की ओर आवेगी। जब संवित् ज्ञान की ओर आई तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का अनुभव होगा। तीर्थ, दान और तप करके संवित् का अनुभव होना कठिन है, परन्तु मन को स्थिर करने से सुगम ही अनुभव की प्राप्ति होती है। मन स्थिर करने का उपाय यही है कि सन्तों की संगति करे और रात-दिन सत्शास्त्रों को विचारे। सर्वदा यही उपाय करने से शीघ्र ही मन स्थिर होता है, और जब मन स्थिर होता है, तब आत्म-पद का अनुभव होता है। जिसको आत्मपद प्राप्त हुआ है, वह संसार-समुद्र में नहीं डूबता। चित्तरूपी समुद्र में तृष्णारूपी जल और कामना-रूपी लहरें हैं। जिस पुरुष ने शम और सन्तोष से इन्द्रियाँ जीती हैं, वह चित्तरूप समुद्र में गोते न खायगा। जिसने इन्द्रियों को जीतकर आत्म-पद पाया है, उसको नानात्व जगत् फिर नहीं भासित होता। जैसे मरुस्थल की निराकार नदी में लहरें उठती हैं, पर जब निकट जाकर भली प्रकार देखिये तो वह लहरों के साथ बहती नहीं दिखती, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है। जब भली प्रकार विचार करके देखिये, तब नानात्व नहीं दिखता, आत्मसत्ता ही किञ्चन करके जगत्रूप होकर भासती है। जैसे जल अपने द्रव स्वभाव से तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मसत्ता चेतनता से जगत्रूप होकर भासती है।

हे राम ! जब आत्मबोध होता है, तब फिर दृश्यभ्रम नहीं भासता। जैसे साकाररूप नदी का भाव निवृत्त होता है तो फिर बहती है और जो निराकार नदी का सद्भाव निवृत्त होता है तब फिर नदी का सद्भाव होता है। निराकार मृगतृष्णा की नदी जब ज्यों की त्यों जानो तब फिर सत् नहीं होती। हे राम ! वास्तव में न कर्म हैं; न इन्द्रियाँ हैं, न कर्त्ता है अर्थात् कुछ उपजा नहीं। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की क्रिया और कर्म दिखते हैं, परन्तु सब आकाशरूप हैं, कुछ बनी नहीं, वैसे ही यह भी जानो। आकाशरूप आत्मा में आकाशरूप जगत् स्थित है। जैसे अवयवी और अवयव में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। और जैसे अवयव अवयवी का रूप है, वैसे ही जगत्