योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1594, कुल 1734 में से
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आत्मा का रूप है। जब आत्मा में स्थित होगी, तब अहं-त्वं आदि शब्दों का अभाव हो जायगा और 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी न रहेंगे। 'द्वैत' 'अद्वैत' शब्द भी अज्ञानी को समझाने के लिए कहे हैं। जो वृद्ध, ज्ञानवान् हैं, वे इन शब्दों पर हँसते और कहते हैं कि अद्वैतपात्र में इन शब्दों का प्रवेश कहाँ है? जिनको यह अवस्था प्राप्त हुई है, उनको न बन्धन है और न मोक्ष है। हे राम! सुषुप्ति और तुरीयावस्था में कुछ थोड़ा ही भेद है। सुषुप्ति में अज्ञान और जड़ता रहती है और तुरीया-वस्था में अज्ञान और जड़ता नहीं रहना है। वह चैतन्य अनुभव सत्ता-रूप है। स्वप्न में जाग्रत् में भी भेद नहीं है। परन्तु इतना भेद है कि अल्पकाल की अवस्था को स्वप्न और चिरकाल की अवस्था को जाग्रत् कहते हैं।
हे राम! जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति, ये तीनों स्वप्न और सुषुप्ति-रूप हैं। जाग्रत् और स्वप्न ये उभय स्वप्नरूप हैं; सुषुप्ति अज्ञानरूप है; जाग्रत् तुरीयरूप है, और जाग्रत् कोई नहीं। जिसके जागने से फिर भ्रम प्राप्त हो, उसको जाग्रत् कैसे कहिये? उसको तो भ्रममात्र जानिये। जिस जागने से फिर भ्रम को प्राप्त हो, उसका नाम जाग्रत् है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, इन चारों अवस्थाओं में चिन्मात्र घनीभूत हो रहा है। वह चारों को नहीं देखता। ज्ञानवान् प्राण का स्पन्दन रोककर आत्मा की ओर चित्त को लगाते हैं, परस्पर ज्ञानमात्र का निर्णय और चर्चा करते हैं और ज्ञान की ही कथा-कीर्तन करते और उससे प्रसन्न होते हैं। ऐसे नित्य जाग्रत् पुरुष जो निरन्तर प्रीति-पूर्वक आत्मा को भजते हैं, उनमें आत्मविषयिणी बुद्धि उदय होती है और उससे वे शान्ति को प्राप्त होते हैं। जिनको सदा अध्यात्म का अभ्यास है और उस अभ्यास में जो तत्पर हुए हैं, उनको आत्मपद प्राप्त होता है। जो अज्ञानी हैं, वे रागद्वेष से जलते हैं। जिनको आत्मा का दृढ़ अभ्यास हुआ है, उनको शान्ति और आत्मस्थिति प्राप्त होती है। उन्हें उस स्थित के आगे इन्द्र का राज्य भी सूखे तृण सा-तुच्छ लगता है। सब जगत् उनको आत्मरूप दिखता है। जो अज्ञानी