योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1595, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ७६१
है, उनको नाना प्रकार के जगत् दिखते हैं। जैसे सोये हुए पुरुष को स्वप्न की सृष्टि सत्य भासती है, वैसे ही जाग्रत् को स्वप्न की सृष्टि भी अपना रूप जान पड़ती है। ज्ञानवान् को सब आत्मरूप दिखता है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता। जब आत्म-अभ्यास का बल हो और अनात्मा के अभाव का अभ्यास दृढ़ हो, तब जगत् का अभाव हो जाता है और अद्वैतसत्ता का भान होता है।
हे राम ! मैंने तुमको बहुत उपदेश किया है। जब इसका अभ्यास होगा, तब इसका फल ब्रह्मबोध हो प्राप्त होगा। वह बोध अभ्यास के बिना नहीं प्राप्त होता। जो एक तृण लुप्त करना होता है तो भी कुछ यत्न करना होता है। यह तो त्रिलोकी लुप्त करनी है। हे राम ! जैसे बड़ा भार जिस पर पड़ता है, उससे वह बड़े ही बल से उठता है, बिना बड़े बल नहीं उठता, वैसे ही जीव पर दृश्यरूपी बड़ा भार पड़ा है, जब आत्मरूपी अभ्यास का बड़ा बल हो, तब वह इसको निवृत्त करे, नहीं तो निवृत्त नहीं होता। यह जो मैंने तुमको उपदेश किया है, इसको बारम्बार विचारो। मैंने तो तुमको बहुत प्रकार से और बहुत बार समझाया है। हे राम ! अज्ञानी को ऐसे बहुत कहने से भी कुछ फल नहीं होता। तुमको जो मैंने उपदेश किया है, वह सब शास्त्रों और वेदों का सिद्धान्त है। जिस प्रकार वेद का पाठ करते हैं, उसी प्रकार इसका पाठ कीजिये और विचारिये, इसके रहस्य को हृदय में धारण करिए। तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और अन्य शास्त्र भी इसके अवलोकन से सुगम हो जावेंगे। यदि नित्य इस शास्त्र को श्रद्धासहित सुने और कहे तो अज्ञानी जीव को भी अवश्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। जो एक बार सुनकर कहने लगा है कि एक बार तो सुना है कि फिर क्या सुनना है, उसकी भ्रान्ति निवृत्त न होगी। जो बारम्बार सुने-विचारे और कहे तो उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। सब शास्त्रों से उत्तम युक्ति की संहिता मैंने कही है जो शीघ्र ही मन में बैठ जाती है। जो पुरुष मेरे शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, उनको बोध होता है और दूसरे शास्त्रों का अर्थ भी भली भाँति खुल जाता है। जैसे