योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६२ ⁂ योगवाशिष्ठ ⁂
नमक का अधिकारी व्यञ्जन है। उसमें डाला गया नमक स्वादिष्ट होता है और प्रीति सहित ग्रहण किया जाता है, वैसे ही जो इस शास्त्र के सुनने और कहनेवाले हैं, वे और शास्त्रों का भी सुन्दर अर्थ करेंगे।
हे राम ! किसी और पक्ष को मानकर इसे सुनना त्यागा न चाहिए। जैसे किसी के पिता का खारी कुआँ था और उसके निकट एक मीठे जल का भी कुआँ था, पर वह अपने पिता का कूप मानकर खारी ही जल पीता था और निकट के मीठे जल के कुएँ का त्याग करता था, वैसे ही अपने पक्ष को मानकर मेरे शास्त्र का त्याग न करना। जो ऐसे जानकर मेरे शास्त्र को न सुनेगा, उसको ज्ञान न प्राप्त होगा। जो पुरुष इस शास्त्र में दोष का आरोपण करेगा कि यह सिद्धान्त यथार्थ नहीं कहा, उसको कभी ज्ञान न प्राप्त होगा—वह आत्महन्ता है, उसके वाक्य न सुनना। जो प्रीतिपूर्वक पूज्य भाव करके श्रद्धा से सुनेगा और विचार कर पाठ करेगा, उसको निर्मल ज्ञान प्राप्त होगा और उसके कर्म भी निर्मल होंगे। इससे यह नित्यप्रति विचारने योग्य है। हे राम ! तुमको मैंने अपने किसी स्वार्थ के लिए उपदेश नहीं किया, केवल दया करके किया है। तुम जो किसी से कहना तो स्वार्थ के बिना दया करके कहना।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रिययज्ञवर्णनं नाम द्विशताधिकसप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा में जगत् कुछ हुआ नहीं। जब शुद्ध चिन्मात्र में अहँ जगता है, तब वही संवेदन जगना जगद्रूप भासित होता है। और जब वह अधिष्ठान की ओर देखता है, तब वही संवेदन अधिष्ठानरूप हो जाता है, अपने रूप को त्यागकर अचेत चिन्मात्र होता है। हे राम ! स्फुरण और अस्फुरण, दोनों में वही है। परन्तु फुरने से जगत् भासता है। वह जगत् भी कुछ और वस्तु नहीं वही रूप है। जब संवित् संवेदन फुरने से रहित होती है, तब चिन्मात्र-रूप हो जाती है। इस कारण ज्ञानवान् को जगत् आत्मरूप भासता है, ब्रह्म से भिन्न नहीं दिखता। जैसे किसी पुरुष का मन और जगह गया