योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1597, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७६३
होता है तो उसके आगे शब्द होने पर भी वह उसे नहीं सुनाई देता, वह कहता है कि मैंने देखा या सुना कुछ नहीं, क्योंकि जिस ओर चित्त होता है, उसी का अनुभव होता है वैसे ही जिनका मन आत्मा की ओर लगता है, उनको सब आत्मा ही दिखता है—आत्मा से भिन्न जगत् नहीं प्रतीत होता। पर जिसको आत्मसत्ता का प्रमाद है और जगत् की ओर चित्त है, उसको जगत् ही दिखता है। हे राम! ज्ञानवान् के निश्चय में ब्रह्म ही है और अज्ञानी के निश्चय में जगत्। तब ज्ञानी और अज्ञानी का निश्चय एक कैसे हो? जो मनुष्य स्वप्न देख रहा है, उसे स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत् को वह जगत् नहीं दिखता। तब उनका एक ही निश्चय कैसे हो? जगत् के आदि और अन्त दोनों में ब्रह्मसत्ता है और मध्य में भी उसे ही जानो—आत्मसत्ता ही चेतनता से जगतरूप होकर दिखती है। जैसे स्वप्न की सृष्टि के आदि में भी ब्रह्मसत्ता होती है; अन्त में भी ब्रह्मसत्ता होती है और मध्य में जो भासित होता है, वह भी वही है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही यह जगत् आदि, अन्त और मध्य में भी आत्मा से भिन्न नहीं।
ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय है कि जगत् कुछ उपजा नहीं और न उपजेगा, केवल आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और सब ब्रह्म ही है। अहं-त्वं आदि अज्ञान से भासित होता है। जैसे स्वप्न में अहं-त्वं आदि का अनुभव होता है तो अहं-त्वं आदि भी कुछ नहीं, सब अनुभव-रूप है, वैसे ही यह सब जगत् अनुभवरूप है। हे राम! जैसे एक ही रस फूल, फल, टहनी और वृक्ष होकर दिखता है, रस से भिन्न कुछ नहीं होता, वैसे ही नानात्वरूप जगत् दिखता है परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं है, जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर अपने-अपने अनुभव से भिन्न नहीं परन्तु स्वरूप के विस्मरण से आकाररूप दिखते हैं, वैसे ही यह जगत् का आकार जो दिखता है, वह ज्ञानरूप से भिन्न नहीं है। सब जगत् आत्मरूप है, परन्तु अज्ञान से भिन्न-भिन्न लगता है। यह सब जगत् अपना आप रूप है। जब आत्मरूप है तब ग्राह्य-ग्राहकभाव कैसे हो? यह मिथ्या भ्रम है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, घट, पट आदिक