योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1598, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
सब जगत् ब्रह्मरूप है। ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय रहता है कि अचेत चिन्मात्र अपने रूप में स्थित है। ब्रह्मादिक भी कुछ स्फुरित होकर उदय नहीं हुए, ज्यों के त्यों हैं। उत्थान कुछ नहीं हुआ। परन्तु अज्ञानी के निश्चय में नाना प्रकार का जगत् और उत्पत्ति, स्थित, प्रलय, ब्रह्मादिक सब हैं। हे राम! यह कुछ उपजा नहीं, कारणत्व के अभाव से सदा एकरस आत्मसत्ता ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकाष्टचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब जाग्रत् और स्वप्न का निर्णय सुनो। जब मनुष्य सो जाता है, तब स्वप्न की सृष्टि देखता है। वह जाग्रतरूप भासित होती है। और जब स्वप्न निवृत्त होता है, तब फिर यह सृष्टि देखता है तो यही जाग्रत् होकर भासित होती है। यहाँ सोकर स्वप्न में जाग्रत् होती है और वहाँ सोकर यहाँ जाग्रत् होती है। तो स्वप्न जाग्रत् हुआ। जाग्रत् जो वस्तु है वह आत्मसत्ता है। उसमें जागना वही जाग्रत् में जाग्रत् है, और सब स्वप्न-जाग्रत् है। जब मनुष्य यहाँ शयन करता है, तब स्वप्न का जगत् सत्य होकर दिखता है और यह असत्य हो जाता है, और स्वप्न में वहाँ शयन करता है, अर्थात् जब स्वप्न से निवृत्त होता है और जाग्रत् में जागता है, तब वह असत्य हो जाता है, और वह स्वप्न जाग्रत् में स्मरण हो आता है। जब जाग्रत् में सोया और स्वप्न में जागा, तब जाग्रत् स्वप्नभाव को प्राप्त हुई, और जब स्वप्न से उठकर जाग्रत् में आया तब स्वप्नरूप जाग्रत् स्मृति भाव को प्राप्त हुई। जब सब जाग्रत् हुई तो हे राम! स्वप्न तो कोई न हुआ। इसको सब जगह जाग्रत् हुई। और जाग्रत् तो कोई न हुई, क्योंकि जब जाग्रत् से स्वप्न में गया, तब स्वप्न जाग्रतरूप हो गया और जाग्रत् स्वप्न हो गई, और जब स्वप्न से जाग्रत् में आया, तब जाग्रत् जाग्रतरूप हो गई और स्वप्न जाग्रत्-स्वरूप हो गई। तो हुआ यह कि जाग्रत् कोई नहीं, सब स्वप्न और असत्यरूप है।
अपने काल में यह जाग्रत् है और स्वप्नरूप है। जब प्राणी यहाँ से