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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

७६४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

सब जगत् ब्रह्मरूप है। ज्ञानवान् को सदा यही निश्चय रहता है कि अचेत चिन्मात्र अपने रूप में स्थित है। ब्रह्मादिक भी कुछ स्फुरित होकर उदय नहीं हुए, ज्यों के त्यों हैं। उत्थान कुछ नहीं हुआ। परन्तु अज्ञानी के निश्चय में नाना प्रकार का जगत् और उत्पत्ति, स्थित, प्रलय, ब्रह्मादिक सब हैं। हे राम! यह कुछ उपजा नहीं, कारणत्व के अभाव से सदा एकरस आत्मसत्ता ही है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकाष्टचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब जाग्रत् और स्वप्न का निर्णय सुनो। जब मनुष्य सो जाता है, तब स्वप्न की सृष्टि देखता है। वह जाग्रतरूप भासित होती है। और जब स्वप्न निवृत्त होता है, तब फिर यह सृष्टि देखता है तो यही जाग्रत् होकर भासित होती है। यहाँ सोकर स्वप्न में जाग्रत् होती है और वहाँ सोकर यहाँ जाग्रत् होती है। तो स्वप्न जाग्रत् हुआ। जाग्रत् जो वस्तु है वह आत्मसत्ता है। उसमें जागना वही जाग्रत् में जाग्रत् है, और सब स्वप्न-जाग्रत् है। जब मनुष्य यहाँ शयन करता है, तब स्वप्न का जगत् सत्य होकर दिखता है और यह असत्य हो जाता है, और स्वप्न में वहाँ शयन करता है, अर्थात् जब स्वप्न से निवृत्त होता है और जाग्रत् में जागता है, तब वह असत्य हो जाता है, और वह स्वप्न जाग्रत् में स्मरण हो आता है। जब जाग्रत् में सोया और स्वप्न में जागा, तब जाग्रत् स्वप्नभाव को प्राप्त हुई, और जब स्वप्न से उठकर जाग्रत् में आया तब स्वप्नरूप जाग्रत् स्मृति भाव को प्राप्त हुई। जब सब जाग्रत् हुई तो हे राम! स्वप्न तो कोई न हुआ। इसको सब जगह जाग्रत् हुई। और जाग्रत् तो कोई न हुई, क्योंकि जब जाग्रत् से स्वप्न में गया, तब स्वप्न जाग्रतरूप हो गया और जाग्रत् स्वप्न हो गई, और जब स्वप्न से जाग्रत् में आया, तब जाग्रत् जाग्रतरूप हो गई और स्वप्न जाग्रत्-स्वरूप हो गई। तो हुआ यह कि जाग्रत् कोई नहीं, सब स्वप्न और असत्यरूप है।

अपने काल में यह जाग्रत् है और स्वप्नरूप है। जब प्राणी यहाँ से

❀ निर्वाण प्रकरण ❀ ७४५

मृतक होता है, तब यह जगत् स्वप्नरूप होता है, स्वप्नरूप परलोक जाग्रत् हो जाता है और जाग्रत् स्मृति प्रत्यक्ष हो जाती है तो उसमें वह नहीं रहता और उसमें वह नहीं रहता। और जाग्रत्, स्वप्न, दोनों में परलोक नहीं रहता। इस जाग्रत् में देखिये तो स्वप्न और परलोक दोनों नहीं दिखते और स्वप्न में इस जाग्रत् और परलोक दोनों का अभाव हो जाता है। तो यह सिद्ध हुआ कि सब स्वप्नमात्र है। हे राम! चिरकाल की प्रतीति को जाग्रत् और अल्पकाल की प्रतीति को स्वप्न कहते हैं। जो आदि स्वप्न हुआ और उसमें दृढ़ अभ्यास हो गया, इससे जाग्रत् होकर भासित होती है; इसलिए जो आकार तुमको सत्य लगते हैं, वे सब निराकार आकाशरूप हैं, कुछ बने नहीं। जैसे स्वप्न में त्रिलोकी-जगत्भ्रम उदय होता है, परन्तु सब आकाशरूप होता है, वैसे ही ये जगत् के पदार्थ अविद्या से साकार दिखते हैं। ये सब निराकार और आकाशरूप हैं। जब आत्मतत्त्व अधिष्ठान में जागोगे, तब सभी आकाशरूप दिखेंगे। अद्वैत आत्मतत्त्व में जो ग्राह्य-ग्राहकभाव दिखता है, सो मिथ्या कल्पना है, वास्तव में कुछ नहीं। सब जगत् मृगतृष्णा के जलसरीखा मिथ्या है। उसमें ग्रहण और त्याग क्या कीजिये? इन दोनों की कल्पना को दूर करो। यह हो और यह न हो, इस कल्पना को त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो रहो, तब सम्पूर्ण शान्ति प्राप्त होगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्नप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकोनपञ्चाशत्तमसर्गः ॥ २४९ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! इन अर्थों का जो आश्रयभूत है, वह मैं तुमसे कहता हूँ। इस जगत् के आदि में अद्वैत चिन्मात्र था, उसमें किसी शब्द की प्रवृत्ति न थी—अशब्द पद था। फिर उसमें जागना जगा और उसका आभास जगत् हुआ। उस आभास में जिनका अधिष्ठान की अहंप्रतीति है, उनको जगत् आकाशरूप दिखता है, और वह संसार में नहीं डूबता, क्योंकि उसके अज्ञान का अभाव है। जो डूबता नहीं, वह निकलता भी नहीं; उसके लिए अज्ञान की निवृत्ति

७६६ योगवाशिष्ठ

और ज्ञान का भी अभाव है, क्योंकि वह स्वतः ज्ञानस्वरूप है। जिनको अधिष्ठान का प्रमाद हुआ है, उनको दोनों अवस्थाएँ होती हैं। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् आत्मरूप दिखता है और जो ज्ञान से रहित है, उसको भिन्न भिन्न नामरूपवाला जगत् भासित होता है। हे राम! आत्मा निराख्यात है। वह चारों आख्यातों से रहित निराभाससत्ता है। चारों आख्यात उसमें आभास हैं। एक आख्यात, दूसरा विपर्य-याख्यात, तीसरा असत्याख्यात और चौथा आत्माख्यात, ये चार आख्यात हैं। आख्यात ज्ञान को कहते हैं। यह ज्ञान 'कि मैं अपने को नहीं जानता,' आख्यात है। अपने को देह-इन्द्रियरूप जानने का नाम विपर्ययाख्यात है। जगत् असत्य जानने का नाम असत्याख्यात है और आत्मा को आत्मा जानने का नाम आत्माख्यात है। ये चारों आख्यात चिन्मात्र आत्मतत्त्व के आभास हैं। आत्मसत्ता निर्विकल्प अचेत चिन्मात्र है। उसमें वाणी की गति ही नहीं है। हे राम! जगत् भी वही स्वरूप है, और कुछ बना नहीं। वह तत्त्व घनशिला की नाईं अविन्त्य स्वरूप है।

इस पर एक आख्यान है, जो श्रवणों का भूषण है, इसलिए तुमसे कहता हूँ। वह द्वैतदृष्टि का नाशकर, ज्ञानरूपी कमल का विकास करनेवाला सूर्य और परमपावन है। उसे सुनो। हे राम! एक बड़ी शिला है, जिसका कोटि योजन तक विस्तार है। वह अनन्त है, किसी ओर उसका अन्त नहीं आता, वह शुद्ध, निर्मल और निरासाध है, अर्थात् अणु-अणु से पुष्ट नहीं हुई, अपनी सत्ता से पूर्ण और परम सुन्दर है। जैसे शालग्राम की प्रतिमा सुन्दर होती है, वैसे ही वह सुन्दर है। जैसे शालग्राम पर शंख, चक्र, गदा और पद्म की रेखा होती हैं, वैसे ही उस पर रेखा है, और वही रूप है। वह वज्र से भी कठिन, शिला की नाईं निर्विकार और निराकार अचेतन परमार्थ है। यह जो कुछ चेतनता भासित होती है, वही उस पर रेखा है। अनन्त कल्प बीत गये हैं, परन्तु उसका नाश नहीं होता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये सब भी उस पर रेखा हैं। वह आप पृथ्वी आदि भूतों से

७६८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह शिला परमात्मा है। मैंने उसे शिलारूप इसलिए कहा कि यह घन चैतन्यरूप है, उससे इतर कुछ नहीं। वह अचिन्त्यरूप है। उस पर पञ्चतत्त्व रेखा है। वे रेखा भी वही रूप हैं। एक रेखा बड़ी है, जिसमें और रेखा रहती हैं। वह बड़ी रेखा आकाश है, जिसमें और तत्त्व रहते हैं। सब पदार्थ आकाश में हैं, सो सब वही रूप है। तुम भी वही रूप हो और मैं भी वही रूप हूँ। और कुछ हुआ नहीं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सब पदार्थ और कर्म जो भासित होते हैं, वे सब ब्रह्मरूपी शिला की रेखा है और कुछ हुआ नहीं। सब काल में ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। नाना प्रकार के व्यवहार भी देखे जाते हैं, परन्तु वही रूप हैं, और कुछ है ही नहीं। वैसे ही वह जानो। घट, पट, पहाड़ कन्दरा, स्थावर, जङ्गम, जगत् सब आत्मरूप है। आत्मा ही फुरने से ऐसे दिखता है। जैसे जल की लहरें होकर दिखता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है। और सब पदार्थ पवित्र, अपवित्र, सत्य, असत्य, विद्या, अविद्या, सब आत्मसत्ता ही के नाम हैं, इतर वस्तु कुछ नहीं है। ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम ! सभी वज्र ब्रह्मरूप है और चिन्मात्र घन ही सबमें व्याप रही है। पर परमार्थसत्ता घन शान्तरूप है और ये सब परमार्थ भी घनरूप हैं, इसलिए संकल्प-रूपी कल्पना को त्यागकर उसमें स्थित हो रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५०॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो पुरुष स्वभावसत्ता में स्थित हुए हैं, उनको ये चारों आख्यात कहे हैं। जितने और शब्दार्थ हैं, वे शशा के सींग की तरह असत्य हैं। जगत् का निश्चय उनमें नहीं रहता और सब ब्रह्माण्ड उनको आकाश सा दिखता है। आख्यात की कल्पना भी उन्हें कुछ नहीं फुरती। और सब जगत् जो दीखता है, वह निराकार परम चिदाकाशरूप है, परम निर्वाणसत्ता से युक्त दिखता है और उसी से निर्वाण हो जाता है, इसलिए वही स्वरूप है। हे राम ! जब इस प्रकार जानकर तुम उस पद में स्थित होगे, तब बड़ा शब्द करते हुए

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६६

भी तुम निश्चय से पाषाण-शिलासदृश मौन रहोगे और देखोगे, खाओगे, पियोगे, सूँघोगे, परन्तु तुम्हारे अपने निश्चय में कुछ न फुरेगा। जैसे पाषाण की शिला फुरना नहीं फुरता, वैसे ही तुम रहोगे-जो पैरों से दौड़ते जाओगे तो भी निश्चय ही चलायमान न होगे। जैसे आकाश और सुमेरु पर्वत अचल है, वैसे ही तुम भी स्थित रहोगे। क्रिया तो सब करोगे, परन्तु हृदय में क्रिया का अभिमान तुमको कुछ न होगा, केवल स्वभावसत्ता में स्थित होंगे। जैसे मूढ़ बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, सो वह अविचारसिद्धि है और विचार किये से कुछ नहीं रहता, वैसे ही मूर्ख अज्ञानी आत्मा में मिथ्या आकार की कल्पना करते हैं। विचार करने से सब आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। जैसे मरुस्थल में नदी तब तक दिखती है, जबतक विचार करके नहीं देखता और विचार करने से नदी नहीं रहती वैसे ही यह जगत् विचार करने से नहीं रहता। जगत् चैतन्यरूपी रत्न की चमक है। चैतन्य आत्मा का किञ्चन फुरने से ही जगतरूप भासित होता है।

रामजी बोले, हे भगवन्! इस जगत् का कारण मैं स्मृति को मानता हूँ। वह स्मृति अनुभव से होती है और स्मृति से अनुभव होता है। स्मृति और अनुभव परस्पर कारण हैं। जब अनुभव होता है, तब उसको स्मृति भी होती है। तो वह स्मृतिसंस्कार फिर स्वप्न में जगतरूप हो क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् किसी संस्कार से नहीं उपजा और किसी अनुभव का संस्कार नहीं है। काकतालीय न्याय से अकस्मात् प्रकट हुआ है। हे राम! यह जगत् आभासमात्र है। आभास का अभाव कभी नहीं होता, क्योंकि वह उसका चमत्कार है। इतर कुछ बना हो तो उसका नाश भी हो, पर आत्मा से भिन्न तो कुछ हुआ ही नहीं, नाश कैसे और किसका हो? यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। आत्मसत्ता अपने स्वभाव में स्थित है और जगत् उसका आभास है। हे राम! तुम जो स्मृति को कारण कहते हो, सो कारण-कार्यभाव आभास वहाँ भासित होते हैं, जहाँ द्वैत है। स्वरूप में तो कुछ कारण-कार्य भाव नहीं है। जैसे स्वप्न के मरुस्थल में

८०० ✽ योगवाशिष्ठ ✽

जल भासित हुआ तो उसमें जल माना गया। इसलिए जागकर जब देखा तो उस जल की स्मृति हुई अथवा स्वप्न के व्यवहारकर्ता को स्वप्नान्तर हुआ और उसे स्वप्नान्तर में फिर व्यवहार किया।

हे राम ! तुम देखो कि उसकी स्मृति भी असत्य हुई और जो उसने अनुभव किया वह भी असत्य है। वैसे ही यह संसार भी है, कुछ भिन्न नहीं। हे राम ! इसलिए न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न कोई सुषुप्ति है और न तुरीयावस्था है। केवल अद्वैतसत्ता सब उत्थान से रहित चिन्मात्र स्थित है। इसलिए जगत् भी वही रूप है। और यद्यपि क्रिया भी दिखती है तो भी कुछ हुआ नहीं। जैसे स्वप्न में कोई नारी आकर गले से लगती है तो उसकी क्रिया कुछ सच नहीं होती, वैसे ही यह क्रिया भी सच नहीं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय शब्दों का अर्थ निश्चय ज्ञानवान् पुरुष को है और ये उसको खरगोश के सींग और आकाश के फल सो असत्य प्रतीति होती हैं। जैसे बन्ध्या का पुत्र और श्याम चन्द्रमा शब्द कहने भर को हैं, इनका अर्थ असत्य है, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में पाँचों अवस्थाओं का होना असंभव है। वह सर्वदा जाग्रत है। जाग्रत् उसका नाम है, जहाँ अनुभव हो। वह अनुभवसत्ता सदा जाग्रत् रूप है। जैसा पदार्थ आगे आता है, उसी का जीव अनुभव करता है इससे सर्वदा सब कालों में, जाग्रत् है। अथवा सर्वदा स्वप्न है। स्वप्न उसका नाम है, जहाँ पदार्थ विपर्यय (उलटे) दिखते हैं। सो सब पदार्थ विपर्यय ही दिखते हैं। विपर्यय से रहित एक आत्मा है। उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, सो विपर्यय है, इसलिए सब काल में स्वप्न ही है। अथवा सर्वदा सुषुप्ति ही है। सुषुप्ति उसका नाम है, जहाँ अज्ञानवृत्ति हो। मैं अपने वास्तव रूप को भी नहीं जानता इसलिए न जानने सर्वदा सुषुप्ति। अथवा सर्वदा तुरीयावस्था है। तुरीयावस्था उसका नाम है जो साक्षीभूत सत्ता हो, जिसमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था का अनुभव होता है। जो सर्वदा सबको अनुभव करता है, वह प्रत्येक चैतन्य है। इससे सर्वदा तुरीयपद है। अथवा सर्वदा तुरीयातीतपद है। तुरीयातीत उसको कहते हैं, जो

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ८०१

अद्वैत सत्ता है, जिसके पास द्वैत कुछ नहीं। सो सर्वदा अद्वैतसत्ता है। उसमें जगत् का अत्यन्त अभाव है, जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है—इसलिए सर्वदा तुरीयातीतपद है। जो मुझसे पूछो तो मुझको तरङ्ग, बुलबुले झाग और भँवर कुछ नहीं भासित होते—सर्वदा चित्-समुद्र ही दिखता है। उदय-अस्त से रहित आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और पृथ्वी आदि तत्त्व जो दिखते हैं, वे भी कुछ उपजे नहीं, आत्मसत्ता का किञ्चन ही इस प्रकार भासित होता है।

जैसे नख और केश उपजते भी हैं और नाश भी हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् उपजता भी है और लीन भी हो जाता है। जैसे नख और केश के उपजने और काटने से शरीर ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् के उपजने और लीन होने में आत्मा ज्यों का त्यों रहता है। हे राम ! यह जगत् उपजा नहीं तो उसमें सत्य और असत्य कल्पना और स्मृति क्या कहिये और भीतर और बाहर क्या कहिये ? अद्वैतसत्ता में कुछ कल्पना नहीं बनती। जो तुम कहो कि स्मृति भीतर होती है, परन्तु भीतर से बाहर दिखती है, तो भीतर अनुभव की अपेक्षा से हुई है, वह भी उत्पन्न नहीं हुई। तब मैं भीतर और बाहर क्या कहूँ ? जैसे स्वप्न-सृष्टि भासित होती है सो वह अपना ही अनुभव होता है, और वही सृष्टिरूप दिखता है। वहाँ तो भीतर-बाहर कुछ नहीं है। वैसे ही यह जगत् भीतर-बाहर कुछ नहीं है, सब भ्रमरूप है। जिसको इच्छा कहते हैं, उसे ही स्मृति कहते हैं। विद्या-अविद्या, इष्ट-अनिष्ट आदि सब शब्द सब आत्मा के ही नाम हैं—आत्मा से भिन्न और पदार्थ कुछ नहीं है। हे राम ! जागकर देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। मिथ्या भ्रम को अंगीकार करके भिन्न क्यों देखते हो ? सब शब्द बिना अर्थ के कहीं नहीं हैं और शब्द-अर्थ का विचार संकल्प से होता है। संकल्प तब उठता है जब चित्त में अहंअभिमान होता है। उस चित्त को आत्मासार में लीन करो। जब चित्त का निर्वाण करोगे तब सब जगत् शान्त हो जायगा। अहं के दर्पण में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं। जब चित्त निर्वाण हो जायगा, तब सब

८०२ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

द्वैतकल्पना मिट जायगी । यह जो मोक्षशास्त्र मैंने तुमसे कहा है, इसके अर्थ कर विचारकर संकल्प को त्यागकर, अपने परमानन्दस्वरूप में स्थित हो रहो।

इतिश्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५१॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत् किसी कारण से नहीं उत्पन्न हुआ। जैसे समुद्र में तरंग स्वाभाविक उठते हैं, वैसे ही संवित्सत्ता से आदि-सृष्टि जगी है। और जैसे जल स्वाभाविक द्रवता से तरङ्गरूप अपनी सत्ता से बढ़ता जाता है, वैसे ही आत्मसत्ता से जगत् का विस्तार होता है । यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जब चिन्मात्र आत्मसत्ता का आभास बहिर्मुख जगता है, तब अन्तःकरण चतुष्टय होते हैं। उनमें जो निश्चय होता है, उसका नाम नीति है। वह प्रथम अकस्मात् कारण के बिना स्वाभाविक ही जग आया है और आभासमात्र है। जब वह दृढ हो गया, तब नीति स्थित हुई । वास्तव में द्वैत कुछ बना नहीं। जो सम्यक्दर्शी पुरुष हैं, उनको सब आत्मा ही दिखता है—जैसे पत्ते, फूल, फल टहनी सब वृक्ष हैं, उससे भिन्न नहीं हैं। हे राम ! वृक्ष में जो फूल, फल, और टहनी होती हैं, सो किसी कारण से बुद्धिपूर्वक बनी नहीं होतीं ? वैसे ही इस जगत् को भी जानो। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न रूप भी पत्ते, टास आदि के विस्तार में एक वृक्ष ही दिखता है। वैसे ही यथार्थ ज्ञानी को सब आत्मा ही दिखता है, और मिथ्यादृष्टिवाले को भिन्न-भिन्न पदार्थ दिखते हैं। हे राम ! वृक्ष को देखनेवाला भी और होता है, और दृष्टान्त में दूसरा कोई नहीं। चैतन्य आत्मा का आभास ही चेत्य है, वही चैतन्यरूप होकर भासित होता है । उस चैतन्य आभास को असम्यक् दृष्टि से भिन्न-भिन्न पदार्थ दीखते हैं। जैसे पत्ते, फूल, फल और वृक्ष अपने को भिन्न जानें। और सम्यक्दर्शी सबको आत्मरूप देखता है। ज्ञानी और अज्ञानी सब आत्मरूप हैं—जैसे दीवार पर लिखी पुतलियाँ दीवार से भिन्न नहीं होतीं, वैसे ही सर्वगत आत्म-रूपी दीवार के सब दृश्य चित्र हैं। वे आत्मा से भिन्न नहीं हैं। जैसे

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८०३

आकाश में शून्यता, फूलों में सुगन्ध, जल में द्रवता, वायु में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । हे राम ! जगत् आत्मा का आभास है, इसलिए वही रूप है । यह जगत् भी अचेत्य चिन्मात्र है ।

जो तुम कहो कि अचेत्य चिन्मात्र है तो पृथ्वी, पहाड़ आदि आकर क्यों दिखते हैं ? तो हे राम ! जैसे नित्यप्रति जो तुमको स्वप्न आता है और उस अनुभव आकाश में पृथ्वी आदिक तत्त्व दिखते हैं तो वही चिन्मात्र ही आकार होकर दिखता है, और कुछ नहीं । वैसे ही इसे भी जानो । यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह अनुभवरूप है । जैसे चिन्मात्र आत्मा में सृष्टि आभासमात्र है, वैसे ही कारण-कार्य-भाव भी आभास-मात्र है । परन्तु वही रूप है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । ये पदार्थ कार्य-कारण-अभ्यास की दृढ़ता से उपजे लगते हैं, पर आदि-सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजी—पीछे कारण से कार्य हुए । यद्यपि कार्य-कारण दिखते हैं तो भी कुछ उपजे नहीं, सदा अद्वैतरूप है । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के कार्य-कारण दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं, सदा अद्वैतरूप हैं, वैसे ही जाग्रत् में भी जानो । पदार्थों की स्मृति भी स्वप्न में होती है और अनुभव भी स्वप्न में होता है । जब स्वप्न ही नहीं हुआ तो स्मृति कहाँ है और अनुभव कहाँ है ? न जगत् का अनुभव है न जगत् है । अनुभवसत्ता ही जगत्रूप होकर दिखती है, जो जाग्रतरूप है । जब उसका अनुभव होगा, तब न स्मृति रहेगी और न जगत् रहेगा । इसलिए हे राम ! जो अनुभवरूप है, उसका अनुभव करो । यह जगत् अरूप है । जो उपजा नहीं, वह स्वतः सिद्ध है, और जो उपजा है और जिसमें दिखता है, उसे उसी का रूप जानो, भिन्न कुछ नहीं है । जैसे स्वप्न में जो पदार्थ दिखते हैं, वे उपजे नहीं, परन्तु उपजे दिखते हैं, सो वे अनुभव में उपजे हैं । अनुभव स्वतः सिद्ध है । उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, वे अनुभव-रूप हैं और अनुभवरूप ही इस प्रकार होकर दिखता है । वैसे ही ये सब अनुभवरूप हैं—भिन्न कुछ नहीं ।

८०४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

यह सब जगत् आत्मरूप है; इसलिए हे रामजी! सब जगत् अकारण और आत्मा का आभास है—कारण से कुछ नहीं बना। अनन्त ब्रह्मसत्ता ब्रह्माण्ड में आभास जगते हैं। वे अज्ञानी को कार्य-कारण सहित प्रतीत होते हैं। उसमें नीति हुई है, पर जब जागकर देखोगे, तब सब अद्वैतरूप दिखेगा। न कोई नीति है और न जगत् है। जब तक जीव अज्ञान-निद्रा में सोया हुआ है, तब तक जो पदार्थ उस सृष्टि में है, वही दिखेगा और जैसा कर्म है, वही भासित होगा। यह जगत् एक स्वप्न है, जिसमें स्वर्गादिक इष्ट पदार्थ और नरकादिक अनिष्ट पदार्थ हैं, और उनके प्राप्त होने का साधन धर्म तथा अधर्म है। धर्म स्वर्ग-सुख का और अधर्म नरकदुःख का साधन है। जब तक अविद्यारूपी निद्रा में जीव सोया हुआ है, तब तक इनको यथार्थ जानता है, पर जब जागेगा, तब सब आत्मरूप होगा। इष्ट-अनिष्ट कोई न रहेगा। यह सब जगत् अनुभवरूप है, और अनुभव सदा जाग्रत् ज्योति है। उसी को जानो। जिन पुरुषों ने इस अनुभव को नहीं जाना, वे उन्मत्त पशु हैं, क्योंकि वे आत्मबोध से शून्य हैं। वे सदा समीपवर्ती आत्मा को नहीं जानते, इससे उन्मत्त हैं, क्योंकि उन्मत्त को भी अपना आपा भूल जाता है। जैसे किसी को पिशाच लगता है, तब उसको अपना स्वरूप भूल जाता है और पिशाच ही देह में बोलता है, वैसे ही जिसको अज्ञानरूपी भूत लगता है, वह उन्मत्त हो जाता है, आत्मस्वरूप को नहीं जानता। वह विपर्यय बुद्धि से देहादिक को आत्मा जानता है और विपर्यय शब्द करता है। जिनको स्वरूप में अहंप्रतीति है, उनको सब जगत् आत्मरूप दिखता है। हे राम! आदिसृष्टि किसी कारण से बनी होती तो उसके पीछे प्रलयादिक में कुछ शेष रहता, पर वह अत्यन्त अभाव होती है, इसलिए सब जगत् कारण है। जैसे चिन्तामणि से अकारण पदार्थ दिखता है, वैसे ही यह अकारण है। न कहीं संस्कार है और न स्मृति है, सब आत्मा के पर्याय हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इससे सब जगत् को आत्मरूप जानो।

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो संस्कार से अनुभव न होता और

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ८०५

अनुभव से स्मृति न होती तो इस प्रकार प्रसिद्ध क्यों दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारा यह संशय भी दूर करता हूँ । जैसे हाथी के बालक को मारने में सिंह को कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही इस संशय का नाश करने में मुझे कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । जैसे सूर्य के उदय हुए तिमिर का अभाव हो जाता है, वैसे ही मेरे वचनों से तुम्हारा संशय दूर हो जायगा । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्रस्वरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु पुतलियाँ कुछ बनी नहीं, उसके मन में पुतलियों का आकार है, वैसे ही आत्मरूपी खम्भे में चित्तरूपी शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है ।

हे राम ! खम्भे में पुतलियाँ निकालते हैं तभी निकलती हैं, परन्तु आत्मा तो अद्वैत और निराकार है, उसमें और कुछ नहीं निकलता । उसमें वाणी की भी गति नहीं । वह चैतन्यमात्र है । अहं के फुरने से वह अपने को चैतन्य जानता है और फिर आगे शब्दों के अर्थ की कल्पना करता है । अपने को शुद्ध अधिष्ठान चैतन्य जानना ही ज्ञान है । ईश्वर, जीव, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, -आकाश, देश, काल इत्यादि शब्द और अर्थ स्फुरण ही में हुए हैं-जैसे एक ही समुद्र में द्रवता से आवर्त, तरङ्ग, फेन और बुलबुले आदि नाम होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्म ही के नाम हैं, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । वह फुरने से जगत् आकार होकर भासता है और फुरने से रहित होने पर जगत् आकार मिट जाता है । परन्तु फुरने न फुरने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे स्पंदन और निस्पंद में वायु ज्यों की त्यों है और सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे ब्रह्मस्वरूप हैं । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव पहाड़, वृक्ष आदि नाना प्रकार का जगत् होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जाग्रत् जगतरूप होकर दिखती है । वही कहीं अन्तवाहक, कहीं आधिभौतिक, कहीं ईश्वर और कहीं जीव आदि होकर भासित होता है, इससे लेकर शब्द-अर्थसंयुक्त जो जीव प्रकट होता गया है, वह ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित हुई है । जैसे खम्भे में पुतलियाँ खम्भरूप होती है, वैसे ही आत्माकाश में

८०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे उसमें जगत् आभास है, वैसे ही स्मृति-अनुभव भी आभास है । स्मृति जो संस्कार है उससे जगत् की उत्पत्ति तब कहिये, जब स्मृति आभास न हो । स्मृति-संस्कार भी तो आभास है, फिर वह जगत् का कारण कैसे हो सकती है ? स्मृति भी तब होती है, जब प्रथम जगत् होता है । जब जगत् ही नहीं तो स्मृति कैसे हो ? इससे जगत् आभासमात्र है । इसका कारण कोई नहीं ।

हे राम ! स्मृति-संस्कार जगत् का कारण तब हो, जब कुछ जगत् आगे हुआ हो । सो तो कुछ हुआ नहीं । और अनुभव उसका होता है, जो पदार्थ भासित होता है । सो इस जगत् के आदि में कुछ जगत् का अंश न था, फिर अनुभव कैसे कहूँ ? जो अनुभव ही न हुआ तो स्मृति किसको हो और जब स्मृति ही न हुई तो फिर उससे जगत् कैसे कहूँ ? इसलिए हे राम ! आदि-जगत् अकारण अकस्मात् उपजा है । जैसे रत्न की चमक होती है, वैसे ही जगत् है । यह पीछे से कारण-कार्य रूप भासित होता है । इससे हे राम ! जिसका कारण कोई न हो, उसे जानिये कि उपजा नहीं । वह जिसमें दिखता है, वही रूप है । अधिष्ठान से भिन्न कुछ नहीं । सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । स्मृति भी भ्रम में आभास जगा है और अनुभव भी आभास है । सो ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । और आभास भी कुछ उपजा नहीं, आभास की नाईं जगत् दिखता है—आत्म-सत्ता अद्वैत है, जिसमें आभास, स्मृति, अनुभव, जाग्रत् और स्वप्न की कल्पना कुछ नहीं तो क्या है ? ब्रह्म ही है । फुरना जिसे कहते हैं, वह कुछ वस्तु नहीं है । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही स्पन्दन चैतन्य आत्मा में जगत् की कल्पना करता है । शिल्पी तो आप भिन्न होकर कल्पना करता है, और यह चित्तसत्ता ऐसी है कि अपने ही स्वरूप में कल्पना करती है और जगतरूपी पुतलियाँ देखती है । आत्मा आकाशरूपी खंभा है, उसमें जगत् भी आकाशरूपी पुतलियाँ हैं । जैसे आकाश अपने आकाशभाव में स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने ब्रह्मभाव में स्थित है । जगत् भिन्न भी दिखता है परन्तु

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८०७

अचैत्य चिन्मात्रस्वरूप है, भेदभाव को नहीं प्राप्त हुआ। और विकार- वान् भी दिखता है, परन्तु विकार नहीं हुआ। जैसे स्वप्न में जीव आप ही सब स्पष्ट दिखाते हैं, वैसे ही यह जगत् अपने आपमें दिखता है, परन्तु कुछ नहीं है। हे राम! यही आश्चर्य है कि मैंने अपने अनु- भव को प्रकट करके उपदेश किया है; जीव आप भी जानते हैं, स्वप्न में नित्य देखते हैं और सुनते भी हैं, परन्तु निश्चय करके जान नहीं सकते और स्वप्न के पदार्थों को मूर्खता से त्याग नहीं सकते।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शालभञ्जनकोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो पुरुष इन्द्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुःख नहीं मानता इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता, उसको जीवन्मुक्त जानो। हे राम! सब शब्द अर्थ जिसका द्वैतरूप नहीं दिखते, उसे तुम जीवन्मुक्त जानो। जिस अविद्यारूपी जाग्रत् में अज्ञानी जागते हैं, उसमें ज्ञानवान् सो रहे हैं और परमार्थरूपी जाग्रत् में अज्ञानी सो रहे हैं। वे नहीं जानते कि परमार्थ क्या है? परन्तु उसमें जीवन्मुक्त स्थित है। इस कारण ज्ञानवान् इष्ट- अनिष्ट विषयों को पाकर सुखी और दुखी नहीं होते। उनका चित्त सदा आत्मपद में स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो पुरुष सुख पाकर सुखी और दुःख से दुःखी नहीं होता, वह तो जड़ हुआ। चैतन्य तो न हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सुख-दुःख तब तक होता है, जबतक चित्त को जगत् का सम्बन्ध होता है। जब चित्त जगत् के सम्बन्ध से रहित चिन्मात्र होता है, तब उपाधिकृत सुख-दुःख नहीं रहते। जो अपने स्वभाव में स्थित पुरुष हैं, ये परम विश्राम को प्राप्त होते हैं और सब कुछ करते हैं, परन्तु स्वरूप से उनको कर्तव्य का उत्थान कुछ नहीं होता, और सदा अद्वैत में निश्चय रहता है। नेत्रों से वे देखते हैं, परन्तु द्वैत की भावना उनको नहीं फुरती। जैसे अत्यन्त उत्तम को सब पदार्थ दिखते हैं, परन्तु सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही जिसकी बुद्धि

८०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अद्वैत में दृढ़ हुई है, उसे द्वैतरूप पदार्थ नहीं भासित होते। जिनको द्वैत नहीं दिखता, उनको सुख-दुःख कैसे लगे। उन पुरुषों ने वहाँ विश्राम किया है, जहाँ न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। वे सब द्वैत से रहित अद्वैतरूपी शय्या में विश्राम कर रहे हैं और संसार मार्ग को नाँघ गये हैं।

आत्मा के प्रमाद से जीव को कष्ट होता है। जो अपनी विभूति विद्या को त्यागकर प्रसन्न होता है और फिर संसार के क्रूरमार्ग में कष्ट पाता है, वह मनुष्य नहीं, मानो मृग है। वह संसाररूपी वन में भटकता कष्ट पाता है। जब प्यास से व्याकुल होता है, तब जल की ओर दौड़ता है। पर जहाँ जाता है, वहाँ मरुस्थल की नदी मृगमरीचिका ही दिखती है, जल नहीं प्राप्त होता। तब आगे दौड़ता है और प्यास अधिक बढ़ती जाती है। इस प्रकार दौड़ता-दौड़ता जड़ हो जाता है और दुखी होकर मर जाता है, परन्तु उसे जल नहीं प्राप्त होता। यह जल, दौड़ना, जड़ता और मरना चारों अलग-अलग सुनो। हे राम! मन ही मृग है, जो संसाररूपी वन में आ पड़ा है। यह इन्द्रियों के विषयरूपी जलाभास को सत्य जानकर शान्ति के लिए तृष्णारूपी मार्ग में दौड़ता है, पर वे विषय आभासमात्र हैं और उनमें शान्ति रूपी जल नहीं है, इसलिए वह दौड़ता-दौड़ता जब वृद्ध अवस्था में पड़ता है, तब जड़ होकर बड़े कष्ट को प्राप्त होता है, पर शान्तिरूपी जल नहीं पाता, इससे तृप्त भी नहीं होता। हे राम! मनुष्य मानों मजदूर है, जिसके सिर पर बड़ा भार है। वह अटपटे मार्ग में चला जाता है, जहाँ उसको चोर ने लूट लिया है, इससे दुखी होता है। हे राम! मनुष्य-रूपी मजदूर के शीश पर जन्म का बड़ा भार है। यह संशयरूपी अट-पटे मार्ग में खड़ा है। कर्मइन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषय हैं। इनसे रागद्वेषरूपी चोर ने विचाररूपी धन हर लिया है, इससे वह रागद्वेष और तृष्णारूपी अग्नि से जलता है। बड़ा आश्चर्य है कि ज्ञानी लोग ऐसे कुमार्ग को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और अन्य आनन्द को त्यागकर परमपद को आनन्द को प्राप्त हुए हैं।

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

८०६

उन मुक्त पुरुषों को संसार का दुःख-सुख व्याप नहीं सकता, क्योंकि वे परम अद्वैत शुद्ध सत्ता को प्राप्त हुए हैं। वे सबको देखते हैं। ग्रहण-त्याग-रूपी अग्नि को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और सदा उसी में सोये रहते हैं। वास्तव में सुख से वे ही सोते हैं और उनके भीतर सदा शान्ति रहती है। परन्तु वे जड़ता से रहित हैं और आकाश से भी अधिक सूक्ष्म सत्ता को प्राप्त हुए हैं। जैसे समुद्र में धूल नहीं होती और सूर्य में अंधकार नहीं होता, वैसे ही उनमें इन्द्रियों के इष्ट विषयों की तृष्णा नहीं होती। उन विषयों से रहित होकर उन्होंने विश्राम पाया है। यह आश्चर्य है कि अणु से अणु और महत् से महत् होकर भी वे केवल विश्राम को प्राप्त हुए हैं। हे राम! जो आत्मसत्ता की ओर से सोये पड़े हैं, उनको दुःख होता है। पर ज्ञानवान् द्वैत जगत् की ओर जड़ हुए हैं और अपने स्वरूप में स्थित हैं, इससे उनको दुःख कुछ नहीं। वे जाग्रत् की ओर से सोये हैं। उनका अविद्याकृत जगत् और दृश्य का सम्बन्ध दूर हो गया है। जब वे इस ओर से सोये हैं तो उनको फिर दुःख कैसे हो?

वे पुरुष सदा अद्वैतरूप हैं। वे अनन्त जगत् के कर्त्ता हैं और अपने को सदा अकर्त्ता जानते हैं, ऐसे आश्चर्यपद में उन्होंने विश्राम पाया है। जगत् के समूहसत्ता समान में स्थित होकर उन्होंने विश्राम पाया है, यह आश्चर्य है। वे सब किया करते हैं, परन्तु सदा अक्रियपद में स्थित हैं और सम्पूर्ण पदार्थों स्वप्नवत् जानकर सुषुप्त हुए हैं। वे आकाश से भी अधिक सूक्ष्म हैं, क्योंकि आत्मसत्ता में विश्राम पाया है। वह आत्मसत्ता आकाश को भी व्याप रही है; उसी को आत्मवत् जानकर वे स्थित हुए हैं। जो परम स्वच्छ पद है, उसमें सब शब्द अर्थ आकाशरूप हो जाते हैं और आकाश भी आकाश हो जाता है। उस पद में उन्होंने विश्राम किया है, यही आश्चर्य है। नेत्र उनके खुले हुए हैं, पर सुषुप्ति में स्थित हैं। ऐसी सुषुप्ति है कि उनका दृग् और दृश्य-भाव दूर हो गया है। वे जगत् के प्रकाश से रहित और परम प्रकाशरूप हैं। हे राम! वे बाहर के भोग्य पदार्थों से रहित हैं और आत्मा में स्थित

= १० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है। प्रकट में वे सोते हैं, पर सुषुप्ति में जागते हैं और जाग्रत् से उनको सुषुप्ति है। उस सुषुप्ति से वे सोये हैं और कर्म करते हैं, परन्तु कर्त्ता-कारणभाव से रहित हैं। क्रोध भी करते हैं। परन्तु क्रोध के स्फुरण से रहित हैं। सब ओर से प्रकाशवान् निर्भय होकर विश्राम करते हैं। कामना करते भी दिखते हैं, परन्तु तृष्णा से रहित हैं और निस्संकल्प पद में स्थित हुए हैं। यह आश्चर्य है कि जिस क्रिया की ओर वे देखते हैं, उसी ओर उनको शान्ति दिखती है, क्योंकि एक मित्र उनके साथ रहता है। इससे कोई दुःख उनके निकट नहीं आता।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५३ ॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह मित्र कौन है ? ज्ञानी का कोई कर्म मित्र है अथवा आत्मा में विश्राम का नाम मित्र है; यह संक्षेप में मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निष्काम कर्म ही वह अपना मित्र है अर्थात् अपना ही प्रयत्न उनका मित्र है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ये तीनों ताप सदा अज्ञानी को जलाते हैं, पर ज्ञानी को नहीं। जो बड़ा कष्ट और बहुत कोप भी उनको स्पर्श नहीं करता। जैसे कमल को जल नहीं स्पर्श करता, वैसे ही ज्ञानी को कष्ट नहीं स्पर्श करता, क्योंकि वह मित्र उसके साथ रहता है। जैसे बालक का मित्र बालक होता है, सो बड़े होने पर भी उसका हितू होता है, वैसे ही चिरकाल से ज्ञानवान् ने जो अभ्यास किया है, वही उसका मित्र होकर साथ देता है और दुष्ट क्रिया की ओर उसे नहीं प्रवृत्त होने देता, शुभ कर्म की ओर प्रवृत्त करता है। जैसे पिता पुत्र को अशुभ की ओर से वरजकर शुभ की ओर लगाता है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको तृष्णा से बर्जन करता है और आत्मा की ओर लगाता है। वह राग-द्वेषरूपी अग्नि से निकालकर समतारूपी शीतलता उसे देता है। ऐसा विचाररूपी उसका मित्र उसे सब दुःख क्लेशादिक से उबार ले जाता है—जैसे मल्लाह नदी के पार ले जाता है।

हे राम ! विचाररूपी मित्र बहुत सुन्दर है, शान्तरूप है। वह सब

  • निर्वाण प्रकरण * ८११

मल को जलानेवाली अग्नि है। जैसे अग्नि सुवर्ण के मैल को जला-कर उसे निर्मल बनाती है, वैसे ही विचाररूपी अग्नि राग-द्वेषरूपी मल को जलाती है। जब विचाररूपी मित्र आता है, तब स्वाभाविक चेष्टा निर्मल हो जाती है और वह वेदोक्त मार्ग में विचरता है। तब सब कोई उसको देखकर प्रसन्न होते हैं और दया, कोमलता, अमान और अक्रोध आदि गुण उसे प्राप्त होते हैं। जैसे तिलोँ में तेल, फूल में सुगन्ध और अग्नि में गर्मी रहती है, वैसे ही विचार में शुभ आचार रहते हैं। विचाररूपी मित्र शूर है। जो कोई शत्रु होता है, उसको वह पहले मारता है और अज्ञानरूपी शत्रु का नाश करता है—जैसे सूर्य तम का नाश करता है। फिर वह दीपक के प्रकाश-सा साथ होता है, विषय-भोगरूपी अन्धे कूप में गिरने नहीं देता और सब ओर से रक्षा करता है। जिस ओर वह पुरुष जाता है, उस ओर सबको प्रसन्नता होती है। हे राम ! उसकी वाणी कोमल, मधुर और स्निग्ध होती है। वह उदाराशय क्षोभ से रहित होकर लोगों का उपकार करता है, और वाणी से सबको प्रसन्न रखता है। वह सौहार्द, शान्ति और परमार्थ का कारण है। हे राम ! वचन तो उसके प्रसन्नता के लिए होते हैं और वह आप भी सदा प्रसन्न रहता है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने भर्ता को सदा प्रसन्न रखती है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको सदा प्रसन्न रखता है और शुभ आचार में चलाता है। दान, तप, यज्ञादिक शुभ कर्म वह आप भी करता है और लोगों से भी कराता है। जब अन्तःकरण में विवेकरूपी मन्त्री आता है तब वह वहाँ अपने परिवार को भी साथ ले आता है।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! उसका परिवार कौन है ? उसका स्वरूप और क्या आचार है ? संक्षेप से कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्नान, दान, तपस्या और ध्यान, ये चारों उसके बेटे हैं। स्नान यह है कि सदा पवित्र रहे। यथायोग्य और यथाशक्ति दान करे, यह दान है। बाहर की वृत्ति को भीतर स्थित करने का नाम तप और आत्मा में चित्तवृत्ति लगाने का नाम ध्यान है। ये चारों उसके बेटे हैं। ये आत्मदर्शी हैं, परन्तु वृत्ति को सदा स्वाभाविक अन्तर्मुख करके व्यवहार

८१२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️

करते हैं। मुदिता उसकी स्त्री है—सदा प्रसन्न रहने का नाम मुदिता है— जो वंदनीय है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा को देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं। मुदितारूपी स्त्री के साथ करुणा और दया नाम की एक सहेली रहती है। समतारूपी द्वारपालनी सम्मुख खड़ी रहती है। जब विवेक राजा अन्तःपुर में आता है, तब वह सम्मुख होकर सब स्थान दिखाती है और सदा साथ रहती है। जिस ओर राजा देखता है, उस ओर समता ही देख पड़ती है, जो आनन्द उपजानेवाली है। वह धैर्य और धर्म नाम के दो पुत्र साथ लेकर पुरी में विचरती है और जिस ओर राजा भेजता है, उस ओर उन्हें लिए फिरती है।

जब राजा सवार होकर चलता है, तब वह भी समतारूपी वाहन पर चढ़कर राजा के साथ जाती है। जब राजा विषयरूपी पाँचों शत्रुओं से लड़ाई करता है, तब धैर्य और संतोष मन्त्री मन्त्र देते हैं और विचाररूपी बाण से उनको नष्ट करते हैं। हे राम! विचार सदा उसके संग रहता है और सब कार्य करता है। यह चेष्टा उसकी स्वाभाविक होती है। वह आप सदा अमान रहता है। उसको कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। जैसे कागज पर लिखी मूर्ति अभिमान से रहित होती है, वैसे ही वह भी अभिमान से रहित है और परमार्थनिरूपण से रहित निरर्थक वचन नहीं बोलता, जैसे पत्थर कुछ नहीं कहता- सुनता। जिस क्रिया का शास्त्रों और लोगों ने निषेध किया है, उसे नहीं करता। जैसे शव कुछ क्रिया नहीं करता, वैसे ही उसको क्रिया का उत्थान नहीं होता। जहाँ ज्ञानियों और जिज्ञासुओं की सभा होती है, वहाँ वह शेषनाग और बृहस्पति की तरह परमार्थ का निरूपण करता है। सावधानता इत्यादि शुद्ध क्रियाएँ उसमें स्वाभाविक होती हैं, जैसे सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि में प्रकाश स्वाभाविक होता है, वैसे ही उसमें शुभ क्रियाएँ स्वाभाविक होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तिप्राप्तलक्षणव्यवहार- वर्णनं नाम द्विशताधिकचतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५४ ॥

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८१३

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् वास्तव में ज्ञानस्वरूप और आत्मसत्ता का चमत्कार है। और कुछ बना नहीं, ब्रह्मसत्ता ही फुरने से इस प्रकार होकर भासित होती है। इसका कारण भी कोई नहीं। जब महाप्रलय था, तब शब्द-अर्थ द्वैत कुछ न था। उस अद्वैतसत्ता से जगत् प्रकट हुआ है। जैसे बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, वह बीज भी जगत् का कोई न था, तो किस कारण से वह उत्पन्न हुआ और तो कोई कारण न था। इससे अब भी जगत् को महाप्रलयरूप जानो। हे राम! न कोई पृथ्वी आदि तत्त्व है, न जगत् है, न आभास है और न सृष्टि है। जैसे आकाश के फूलों में सुगन्ध नहीं होती, वैसे ही इनका होना भी नहीं है। केवल स्वच्छ ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। रूप इन्द्रियाँ और मन भी ब्रह्मस्वरूप है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव है और मन ही नाना प्रकार का जगत् और इन्द्रियाँ होकर दिखता है, और कुछ नहीं है वैसे ही यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! सब जगत् आत्मरूप है। जैसे कारण बिना आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, सो वास्तव में है नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है, और जिसमें यह आभास प्रकट हुआ है, वह अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। ये सब पदार्थ जो तुमको दिखते हैं, उन्हें ब्रह्मस्वरूप जानो। जैसे मनोराज्य की सृष्टि अपने अनुभव में होती है और उसका स्वरूप अनुभव से भिन्न नहीं होता, वैसे ही सृष्टि के आदि में जो अनुभव होता है, वह अनुभवरूप है। और कुछ उपजा नहीं—वही अनुभवसत्ता इस प्रकार भासित होती है।

हे राम! देश से देशान्तर को जो संवित् प्राप्त होती है, उसमें जो अनुभव है वही तुम्हारा स्वरूप है, और सब आभासमात्र है। जाग्रत् देश को त्यागकर जो स्वप्न शरीर के साथ नहीं मिली, और जाग्रत् स्वप्नदेश के मध्य में जो ब्रह्मसत्ता है, वही तुम्हारा स्वरूप है। वह प्रकाशरूप और अपने आपमें स्थित है। जाग्रत् जो दिखता है, वह भी उसी का स्वभाव है। जैसे रत्नों का स्वभाव चमकना है, अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का स्वभाव द्रव है और पवन का स्वभाव चलना है, वैसे ही ब्रह्म का स्वभाव जगत् है। जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता

८१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि अज्ञानी सत्य को असत्य और असत्य को सत्य जानते हैं। जो अनुभव-सत्ता है, उसको छिपाते हैं और खरगोश के सींग सरीखे जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। वे मूर्ख हैं। सबका प्रकाशक आत्मसत्ता है। जिसको तुम सूर्य देखते हो, वही परमदेव सूर्य होकर दिखता है। चन्द्रमा और अग्नि उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। निदान सबका प्रकाश और तेजसत्ता वही है। जैसे सूर्य की किरणों में सूक्ष्म अणु होते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में सूर्यादिक दिखते हैं। जिनको साकार और निराकार कहते हो, वह सब खरगोश के सींग से हैं। ज्ञानवान् को ऐसे ही दिखता है कि जगत् कुछ उपजा नहीं, तो मैं क्या कहूँ? जहाँ सब शब्दों का अभाव हो जाता है और उसके पीछे चिन्मात्रसत्ता शेष रहती है, वहाँ शून्य का भी अभाव हो जाता है।

हे राम! जिसको तुम जीता कहते हो, उनमें जीता भी कोई नहीं और जो जीता नहीं तो मरा कैसे हो ? जो कहिये जीता है तो जैसे जीता है, वैसे ही मृतक है। मृतक और जीते में कुछ भेद नहीं। इसलिए सब शब्दों से रहित और सबका अधिष्ठान वही सत्ता है। उसमें नानात्व दिखता भी है, परन्तु हुआ कुछ नहीं। पर्वत जो स्थूल दिख आते हैं, वे अणुमात्र भी नहीं—जैसे स्वप्न में पृथ्वी आदि तत्त्व दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसी में जगत् दिखता है। हे राम! जो परमार्थसत्ता से जगत् प्रकट हुआ, वह तो और कुछ न हुआ। इसलिए वही सत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। कोई कहते हैं कि आत्मा में है और कोई कहते हैं कि आत्मा में कुछ नहीं है, पर आत्मा में दोनों शब्दों का अभाव है, बल्कि अभाव का भी अभाव है। यह भी तुम्हारे जानने के लिए कहता हूँ। वह तो स्वस्थ और परम शान्तरूप है। उसमें और तुममें कुछ भेद नहीं है। वह परिपूर्ण, अच्युत, अनन्त और अद्वैत है। वही जगतरूप होकर दिखता है। जैसे कोई पुरुष शयन करता है तो सुषुप्ति में अद्वैतरूप हो जाता है, फिर सुषुप्ति से स्वप्न फुर आता है