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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1607, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1607

८०४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

यह सब जगत् आत्मरूप है; इसलिए हे रामजी! सब जगत् अकारण और आत्मा का आभास है—कारण से कुछ नहीं बना। अनन्त ब्रह्मसत्ता ब्रह्माण्ड में आभास जगते हैं। वे अज्ञानी को कार्य-कारण सहित प्रतीत होते हैं। उसमें नीति हुई है, पर जब जागकर देखोगे, तब सब अद्वैतरूप दिखेगा। न कोई नीति है और न जगत् है। जब तक जीव अज्ञान-निद्रा में सोया हुआ है, तब तक जो पदार्थ उस सृष्टि में है, वही दिखेगा और जैसा कर्म है, वही भासित होगा। यह जगत् एक स्वप्न है, जिसमें स्वर्गादिक इष्ट पदार्थ और नरकादिक अनिष्ट पदार्थ हैं, और उनके प्राप्त होने का साधन धर्म तथा अधर्म है। धर्म स्वर्ग-सुख का और अधर्म नरकदुःख का साधन है। जब तक अविद्यारूपी निद्रा में जीव सोया हुआ है, तब तक इनको यथार्थ जानता है, पर जब जागेगा, तब सब आत्मरूप होगा। इष्ट-अनिष्ट कोई न रहेगा। यह सब जगत् अनुभवरूप है, और अनुभव सदा जाग्रत् ज्योति है। उसी को जानो। जिन पुरुषों ने इस अनुभव को नहीं जाना, वे उन्मत्त पशु हैं, क्योंकि वे आत्मबोध से शून्य हैं। वे सदा समीपवर्ती आत्मा को नहीं जानते, इससे उन्मत्त हैं, क्योंकि उन्मत्त को भी अपना आपा भूल जाता है। जैसे किसी को पिशाच लगता है, तब उसको अपना स्वरूप भूल जाता है और पिशाच ही देह में बोलता है, वैसे ही जिसको अज्ञानरूपी भूत लगता है, वह उन्मत्त हो जाता है, आत्मस्वरूप को नहीं जानता। वह विपर्यय बुद्धि से देहादिक को आत्मा जानता है और विपर्यय शब्द करता है। जिनको स्वरूप में अहंप्रतीति है, उनको सब जगत् आत्मरूप दिखता है। हे राम! आदिसृष्टि किसी कारण से बनी होती तो उसके पीछे प्रलयादिक में कुछ शेष रहता, पर वह अत्यन्त अभाव होती है, इसलिए सब जगत् कारण है। जैसे चिन्तामणि से अकारण पदार्थ दिखता है, वैसे ही यह अकारण है। न कहीं संस्कार है और न स्मृति है, सब आत्मा के पर्याय हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इससे सब जगत् को आत्मरूप जानो।

रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो संस्कार से अनुभव न होता और