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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1606, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1606

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८०३

आकाश में शून्यता, फूलों में सुगन्ध, जल में द्रवता, वायु में स्पन्दन और अग्नि में उष्णता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । हे राम ! जगत् आत्मा का आभास है, इसलिए वही रूप है । यह जगत् भी अचेत्य चिन्मात्र है ।

जो तुम कहो कि अचेत्य चिन्मात्र है तो पृथ्वी, पहाड़ आदि आकर क्यों दिखते हैं ? तो हे राम ! जैसे नित्यप्रति जो तुमको स्वप्न आता है और उस अनुभव आकाश में पृथ्वी आदिक तत्त्व दिखते हैं तो वही चिन्मात्र ही आकार होकर दिखता है, और कुछ नहीं । वैसे ही इसे भी जानो । यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह अनुभवरूप है । जैसे चिन्मात्र आत्मा में सृष्टि आभासमात्र है, वैसे ही कारण-कार्य-भाव भी आभास-मात्र है । परन्तु वही रूप है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । ये पदार्थ कार्य-कारण-अभ्यास की दृढ़ता से उपजे लगते हैं, पर आदि-सृष्टि किसी कारण से नहीं उपजी—पीछे कारण से कार्य हुए । यद्यपि कार्य-कारण दिखते हैं तो भी कुछ उपजे नहीं, सदा अद्वैतरूप है । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के कार्य-कारण दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं, सदा अद्वैतरूप हैं, वैसे ही जाग्रत् में भी जानो । पदार्थों की स्मृति भी स्वप्न में होती है और अनुभव भी स्वप्न में होता है । जब स्वप्न ही नहीं हुआ तो स्मृति कहाँ है और अनुभव कहाँ है ? न जगत् का अनुभव है न जगत् है । अनुभवसत्ता ही जगत्रूप होकर दिखती है, जो जाग्रतरूप है । जब उसका अनुभव होगा, तब न स्मृति रहेगी और न जगत् रहेगा । इसलिए हे राम ! जो अनुभवरूप है, उसका अनुभव करो । यह जगत् अरूप है । जो उपजा नहीं, वह स्वतः सिद्ध है, और जो उपजा है और जिसमें दिखता है, उसे उसी का रूप जानो, भिन्न कुछ नहीं है । जैसे स्वप्न में जो पदार्थ दिखते हैं, वे उपजे नहीं, परन्तु उपजे दिखते हैं, सो वे अनुभव में उपजे हैं । अनुभव स्वतः सिद्ध है । उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, वे अनुभव-रूप हैं और अनुभवरूप ही इस प्रकार होकर दिखता है । वैसे ही ये सब अनुभवरूप हैं—भिन्न कुछ नहीं ।