योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1605, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८०२ ✵ योगवाशिष्ठ ✵
द्वैतकल्पना मिट जायगी । यह जो मोक्षशास्त्र मैंने तुमसे कहा है, इसके अर्थ कर विचारकर संकल्प को त्यागकर, अपने परमानन्दस्वरूप में स्थित हो रहो।
इतिश्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५१॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत् किसी कारण से नहीं उत्पन्न हुआ। जैसे समुद्र में तरंग स्वाभाविक उठते हैं, वैसे ही संवित्सत्ता से आदि-सृष्टि जगी है। और जैसे जल स्वाभाविक द्रवता से तरङ्गरूप अपनी सत्ता से बढ़ता जाता है, वैसे ही आत्मसत्ता से जगत् का विस्तार होता है । यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है। जब चिन्मात्र आत्मसत्ता का आभास बहिर्मुख जगता है, तब अन्तःकरण चतुष्टय होते हैं। उनमें जो निश्चय होता है, उसका नाम नीति है। वह प्रथम अकस्मात् कारण के बिना स्वाभाविक ही जग आया है और आभासमात्र है। जब वह दृढ हो गया, तब नीति स्थित हुई । वास्तव में द्वैत कुछ बना नहीं। जो सम्यक्दर्शी पुरुष हैं, उनको सब आत्मा ही दिखता है—जैसे पत्ते, फूल, फल टहनी सब वृक्ष हैं, उससे भिन्न नहीं हैं। हे राम ! वृक्ष में जो फूल, फल, और टहनी होती हैं, सो किसी कारण से बुद्धिपूर्वक बनी नहीं होतीं ? वैसे ही इस जगत् को भी जानो। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न रूप भी पत्ते, टास आदि के विस्तार में एक वृक्ष ही दिखता है। वैसे ही यथार्थ ज्ञानी को सब आत्मा ही दिखता है, और मिथ्यादृष्टिवाले को भिन्न-भिन्न पदार्थ दिखते हैं। हे राम ! वृक्ष को देखनेवाला भी और होता है, और दृष्टान्त में दूसरा कोई नहीं। चैतन्य आत्मा का आभास ही चेत्य है, वही चैतन्यरूप होकर भासित होता है । उस चैतन्य आभास को असम्यक् दृष्टि से भिन्न-भिन्न पदार्थ दीखते हैं। जैसे पत्ते, फूल, फल और वृक्ष अपने को भिन्न जानें। और सम्यक्दर्शी सबको आत्मरूप देखता है। ज्ञानी और अज्ञानी सब आत्मरूप हैं—जैसे दीवार पर लिखी पुतलियाँ दीवार से भिन्न नहीं होतीं, वैसे ही सर्वगत आत्म-रूपी दीवार के सब दृश्य चित्र हैं। वे आत्मा से भिन्न नहीं हैं। जैसे