योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1604, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ८०१
अद्वैत सत्ता है, जिसके पास द्वैत कुछ नहीं। सो सर्वदा अद्वैतसत्ता है। उसमें जगत् का अत्यन्त अभाव है, जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है—इसलिए सर्वदा तुरीयातीतपद है। जो मुझसे पूछो तो मुझको तरङ्ग, बुलबुले झाग और भँवर कुछ नहीं भासित होते—सर्वदा चित्-समुद्र ही दिखता है। उदय-अस्त से रहित आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और पृथ्वी आदि तत्त्व जो दिखते हैं, वे भी कुछ उपजे नहीं, आत्मसत्ता का किञ्चन ही इस प्रकार भासित होता है।
जैसे नख और केश उपजते भी हैं और नाश भी हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् उपजता भी है और लीन भी हो जाता है। जैसे नख और केश के उपजने और काटने से शरीर ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही जगत् के उपजने और लीन होने में आत्मा ज्यों का त्यों रहता है। हे राम ! यह जगत् उपजा नहीं तो उसमें सत्य और असत्य कल्पना और स्मृति क्या कहिये और भीतर और बाहर क्या कहिये ? अद्वैतसत्ता में कुछ कल्पना नहीं बनती। जो तुम कहो कि स्मृति भीतर होती है, परन्तु भीतर से बाहर दिखती है, तो भीतर अनुभव की अपेक्षा से हुई है, वह भी उत्पन्न नहीं हुई। तब मैं भीतर और बाहर क्या कहूँ ? जैसे स्वप्न-सृष्टि भासित होती है सो वह अपना ही अनुभव होता है, और वही सृष्टिरूप दिखता है। वहाँ तो भीतर-बाहर कुछ नहीं है। वैसे ही यह जगत् भीतर-बाहर कुछ नहीं है, सब भ्रमरूप है। जिसको इच्छा कहते हैं, उसे ही स्मृति कहते हैं। विद्या-अविद्या, इष्ट-अनिष्ट आदि सब शब्द सब आत्मा के ही नाम हैं—आत्मा से भिन्न और पदार्थ कुछ नहीं है। हे राम ! जागकर देखो कि सब तुम्हारा ही स्वरूप है। मिथ्या भ्रम को अंगीकार करके भिन्न क्यों देखते हो ? सब शब्द बिना अर्थ के कहीं नहीं हैं और शब्द-अर्थ का विचार संकल्प से होता है। संकल्प तब उठता है जब चित्त में अहंअभिमान होता है। उस चित्त को आत्मासार में लीन करो। जब चित्त का निर्वाण करोगे तब सब जगत् शान्त हो जायगा। अहं के दर्पण में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं। जब चित्त निर्वाण हो जायगा, तब सब