योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जल भासित हुआ तो उसमें जल माना गया। इसलिए जागकर जब देखा तो उस जल की स्मृति हुई अथवा स्वप्न के व्यवहारकर्ता को स्वप्नान्तर हुआ और उसे स्वप्नान्तर में फिर व्यवहार किया।
हे राम ! तुम देखो कि उसकी स्मृति भी असत्य हुई और जो उसने अनुभव किया वह भी असत्य है। वैसे ही यह संसार भी है, कुछ भिन्न नहीं। हे राम ! इसलिए न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न कोई सुषुप्ति है और न तुरीयावस्था है। केवल अद्वैतसत्ता सब उत्थान से रहित चिन्मात्र स्थित है। इसलिए जगत् भी वही रूप है। और यद्यपि क्रिया भी दिखती है तो भी कुछ हुआ नहीं। जैसे स्वप्न में कोई नारी आकर गले से लगती है तो उसकी क्रिया कुछ सच नहीं होती, वैसे ही यह क्रिया भी सच नहीं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय शब्दों का अर्थ निश्चय ज्ञानवान् पुरुष को है और ये उसको खरगोश के सींग और आकाश के फल सो असत्य प्रतीति होती हैं। जैसे बन्ध्या का पुत्र और श्याम चन्द्रमा शब्द कहने भर को हैं, इनका अर्थ असत्य है, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में पाँचों अवस्थाओं का होना असंभव है। वह सर्वदा जाग्रत है। जाग्रत् उसका नाम है, जहाँ अनुभव हो। वह अनुभवसत्ता सदा जाग्रत् रूप है। जैसा पदार्थ आगे आता है, उसी का जीव अनुभव करता है इससे सर्वदा सब कालों में, जाग्रत् है। अथवा सर्वदा स्वप्न है। स्वप्न उसका नाम है, जहाँ पदार्थ विपर्यय (उलटे) दिखते हैं। सो सब पदार्थ विपर्यय ही दिखते हैं। विपर्यय से रहित एक आत्मा है। उसमें जो पदार्थ भासित होते हैं, सो विपर्यय है, इसलिए सब काल में स्वप्न ही है। अथवा सर्वदा सुषुप्ति ही है। सुषुप्ति उसका नाम है, जहाँ अज्ञानवृत्ति हो। मैं अपने वास्तव रूप को भी नहीं जानता इसलिए न जानने सर्वदा सुषुप्ति। अथवा सर्वदा तुरीयावस्था है। तुरीयावस्था उसका नाम है जो साक्षीभूत सत्ता हो, जिसमें जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था का अनुभव होता है। जो सर्वदा सबको अनुभव करता है, वह प्रत्येक चैतन्य है। इससे सर्वदा तुरीयपद है। अथवा सर्वदा तुरीयातीतपद है। तुरीयातीत उसको कहते हैं, जो