योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1602, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७६६
भी तुम निश्चय से पाषाण-शिलासदृश मौन रहोगे और देखोगे, खाओगे, पियोगे, सूँघोगे, परन्तु तुम्हारे अपने निश्चय में कुछ न फुरेगा। जैसे पाषाण की शिला फुरना नहीं फुरता, वैसे ही तुम रहोगे-जो पैरों से दौड़ते जाओगे तो भी निश्चय ही चलायमान न होगे। जैसे आकाश और सुमेरु पर्वत अचल है, वैसे ही तुम भी स्थित रहोगे। क्रिया तो सब करोगे, परन्तु हृदय में क्रिया का अभिमान तुमको कुछ न होगा, केवल स्वभावसत्ता में स्थित होंगे। जैसे मूढ़ बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है, सो वह अविचारसिद्धि है और विचार किये से कुछ नहीं रहता, वैसे ही मूर्ख अज्ञानी आत्मा में मिथ्या आकार की कल्पना करते हैं। विचार करने से सब आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। जैसे मरुस्थल में नदी तब तक दिखती है, जबतक विचार करके नहीं देखता और विचार करने से नदी नहीं रहती वैसे ही यह जगत् विचार करने से नहीं रहता। जगत् चैतन्यरूपी रत्न की चमक है। चैतन्य आत्मा का किञ्चन फुरने से ही जगतरूप भासित होता है।
रामजी बोले, हे भगवन्! इस जगत् का कारण मैं स्मृति को मानता हूँ। वह स्मृति अनुभव से होती है और स्मृति से अनुभव होता है। स्मृति और अनुभव परस्पर कारण हैं। जब अनुभव होता है, तब उसको स्मृति भी होती है। तो वह स्मृतिसंस्कार फिर स्वप्न में जगतरूप हो क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् किसी संस्कार से नहीं उपजा और किसी अनुभव का संस्कार नहीं है। काकतालीय न्याय से अकस्मात् प्रकट हुआ है। हे राम! यह जगत् आभासमात्र है। आभास का अभाव कभी नहीं होता, क्योंकि वह उसका चमत्कार है। इतर कुछ बना हो तो उसका नाश भी हो, पर आत्मा से भिन्न तो कुछ हुआ ही नहीं, नाश कैसे और किसका हो? यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं। आत्मसत्ता अपने स्वभाव में स्थित है और जगत् उसका आभास है। हे राम! तुम जो स्मृति को कारण कहते हो, सो कारण-कार्यभाव आभास वहाँ भासित होते हैं, जहाँ द्वैत है। स्वरूप में तो कुछ कारण-कार्य भाव नहीं है। जैसे स्वप्न के मरुस्थल में