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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1601, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1601

७६८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वह शिला परमात्मा है। मैंने उसे शिलारूप इसलिए कहा कि यह घन चैतन्यरूप है, उससे इतर कुछ नहीं। वह अचिन्त्यरूप है। उस पर पञ्चतत्त्व रेखा है। वे रेखा भी वही रूप हैं। एक रेखा बड़ी है, जिसमें और रेखा रहती हैं। वह बड़ी रेखा आकाश है, जिसमें और तत्त्व रहते हैं। सब पदार्थ आकाश में हैं, सो सब वही रूप है। तुम भी वही रूप हो और मैं भी वही रूप हूँ। और कुछ हुआ नहीं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सब पदार्थ और कर्म जो भासित होते हैं, वे सब ब्रह्मरूपी शिला की रेखा है और कुछ हुआ नहीं। सब काल में ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। नाना प्रकार के व्यवहार भी देखे जाते हैं, परन्तु वही रूप हैं, और कुछ है ही नहीं। वैसे ही वह जानो। घट, पट, पहाड़ कन्दरा, स्थावर, जङ्गम, जगत् सब आत्मरूप है। आत्मा ही फुरने से ऐसे दिखता है। जैसे जल की लहरें होकर दिखता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगतरूप होकर दिखती है। और सब पदार्थ पवित्र, अपवित्र, सत्य, असत्य, विद्या, अविद्या, सब आत्मसत्ता ही के नाम हैं, इतर वस्तु कुछ नहीं है। ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम ! सभी वज्र ब्रह्मरूप है और चिन्मात्र घन ही सबमें व्याप रही है। पर परमार्थसत्ता घन शान्तरूप है और ये सब परमार्थ भी घनरूप हैं, इसलिए संकल्प-रूपी कल्पना को त्यागकर उसमें स्थित हो रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकपञ्चाशत्तमस्सर्गः॥२५०॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो पुरुष स्वभावसत्ता में स्थित हुए हैं, उनको ये चारों आख्यात कहे हैं। जितने और शब्दार्थ हैं, वे शशा के सींग की तरह असत्य हैं। जगत् का निश्चय उनमें नहीं रहता और सब ब्रह्माण्ड उनको आकाश सा दिखता है। आख्यात की कल्पना भी उन्हें कुछ नहीं फुरती। और सब जगत् जो दीखता है, वह निराकार परम चिदाकाशरूप है, परम निर्वाणसत्ता से युक्त दिखता है और उसी से निर्वाण हो जाता है, इसलिए वही स्वरूप है। हे राम ! जब इस प्रकार जानकर तुम उस पद में स्थित होगे, तब बड़ा शब्द करते हुए