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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1600, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1600

७६६ योगवाशिष्ठ

और ज्ञान का भी अभाव है, क्योंकि वह स्वतः ज्ञानस्वरूप है। जिनको अधिष्ठान का प्रमाद हुआ है, उनको दोनों अवस्थाएँ होती हैं। जो ज्ञानवान् है, उसको जगत् आत्मरूप दिखता है और जो ज्ञान से रहित है, उसको भिन्न भिन्न नामरूपवाला जगत् भासित होता है। हे राम! आत्मा निराख्यात है। वह चारों आख्यातों से रहित निराभाससत्ता है। चारों आख्यात उसमें आभास हैं। एक आख्यात, दूसरा विपर्य-याख्यात, तीसरा असत्याख्यात और चौथा आत्माख्यात, ये चार आख्यात हैं। आख्यात ज्ञान को कहते हैं। यह ज्ञान 'कि मैं अपने को नहीं जानता,' आख्यात है। अपने को देह-इन्द्रियरूप जानने का नाम विपर्ययाख्यात है। जगत् असत्य जानने का नाम असत्याख्यात है और आत्मा को आत्मा जानने का नाम आत्माख्यात है। ये चारों आख्यात चिन्मात्र आत्मतत्त्व के आभास हैं। आत्मसत्ता निर्विकल्प अचेत चिन्मात्र है। उसमें वाणी की गति ही नहीं है। हे राम! जगत् भी वही स्वरूप है, और कुछ बना नहीं। वह तत्त्व घनशिला की नाईं अविन्त्य स्वरूप है।

इस पर एक आख्यान है, जो श्रवणों का भूषण है, इसलिए तुमसे कहता हूँ। वह द्वैतदृष्टि का नाशकर, ज्ञानरूपी कमल का विकास करनेवाला सूर्य और परमपावन है। उसे सुनो। हे राम! एक बड़ी शिला है, जिसका कोटि योजन तक विस्तार है। वह अनन्त है, किसी ओर उसका अन्त नहीं आता, वह शुद्ध, निर्मल और निरासाध है, अर्थात् अणु-अणु से पुष्ट नहीं हुई, अपनी सत्ता से पूर्ण और परम सुन्दर है। जैसे शालग्राम की प्रतिमा सुन्दर होती है, वैसे ही वह सुन्दर है। जैसे शालग्राम पर शंख, चक्र, गदा और पद्म की रेखा होती हैं, वैसे ही उस पर रेखा है, और वही रूप है। वह वज्र से भी कठिन, शिला की नाईं निर्विकार और निराकार अचेतन परमार्थ है। यह जो कुछ चेतनता भासित होती है, वही उस पर रेखा है। अनन्त कल्प बीत गये हैं, परन्तु उसका नाश नहीं होता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश, ये सब भी उस पर रेखा हैं। वह आप पृथ्वी आदि भूतों से

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