योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1608, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ८०५
अनुभव से स्मृति न होती तो इस प्रकार प्रसिद्ध क्यों दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारा यह संशय भी दूर करता हूँ । जैसे हाथी के बालक को मारने में सिंह को कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही इस संशय का नाश करने में मुझे कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । जैसे सूर्य के उदय हुए तिमिर का अभाव हो जाता है, वैसे ही मेरे वचनों से तुम्हारा संशय दूर हो जायगा । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्रस्वरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु पुतलियाँ कुछ बनी नहीं, उसके मन में पुतलियों का आकार है, वैसे ही आत्मरूपी खम्भे में चित्तरूपी शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है ।
हे राम ! खम्भे में पुतलियाँ निकालते हैं तभी निकलती हैं, परन्तु आत्मा तो अद्वैत और निराकार है, उसमें और कुछ नहीं निकलता । उसमें वाणी की भी गति नहीं । वह चैतन्यमात्र है । अहं के फुरने से वह अपने को चैतन्य जानता है और फिर आगे शब्दों के अर्थ की कल्पना करता है । अपने को शुद्ध अधिष्ठान चैतन्य जानना ही ज्ञान है । ईश्वर, जीव, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, -आकाश, देश, काल इत्यादि शब्द और अर्थ स्फुरण ही में हुए हैं-जैसे एक ही समुद्र में द्रवता से आवर्त, तरङ्ग, फेन और बुलबुले आदि नाम होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्म ही के नाम हैं, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । वह फुरने से जगत् आकार होकर भासता है और फुरने से रहित होने पर जगत् आकार मिट जाता है । परन्तु फुरने न फुरने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे स्पंदन और निस्पंद में वायु ज्यों की त्यों है और सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे ब्रह्मस्वरूप हैं । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव पहाड़, वृक्ष आदि नाना प्रकार का जगत् होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जाग्रत् जगतरूप होकर दिखती है । वही कहीं अन्तवाहक, कहीं आधिभौतिक, कहीं ईश्वर और कहीं जीव आदि होकर भासित होता है, इससे लेकर शब्द-अर्थसंयुक्त जो जीव प्रकट होता गया है, वह ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित हुई है । जैसे खम्भे में पुतलियाँ खम्भरूप होती है, वैसे ही आत्माकाश में