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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ८०५

अनुभव से स्मृति न होती तो इस प्रकार प्रसिद्ध क्यों दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारा यह संशय भी दूर करता हूँ । जैसे हाथी के बालक को मारने में सिंह को कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वैसे ही इस संशय का नाश करने में मुझे कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । जैसे सूर्य के उदय हुए तिमिर का अभाव हो जाता है, वैसे ही मेरे वचनों से तुम्हारा संशय दूर हो जायगा । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्रस्वरूप है-उससे भिन्न नहीं । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, परन्तु पुतलियाँ कुछ बनी नहीं, उसके मन में पुतलियों का आकार है, वैसे ही आत्मरूपी खम्भे में चित्तरूपी शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है ।

हे राम ! खम्भे में पुतलियाँ निकालते हैं तभी निकलती हैं, परन्तु आत्मा तो अद्वैत और निराकार है, उसमें और कुछ नहीं निकलता । उसमें वाणी की भी गति नहीं । वह चैतन्यमात्र है । अहं के फुरने से वह अपने को चैतन्य जानता है और फिर आगे शब्दों के अर्थ की कल्पना करता है । अपने को शुद्ध अधिष्ठान चैतन्य जानना ही ज्ञान है । ईश्वर, जीव, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, -आकाश, देश, काल इत्यादि शब्द और अर्थ स्फुरण ही में हुए हैं-जैसे एक ही समुद्र में द्रवता से आवर्त, तरङ्ग, फेन और बुलबुले आदि नाम होते हैं, वैसे ही सब ब्रह्म ही के नाम हैं, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । वह फुरने से जगत् आकार होकर भासता है और फुरने से रहित होने पर जगत् आकार मिट जाता है । परन्तु फुरने न फुरने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे स्पंदन और निस्पंद में वायु ज्यों की त्यों है और सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे ब्रह्मस्वरूप हैं । जैसे स्वप्न में अपना ही अनुभव पहाड़, वृक्ष आदि नाना प्रकार का जगत् होकर भासित होता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जाग्रत् जगतरूप होकर दिखती है । वही कहीं अन्तवाहक, कहीं आधिभौतिक, कहीं ईश्वर और कहीं जीव आदि होकर भासित होता है, इससे लेकर शब्द-अर्थसंयुक्त जो जीव प्रकट होता गया है, वह ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित हुई है । जैसे खम्भे में पुतलियाँ खम्भरूप होती है, वैसे ही आत्माकाश में

८०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जगत् आत्मरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे उसमें जगत् आभास है, वैसे ही स्मृति-अनुभव भी आभास है । स्मृति जो संस्कार है उससे जगत् की उत्पत्ति तब कहिये, जब स्मृति आभास न हो । स्मृति-संस्कार भी तो आभास है, फिर वह जगत् का कारण कैसे हो सकती है ? स्मृति भी तब होती है, जब प्रथम जगत् होता है । जब जगत् ही नहीं तो स्मृति कैसे हो ? इससे जगत् आभासमात्र है । इसका कारण कोई नहीं ।

हे राम ! स्मृति-संस्कार जगत् का कारण तब हो, जब कुछ जगत् आगे हुआ हो । सो तो कुछ हुआ नहीं । और अनुभव उसका होता है, जो पदार्थ भासित होता है । सो इस जगत् के आदि में कुछ जगत् का अंश न था, फिर अनुभव कैसे कहूँ ? जो अनुभव ही न हुआ तो स्मृति किसको हो और जब स्मृति ही न हुई तो फिर उससे जगत् कैसे कहूँ ? इसलिए हे राम ! आदि-जगत् अकारण अकस्मात् उपजा है । जैसे रत्न की चमक होती है, वैसे ही जगत् है । यह पीछे से कारण-कार्य रूप भासित होता है । इससे हे राम ! जिसका कारण कोई न हो, उसे जानिये कि उपजा नहीं । वह जिसमें दिखता है, वही रूप है । अधिष्ठान से भिन्न कुछ नहीं । सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । स्मृति भी भ्रम में आभास जगा है और अनुभव भी आभास है । सो ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । और आभास भी कुछ उपजा नहीं, आभास की नाईं जगत् दिखता है—आत्म-सत्ता अद्वैत है, जिसमें आभास, स्मृति, अनुभव, जाग्रत् और स्वप्न की कल्पना कुछ नहीं तो क्या है ? ब्रह्म ही है । फुरना जिसे कहते हैं, वह कुछ वस्तु नहीं है । जैसे खम्भे में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही स्पन्दन चैतन्य आत्मा में जगत् की कल्पना करता है । शिल्पी तो आप भिन्न होकर कल्पना करता है, और यह चित्तसत्ता ऐसी है कि अपने ही स्वरूप में कल्पना करती है और जगतरूपी पुतलियाँ देखती है । आत्मा आकाशरूपी खंभा है, उसमें जगत् भी आकाशरूपी पुतलियाँ हैं । जैसे आकाश अपने आकाशभाव में स्थित है, वैसे ही ब्रह्म अपने ब्रह्मभाव में स्थित है । जगत् भिन्न भी दिखता है परन्तु

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८०७

अचैत्य चिन्मात्रस्वरूप है, भेदभाव को नहीं प्राप्त हुआ। और विकार- वान् भी दिखता है, परन्तु विकार नहीं हुआ। जैसे स्वप्न में जीव आप ही सब स्पष्ट दिखाते हैं, वैसे ही यह जगत् अपने आपमें दिखता है, परन्तु कुछ नहीं है। हे राम! यही आश्चर्य है कि मैंने अपने अनु- भव को प्रकट करके उपदेश किया है; जीव आप भी जानते हैं, स्वप्न में नित्य देखते हैं और सुनते भी हैं, परन्तु निश्चय करके जान नहीं सकते और स्वप्न के पदार्थों को मूर्खता से त्याग नहीं सकते।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शालभञ्जनकोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो पुरुष इन्द्रियों के इष्ट विषयों को पाकर सुख नहीं मानता और अनिष्ट विषयों को पाकर दुःख नहीं मानता इनके भ्रम से मुक्त है और बड़े भोग प्राप्त हों तो भी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता, उसको जीवन्मुक्त जानो। हे राम! सब शब्द अर्थ जिसका द्वैतरूप नहीं दिखते, उसे तुम जीवन्मुक्त जानो। जिस अविद्यारूपी जाग्रत् में अज्ञानी जागते हैं, उसमें ज्ञानवान् सो रहे हैं और परमार्थरूपी जाग्रत् में अज्ञानी सो रहे हैं। वे नहीं जानते कि परमार्थ क्या है? परन्तु उसमें जीवन्मुक्त स्थित है। इस कारण ज्ञानवान् इष्ट- अनिष्ट विषयों को पाकर सुखी और दुखी नहीं होते। उनका चित्त सदा आत्मपद में स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जो पुरुष सुख पाकर सुखी और दुःख से दुःखी नहीं होता, वह तो जड़ हुआ। चैतन्य तो न हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सुख-दुःख तब तक होता है, जबतक चित्त को जगत् का सम्बन्ध होता है। जब चित्त जगत् के सम्बन्ध से रहित चिन्मात्र होता है, तब उपाधिकृत सुख-दुःख नहीं रहते। जो अपने स्वभाव में स्थित पुरुष हैं, ये परम विश्राम को प्राप्त होते हैं और सब कुछ करते हैं, परन्तु स्वरूप से उनको कर्तव्य का उत्थान कुछ नहीं होता, और सदा अद्वैत में निश्चय रहता है। नेत्रों से वे देखते हैं, परन्तु द्वैत की भावना उनको नहीं फुरती। जैसे अत्यन्त उत्तम को सब पदार्थ दिखते हैं, परन्तु सब पदार्थों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही जिसकी बुद्धि

८०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अद्वैत में दृढ़ हुई है, उसे द्वैतरूप पदार्थ नहीं भासित होते। जिनको द्वैत नहीं दिखता, उनको सुख-दुःख कैसे लगे। उन पुरुषों ने वहाँ विश्राम किया है, जहाँ न जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। वे सब द्वैत से रहित अद्वैतरूपी शय्या में विश्राम कर रहे हैं और संसार मार्ग को नाँघ गये हैं।

आत्मा के प्रमाद से जीव को कष्ट होता है। जो अपनी विभूति विद्या को त्यागकर प्रसन्न होता है और फिर संसार के क्रूरमार्ग में कष्ट पाता है, वह मनुष्य नहीं, मानो मृग है। वह संसाररूपी वन में भटकता कष्ट पाता है। जब प्यास से व्याकुल होता है, तब जल की ओर दौड़ता है। पर जहाँ जाता है, वहाँ मरुस्थल की नदी मृगमरीचिका ही दिखती है, जल नहीं प्राप्त होता। तब आगे दौड़ता है और प्यास अधिक बढ़ती जाती है। इस प्रकार दौड़ता-दौड़ता जड़ हो जाता है और दुखी होकर मर जाता है, परन्तु उसे जल नहीं प्राप्त होता। यह जल, दौड़ना, जड़ता और मरना चारों अलग-अलग सुनो। हे राम! मन ही मृग है, जो संसाररूपी वन में आ पड़ा है। यह इन्द्रियों के विषयरूपी जलाभास को सत्य जानकर शान्ति के लिए तृष्णारूपी मार्ग में दौड़ता है, पर वे विषय आभासमात्र हैं और उनमें शान्ति रूपी जल नहीं है, इसलिए वह दौड़ता-दौड़ता जब वृद्ध अवस्था में पड़ता है, तब जड़ होकर बड़े कष्ट को प्राप्त होता है, पर शान्तिरूपी जल नहीं पाता, इससे तृप्त भी नहीं होता। हे राम! मनुष्य मानों मजदूर है, जिसके सिर पर बड़ा भार है। वह अटपटे मार्ग में चला जाता है, जहाँ उसको चोर ने लूट लिया है, इससे दुखी होता है। हे राम! मनुष्य-रूपी मजदूर के शीश पर जन्म का बड़ा भार है। यह संशयरूपी अट-पटे मार्ग में खड़ा है। कर्मइन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषय हैं। इनसे रागद्वेषरूपी चोर ने विचाररूपी धन हर लिया है, इससे वह रागद्वेष और तृष्णारूपी अग्नि से जलता है। बड़ा आश्चर्य है कि ज्ञानी लोग ऐसे कुमार्ग को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और अन्य आनन्द को त्यागकर परमपद को आनन्द को प्राप्त हुए हैं।

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

८०६

उन मुक्त पुरुषों को संसार का दुःख-सुख व्याप नहीं सकता, क्योंकि वे परम अद्वैत शुद्ध सत्ता को प्राप्त हुए हैं। वे सबको देखते हैं। ग्रहण-त्याग-रूपी अग्नि को त्यागकर उन्होंने परमपद में विश्राम पाया है और सदा उसी में सोये रहते हैं। वास्तव में सुख से वे ही सोते हैं और उनके भीतर सदा शान्ति रहती है। परन्तु वे जड़ता से रहित हैं और आकाश से भी अधिक सूक्ष्म सत्ता को प्राप्त हुए हैं। जैसे समुद्र में धूल नहीं होती और सूर्य में अंधकार नहीं होता, वैसे ही उनमें इन्द्रियों के इष्ट विषयों की तृष्णा नहीं होती। उन विषयों से रहित होकर उन्होंने विश्राम पाया है। यह आश्चर्य है कि अणु से अणु और महत् से महत् होकर भी वे केवल विश्राम को प्राप्त हुए हैं। हे राम! जो आत्मसत्ता की ओर से सोये पड़े हैं, उनको दुःख होता है। पर ज्ञानवान् द्वैत जगत् की ओर जड़ हुए हैं और अपने स्वरूप में स्थित हैं, इससे उनको दुःख कुछ नहीं। वे जाग्रत् की ओर से सोये हैं। उनका अविद्याकृत जगत् और दृश्य का सम्बन्ध दूर हो गया है। जब वे इस ओर से सोये हैं तो उनको फिर दुःख कैसे हो?

वे पुरुष सदा अद्वैतरूप हैं। वे अनन्त जगत् के कर्त्ता हैं और अपने को सदा अकर्त्ता जानते हैं, ऐसे आश्चर्यपद में उन्होंने विश्राम पाया है। जगत् के समूहसत्ता समान में स्थित होकर उन्होंने विश्राम पाया है, यह आश्चर्य है। वे सब किया करते हैं, परन्तु सदा अक्रियपद में स्थित हैं और सम्पूर्ण पदार्थों स्वप्नवत् जानकर सुषुप्त हुए हैं। वे आकाश से भी अधिक सूक्ष्म हैं, क्योंकि आत्मसत्ता में विश्राम पाया है। वह आत्मसत्ता आकाश को भी व्याप रही है; उसी को आत्मवत् जानकर वे स्थित हुए हैं। जो परम स्वच्छ पद है, उसमें सब शब्द अर्थ आकाशरूप हो जाते हैं और आकाश भी आकाश हो जाता है। उस पद में उन्होंने विश्राम किया है, यही आश्चर्य है। नेत्र उनके खुले हुए हैं, पर सुषुप्ति में स्थित हैं। ऐसी सुषुप्ति है कि उनका दृग् और दृश्य-भाव दूर हो गया है। वे जगत् के प्रकाश से रहित और परम प्रकाशरूप हैं। हे राम! वे बाहर के भोग्य पदार्थों से रहित हैं और आत्मा में स्थित

= १० ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है। प्रकट में वे सोते हैं, पर सुषुप्ति में जागते हैं और जाग्रत् से उनको सुषुप्ति है। उस सुषुप्ति से वे सोये हैं और कर्म करते हैं, परन्तु कर्त्ता-कारणभाव से रहित हैं। क्रोध भी करते हैं। परन्तु क्रोध के स्फुरण से रहित हैं। सब ओर से प्रकाशवान् निर्भय होकर विश्राम करते हैं। कामना करते भी दिखते हैं, परन्तु तृष्णा से रहित हैं और निस्संकल्प पद में स्थित हुए हैं। यह आश्चर्य है कि जिस क्रिया की ओर वे देखते हैं, उसी ओर उनको शान्ति दिखती है, क्योंकि एक मित्र उनके साथ रहता है। इससे कोई दुःख उनके निकट नहीं आता।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५३ ॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह मित्र कौन है ? ज्ञानी का कोई कर्म मित्र है अथवा आत्मा में विश्राम का नाम मित्र है; यह संक्षेप में मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निष्काम कर्म ही वह अपना मित्र है अर्थात् अपना ही प्रयत्न उनका मित्र है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ये तीनों ताप सदा अज्ञानी को जलाते हैं, पर ज्ञानी को नहीं। जो बड़ा कष्ट और बहुत कोप भी उनको स्पर्श नहीं करता। जैसे कमल को जल नहीं स्पर्श करता, वैसे ही ज्ञानी को कष्ट नहीं स्पर्श करता, क्योंकि वह मित्र उसके साथ रहता है। जैसे बालक का मित्र बालक होता है, सो बड़े होने पर भी उसका हितू होता है, वैसे ही चिरकाल से ज्ञानवान् ने जो अभ्यास किया है, वही उसका मित्र होकर साथ देता है और दुष्ट क्रिया की ओर उसे नहीं प्रवृत्त होने देता, शुभ कर्म की ओर प्रवृत्त करता है। जैसे पिता पुत्र को अशुभ की ओर से वरजकर शुभ की ओर लगाता है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको तृष्णा से बर्जन करता है और आत्मा की ओर लगाता है। वह राग-द्वेषरूपी अग्नि से निकालकर समतारूपी शीतलता उसे देता है। ऐसा विचाररूपी उसका मित्र उसे सब दुःख क्लेशादिक से उबार ले जाता है—जैसे मल्लाह नदी के पार ले जाता है।

हे राम ! विचाररूपी मित्र बहुत सुन्दर है, शान्तरूप है। वह सब

  • निर्वाण प्रकरण * ८११

मल को जलानेवाली अग्नि है। जैसे अग्नि सुवर्ण के मैल को जला-कर उसे निर्मल बनाती है, वैसे ही विचाररूपी अग्नि राग-द्वेषरूपी मल को जलाती है। जब विचाररूपी मित्र आता है, तब स्वाभाविक चेष्टा निर्मल हो जाती है और वह वेदोक्त मार्ग में विचरता है। तब सब कोई उसको देखकर प्रसन्न होते हैं और दया, कोमलता, अमान और अक्रोध आदि गुण उसे प्राप्त होते हैं। जैसे तिलोँ में तेल, फूल में सुगन्ध और अग्नि में गर्मी रहती है, वैसे ही विचार में शुभ आचार रहते हैं। विचाररूपी मित्र शूर है। जो कोई शत्रु होता है, उसको वह पहले मारता है और अज्ञानरूपी शत्रु का नाश करता है—जैसे सूर्य तम का नाश करता है। फिर वह दीपक के प्रकाश-सा साथ होता है, विषय-भोगरूपी अन्धे कूप में गिरने नहीं देता और सब ओर से रक्षा करता है। जिस ओर वह पुरुष जाता है, उस ओर सबको प्रसन्नता होती है। हे राम ! उसकी वाणी कोमल, मधुर और स्निग्ध होती है। वह उदाराशय क्षोभ से रहित होकर लोगों का उपकार करता है, और वाणी से सबको प्रसन्न रखता है। वह सौहार्द, शान्ति और परमार्थ का कारण है। हे राम ! वचन तो उसके प्रसन्नता के लिए होते हैं और वह आप भी सदा प्रसन्न रहता है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने भर्ता को सदा प्रसन्न रखती है, वैसे ही विचाररूपी मित्र उसको सदा प्रसन्न रखता है और शुभ आचार में चलाता है। दान, तप, यज्ञादिक शुभ कर्म वह आप भी करता है और लोगों से भी कराता है। जब अन्तःकरण में विवेकरूपी मन्त्री आता है तब वह वहाँ अपने परिवार को भी साथ ले आता है।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! उसका परिवार कौन है ? उसका स्वरूप और क्या आचार है ? संक्षेप से कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्नान, दान, तपस्या और ध्यान, ये चारों उसके बेटे हैं। स्नान यह है कि सदा पवित्र रहे। यथायोग्य और यथाशक्ति दान करे, यह दान है। बाहर की वृत्ति को भीतर स्थित करने का नाम तप और आत्मा में चित्तवृत्ति लगाने का नाम ध्यान है। ये चारों उसके बेटे हैं। ये आत्मदर्शी हैं, परन्तु वृत्ति को सदा स्वाभाविक अन्तर्मुख करके व्यवहार

८१२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️

करते हैं। मुदिता उसकी स्त्री है—सदा प्रसन्न रहने का नाम मुदिता है— जो वंदनीय है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा की रेखा को देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते हैं और नमस्कार करते हैं। मुदितारूपी स्त्री के साथ करुणा और दया नाम की एक सहेली रहती है। समतारूपी द्वारपालनी सम्मुख खड़ी रहती है। जब विवेक राजा अन्तःपुर में आता है, तब वह सम्मुख होकर सब स्थान दिखाती है और सदा साथ रहती है। जिस ओर राजा देखता है, उस ओर समता ही देख पड़ती है, जो आनन्द उपजानेवाली है। वह धैर्य और धर्म नाम के दो पुत्र साथ लेकर पुरी में विचरती है और जिस ओर राजा भेजता है, उस ओर उन्हें लिए फिरती है।

जब राजा सवार होकर चलता है, तब वह भी समतारूपी वाहन पर चढ़कर राजा के साथ जाती है। जब राजा विषयरूपी पाँचों शत्रुओं से लड़ाई करता है, तब धैर्य और संतोष मन्त्री मन्त्र देते हैं और विचाररूपी बाण से उनको नष्ट करते हैं। हे राम! विचार सदा उसके संग रहता है और सब कार्य करता है। यह चेष्टा उसकी स्वाभाविक होती है। वह आप सदा अमान रहता है। उसको कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। जैसे कागज पर लिखी मूर्ति अभिमान से रहित होती है, वैसे ही वह भी अभिमान से रहित है और परमार्थनिरूपण से रहित निरर्थक वचन नहीं बोलता, जैसे पत्थर कुछ नहीं कहता- सुनता। जिस क्रिया का शास्त्रों और लोगों ने निषेध किया है, उसे नहीं करता। जैसे शव कुछ क्रिया नहीं करता, वैसे ही उसको क्रिया का उत्थान नहीं होता। जहाँ ज्ञानियों और जिज्ञासुओं की सभा होती है, वहाँ वह शेषनाग और बृहस्पति की तरह परमार्थ का निरूपण करता है। सावधानता इत्यादि शुद्ध क्रियाएँ उसमें स्वाभाविक होती हैं, जैसे सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि में प्रकाश स्वाभाविक होता है, वैसे ही उसमें शुभ क्रियाएँ स्वाभाविक होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तिप्राप्तलक्षणव्यवहार- वर्णनं नाम द्विशताधिकचतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५४ ॥

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८१३

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जगत् वास्तव में ज्ञानस्वरूप और आत्मसत्ता का चमत्कार है। और कुछ बना नहीं, ब्रह्मसत्ता ही फुरने से इस प्रकार होकर भासित होती है। इसका कारण भी कोई नहीं। जब महाप्रलय था, तब शब्द-अर्थ द्वैत कुछ न था। उस अद्वैतसत्ता से जगत् प्रकट हुआ है। जैसे बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है, वह बीज भी जगत् का कोई न था, तो किस कारण से वह उत्पन्न हुआ और तो कोई कारण न था। इससे अब भी जगत् को महाप्रलयरूप जानो। हे राम! न कोई पृथ्वी आदि तत्त्व है, न जगत् है, न आभास है और न सृष्टि है। जैसे आकाश के फूलों में सुगन्ध नहीं होती, वैसे ही इनका होना भी नहीं है। केवल स्वच्छ ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। रूप इन्द्रियाँ और मन भी ब्रह्मस्वरूप है। जैसे स्वप्न में अपना अनुभव है और मन ही नाना प्रकार का जगत् और इन्द्रियाँ होकर दिखता है, और कुछ नहीं है वैसे ही यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! सब जगत् आत्मरूप है। जैसे कारण बिना आकाश में दूसरा चन्द्रमा दिखता है, सो वास्तव में है नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का आभास है, और जिसमें यह आभास प्रकट हुआ है, वह अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। ये सब पदार्थ जो तुमको दिखते हैं, उन्हें ब्रह्मस्वरूप जानो। जैसे मनोराज्य की सृष्टि अपने अनुभव में होती है और उसका स्वरूप अनुभव से भिन्न नहीं होता, वैसे ही सृष्टि के आदि में जो अनुभव होता है, वह अनुभवरूप है। और कुछ उपजा नहीं—वही अनुभवसत्ता इस प्रकार भासित होती है।

हे राम! देश से देशान्तर को जो संवित् प्राप्त होती है, उसमें जो अनुभव है वही तुम्हारा स्वरूप है, और सब आभासमात्र है। जाग्रत् देश को त्यागकर जो स्वप्न शरीर के साथ नहीं मिली, और जाग्रत् स्वप्नदेश के मध्य में जो ब्रह्मसत्ता है, वही तुम्हारा स्वरूप है। वह प्रकाशरूप और अपने आपमें स्थित है। जाग्रत् जो दिखता है, वह भी उसी का स्वभाव है। जैसे रत्नों का स्वभाव चमकना है, अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का स्वभाव द्रव है और पवन का स्वभाव चलना है, वैसे ही ब्रह्म का स्वभाव जगत् है। जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता

८१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। हे राम! यह आश्चर्य है कि अज्ञानी सत्य को असत्य और असत्य को सत्य जानते हैं। जो अनुभव-सत्ता है, उसको छिपाते हैं और खरगोश के सींग सरीखे जगत् को प्रत्यक्ष जानते हैं। वे मूर्ख हैं। सबका प्रकाशक आत्मसत्ता है। जिसको तुम सूर्य देखते हो, वही परमदेव सूर्य होकर दिखता है। चन्द्रमा और अग्नि उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। निदान सबका प्रकाश और तेजसत्ता वही है। जैसे सूर्य की किरणों में सूक्ष्म अणु होते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता में सूर्यादिक दिखते हैं। जिनको साकार और निराकार कहते हो, वह सब खरगोश के सींग से हैं। ज्ञानवान् को ऐसे ही दिखता है कि जगत् कुछ उपजा नहीं, तो मैं क्या कहूँ? जहाँ सब शब्दों का अभाव हो जाता है और उसके पीछे चिन्मात्रसत्ता शेष रहती है, वहाँ शून्य का भी अभाव हो जाता है।

हे राम! जिसको तुम जीता कहते हो, उनमें जीता भी कोई नहीं और जो जीता नहीं तो मरा कैसे हो ? जो कहिये जीता है तो जैसे जीता है, वैसे ही मृतक है। मृतक और जीते में कुछ भेद नहीं। इसलिए सब शब्दों से रहित और सबका अधिष्ठान वही सत्ता है। उसमें नानात्व दिखता भी है, परन्तु हुआ कुछ नहीं। पर्वत जो स्थूल दिख आते हैं, वे अणुमात्र भी नहीं—जैसे स्वप्न में पृथ्वी आदि तत्त्व दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और उसी में जगत् दिखता है। हे राम! जो परमार्थसत्ता से जगत् प्रकट हुआ, वह तो और कुछ न हुआ। इसलिए वही सत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। कोई कहते हैं कि आत्मा में है और कोई कहते हैं कि आत्मा में कुछ नहीं है, पर आत्मा में दोनों शब्दों का अभाव है, बल्कि अभाव का भी अभाव है। यह भी तुम्हारे जानने के लिए कहता हूँ। वह तो स्वस्थ और परम शान्तरूप है। उसमें और तुममें कुछ भेद नहीं है। वह परिपूर्ण, अच्युत, अनन्त और अद्वैत है। वही जगतरूप होकर दिखता है। जैसे कोई पुरुष शयन करता है तो सुषुप्ति में अद्वैतरूप हो जाता है, फिर सुषुप्ति से स्वप्न फुर आता है

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

८१५

और फिर सुषुप्ति में वह लीन हो जाता है, तो उपजा क्या और लीन क्या हुआ ? स्वप्न के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी वही रही। मध्य में जो कुछ दिखा, वह भी वही रूप हुआ, आत्मा से भिन्न तो कुछ न हुआ। इसलिए सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है-ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। हे राम ! मुझको तो सदा अनुभवरूप जगत् दिखता है। मैं नहीं जानता कि अज्ञानी को क्या दिखता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि से जो जागा है, उसको अद्वैत अपना रूप दिखता है, वैसे ही तुरीयावस्था में दिखता है। तुरीय और जाग्रत् में कुछ भेद नहीं, जाग्रत् ही तुरीय का नाम है और जाग्रत् तुरीयरूप है। बल्कि यह भी क्या कहना है, सभी अवस्थाएँ तुरीयरूप हैं।

तुरीय जाग्रत्सत्ता का नाम है। जो अनुभव की साक्षी ज्योति है, वह जाग्रत् में भी साक्षीरूप है, स्वप्न में भी साक्षीरूप है और सुषुप्ति में भी साक्षीरूप है। इसलिए सब तुरीयरूप है। परन्तु जिसको स्वरूप का अनुभव हुआ है, उस ज्ञानवान् को ऐसे ही दिखता है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ दिखती हैं। हे राम ! एक पदार्थ का वृत्ति ने त्याग किया, पर वह दूसरे पदार्थ में नहीं लगी। वह जो मध्य में अनुभव ज्योति है, उसको तुम आत्मसत्ता जानो और उसमें जो फिर कुछ भासित हुआ उसे भी वही रूप जानो। जैसे जाग्रत् को त्यागकर स्वप्न का आदि साक्षी अनुभवमात्र होता है और उस सत्ता में स्वप्न का शरीर पदार्थ भासित होते हैं, वे भी आत्मरूप हैं, वैसे ही जो कुछ जाग्रत् शरीर और पदार्थ दिखते हैं, वे आत्मरूप हैं। जब तुम ऐसे जानोगे, तब तुमको कोई दुःख स्पर्श न करेगा। जैसे स्वप्न की सृष्टि में अपने स्वरूप की स्मृति आने से दुःख भी सुख होता है और बोलना-चालना, खाना, पीना, देना, लेना आदि शब्द और अर्थ और द्वैतरूप युद्ध-कर्म सब अद्वैत अपने आप हो जाते हैं, और जीव व्यवहार भी सब करता है, परन्तु उसके अपने निश्चय में कुछ नहीं फुरता, वैसे ही जो पुरुष अपने स्वरूप में जागे हैं; उनको सब जगत् आत्मरूप ही दिखता है। जैसे अग्नि में उष्णता और बर्फ में शीतलता स्वाभाविक है, वैसे

८१६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि भी स्वाभाविक है । और लोगों को यह दृष्टि यत्न से प्राप्त होती है, पर ज्ञानवान् को स्वाभाविक होती है । जिसको तुम इच्छा कहते हो, वह ज्ञानवान् को सब भ्रमरूप है और अनिच्छा भी ब्रह्मरूप भासित होती है । ज्ञानवान् को आत्मानन्द प्राप्त हुआ है । वह अपने स्वभाव में सदा स्थित है, इससे उसको कोई कल्पना नहीं उठती और वह विद्यमान निवारण दृष्टि लेकर स्थित होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्वैतैकताऽभाववर्णनं नाम द्विशताधिकपञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे स्वप्न में जो पृथ्वी आदि पदार्थ दिखते हैं, वे अविद्यमान हैं-कुछ हैं नहीं, वैसे ही पितामह आदि ब्रह्मा को भी आकाशरूप जानो । वह भी कुछ हैं नहीं, अर्थात् आत्मसत्ता से भिन्न हुए नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले स्वाभाविक हैं, और तरङ्ग शब्द कहना भी उनको नहीं बनता, वे तो जलरूप हैं, वैसे ही जिनको तुम ब्रह्माजी कहते हो, वह और कोई नहीं, आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है । ब्रह्माजी ही विराट् हैं । जैसे पत्ते, फूल, फल और डाल वृक्ष के अङ्ग हैं, वैसे ही सब भूत उस विराट् के अङ्ग हैं । जब (विराट्) ब्रह्मा ही आकाशरूप हैं, तब उनके अङ्ग जगत् की वार्ता क्या कहिये ? हे राम ! विराट् के न प्राण है, न आकार है, न इन्द्रियाँ हैं, न मन है, न बुद्धि है और न इच्छा है । केवल अद्वैत चिन्मात्र-सत्ता अपने आपमें स्थित है । जब विराट् ही नहीं, तब जगत् कैसे हो ? जो तुम कहो कि आकाशरूप के अंग कैसे दिखते हैं, तो हे राम ! जैसे स्वप्न में बड़े पहाड़ प्रत्यक्ष दिखते हैं, परन्तु कुछ बने नहीं, आकाशरूप हैं, वैसे ही आदि-विराट् भी कुछ बना नहीं, आकाशरूप है । तब उसके अङ्ग में आकाररूप कैसे कहूँ ? सब आकार संकल्पपुर की नाईं कल्पित हैं । एक आत्मसत्ता ही सर्वदा ज्यों की त्यों स्थित है । उसमें स्मृति और अनुभव क्या कहिये ? अनुभव और स्मृति भी उसी का आभास है । जैसे समुद्र में तरङ्ग आभास होते हैं, वैसे ही आत्मा में अनुभव और स्मृति भी आभास है । स्मृति भी उसकी होती है,

✺ निर्वाण प्रकरण ✺ =१७

जिसका प्रथम अनुभव होता है। सो अनुभव भी जगत् में होता है। पर जहाँ जगत् ही न उपजा हो तो अनुभव और स्मृति उसको कैसे हो?

इसलिए न अनुभव है और न स्मृति है। इस कल्पना को त्याग दो। जहाँ पृथ्वी होती है, वहाँ धूल भी होती है। पर जहाँ पृथ्वी से रहित आकाश ही हो, वहाँ धूल कैसे उड़े? इसी प्रकार जहाँ पदार्थ होते हैं, वहाँ स्मृति और अनुभव भी होता है, और जहाँ पदार्थ ही नहीं तो स्मृति और अनुभव कैसे हो? इससे दोनों का अभाव है। राम ने पूछा, हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ? स्मृति का अनुभव तो प्रत्यक्ष होता है। प्रथम पदार्थ का अनुभव होता है, पीछे उसकी स्मृति होती है और उस स्मृतिसंस्कार से फिर अनुभव होता है। तब ऐसे ही ब्रह्मादिक का क्यों नहीं होता? ये तो प्रत्यक्ष भासित होते हैं? तुम कैसे इनका अभाव कहते हो? और अभाव में विशेषता क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! स्मृति से अनुभव वहाँ होता है, जहाँ कार्य-कारण भाव होता है। ब्रह्मा से लेकर काष्ठपर्यन्त सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह सब आकाशरूप है। कुछ बना नहीं और अविद्यमान ही भ्रम से विद्यमान प्रतीत होता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल का आभास अविद्यमान है, पर भ्रम से जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है। स्मृति उसकी होती है, जिस पदार्थ का प्रथम अनुभव होता है। जो कहिये कि ब्रह्मादिक स्मृति संस्कार से उपजी है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि प्रथम तो ज्ञानवान् स्मृति से नहीं होती, तब उनका स्मृति कारण कैसे कहिये? और दूसरे यह कि इस जगत् के आदि में कोई जगत् न था, जिसकी स्मृति मानिये। इस जगत् के आदि में केवल अद्वितीय आत्मसत्ता थी। उसमें स्मृति क्या और अनुभव क्या? इसलिए ब्रह्मादिक और जगत् किसी कारण-कार्यभाव से नहीं उपजे। अकारण हैं।

हे राम! प्रथम तो तुम यह देखो कि ज्ञानी को जगत् नहीं भासित होता, तब स्मृति किसको कहिये? उसको तो केवल ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है। जैसे सूर्य को रात्रि की स्मृति नहीं होती, वैसे ही ज्ञानी को जगत् की स्मृति नहीं होती। मेरे निश्चय में तो यह है कि

=८१८= ☸ योगवाशिष्ठ ☸

जगत् न हुआ है और न आगे होगा, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में स्थित है। वह अद्वैत है, और उसी का सब आभास है। जो आभास को सत्य जानते हो तो स्मृति को भी सत्य जानो। और जो आभास को असत्य जानते हो, तो स्मृति को भी असत्य जानो। जैसे स्वप्न में सृष्टि का आभास होता है। और उसमें अनुभव और स्मृति होती है, पर जागने से सृष्टि के अनुभव और स्मृति का अभाव हो जाता है, वैसे ही अद्वैत परमात्मसत्ता के जाग्रत् में अनुभव और स्मृति का अभाव है। उसमें जगत् कुछ बना नहीं। जैसे कोई पुरुष मरुस्थल में भ्रम से नदी देखता है, और उसे सत्य जानकर उसकी स्मृति करता है, पर वह नदी तो कुछ नहीं है। जब नदी ही असत्य है तो उसकी स्मृति कैसे सत्य हो, वैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जो जगत् भासित हुआ है, वह जगत् ही जब असत्य है तो उसकी स्मृति और अनुभव कैसे हो? ज्ञानवान् के निश्चय में ऐसे ही भासित होता है।

हे राम! स्मृति पदार्थ की होती है। पर पदार्थ कोई नहीं, सब ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है। और जैसा-जैसा उनमें फुरना होता है, वैसे ही होकर वे भासित होते हैं। परन्तु और कुछ वस्तु नहीं। जैसे वायु चलता भी है और ठहरता भी है, पर चलने और ठहरने में वायु को कुछ भेद नहीं, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् के फुरने या न फुरने में ब्रह्मसत्ता अभेद भासती है और कारण-कार्य नहीं भासित होता है। जैसे पत्ते, टहनी, फूल और फल, सब वृक्ष के अंग हैं, वैसे ही जगत् आत्मा के अंग हैं। आत्मा में प्रकट होते हैं और फिर आत्मा में ही लीन भी हो जाते हैं। भिन्न कुछ नहीं। जब चित्त में स्वभाव जगता है, तब जगत् होकर भासित होता है। कुछ आरम्भ और परिणाम से नहीं होता—आभासमात्र है।

जैसे घट-पट आदि आत्मा का आभास है, वैसे ही स्मृति भी आभास है। स्मृति भी जगत् में उदय हुई है। जब जगत् ही असत्य है तो स्मृति कैसे सत्य हो? जो यथार्थदर्शी हैं, उनको सब ब्रह्मरूप दिखता है। मुझको न कुछ मोक्ष का उपाय दिखता है और न इसका कोई अधिकारी दिखता है। मेरे निश्चय में अद्वैत ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है।

*** निर्वाण प्रकरण *** ८१६

जैसे नट स्वाँग भरता है, पर सब स्वाँगों को आभासमात्र जानता है, किसी को सत्य नहीं जानता, पर उससे भिन्न कुछ होता नहीं, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते । जिस प्रकार उसके लिए जगत् शब्द है, उसके उस निश्चय को कोई नहीं जानता । मेरे निश्चय में सब चिन्मात्र है । अज्ञानी को जगत् द्वैतरूप दिखता है और उसे विपर्यय भावना होती है और ज्ञानवान् को चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं भासित होती । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने अनुभव में स्थित होती है और सबका अधिष्ठान अनुभवसत्ता है, परन्तु निद्रादोष से भिन्न-भिन्न भासित होती है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् भिन्न-भिन्न लगता है । पर जो जागे हुए ज्ञानवान् हैं, उनको भिन्न कुछ नहीं भासित होता । उनको न अविद्या, न मूर्खता और न मोह भासित होता है । उन्हें सब अपना रूप ब्रह्म-स्वरूप ही दिखता है । जहाँ कुछ दूसरी वस्तु नहीं बनी, वहाँ स्मृति और अनुभव किसका कहिये ? यह सभी कलना मिथ्या है ।

हे राम ! सब अर्थों का जो अर्थभूत है, सो ब्रह्म है । उसी में सब पदार्थ कल्पित हैं । स्मृति और अनुभव मन में होता है । वह मन आत्मा में ऐसे है, जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है । तो उसमें स्मृति और अनुभव क्या कहिये ? सब कल्पित है । पृथ्वी आदिक तत्त्व आत्मा में कुछ बने नहीं । ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है—ज्ञानवान् को सदा ऐसे ही भासित होता है । आभास भी आत्मा में आभास है और कारण-कार्य भाव कभी नहीं भासित होता । जैसे सूर्य को अन्धकार कभी नहीं दिखता, वैसे ही ज्ञानवान् को कारण-कार्यभाव नहीं दिखाई देता । जैसे स्वप्न के आदि में अद्वैतसत्ता होती है और उसमें अकारण स्वप्न की सृष्टि जग जाती है, वैसे ही अद्वैतसत्ता में अकारण आदि सृष्टि प्रकट हुई है । न पृथ्वी है और न कोई दूसरा पदार्थ है, सब चिदाकाशरूप है, और कुछ बना नहीं तो आभासमात्र जगत् में स्मृति की कल्पना कैसे हो ?

इति नि० वर्शननामद्विशताधिकषट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५६ ॥

८२० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिसमें सब अनुभव होता है, उसके देह में अहंप्रत्यय किस प्रकार होता है? वह तो सर्वात्मा है। उस सर्वात्मा को एक देह में अहंप्रत्यय क्योंकर होता है, और काष्ठ, पाषाण, पर्वत और चेतनता का अनुभव किस प्रकार हो गया है? वह तो अद्भुत स्वरूप है। उसमें जड़ और चैतन्य, ये दोनों भेद कैसे हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे शरीर में हाथ आदि अपने अङ्ग हैं और उन सब अंगों में एक शरीर का भाव व्यापा हुआ है, पर जो उन अंगों में एक अङ्ग को पकड़कर कहे कौन है, सब प्राणी उसका नाम कहता है; तो तुम देखो कि उस एक अङ्ग को भिन्न कहा, परन्तु सब अंगों में उसकी आत्मा का तो नाश नहीं हो जाता है; वैसे ही आत्मा अनुभवरूप है तो भी एक अंग में उसकी आत्मता होते हुए सर्वात्मता खण्डित नहीं हो जाती। जैसे पत्ते, फूल, फल और टहनी आदि सब अंगों में एक ही वृक्ष व्यापा हुआ है परन्तु जो एक टहनी अथवा पत्ते को पकड़कर कहता है कि यह वृक्ष है, तो उसके एक अंग में वृक्षभावना कहने से वृक्ष का सर्वात्मभाव नष्ट नहीं होता; वैसे ही सर्वात्मा का एक देह में अहंभाव सिद्ध होता है। जड़ और चैतन्य, दोनों भाव एक ही ने धारण किये हैं और एक ही के दोनों स्वरूप हैं।

जैसे एक ही शरीर में दोनों सिद्ध होते हैं, तथा हाथ, पाँव आदि जड़ हैं और नेत्र इसके द्रष्टा चेतन हैं, सो एक ही शरीर दोनों हैं और दोनों एक ही शरीर के स्वरूप हैं, वैसे ही एक आत्मा ने दोनों धारण किये हैं और एक ही के स्वरूप हैं। जैसे वृक्ष अपने अंग को रखता है और वृक्ष स्वभाव को भी रखता है, वैसे ही सर्वात्मा सबको धारण करता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि को अनुभव ही धारण करता है और सब क्रियाओं को भी धारण करता है, वैसे ही आत्मसत्ता सब जगत् और जगत् की सब क्रिया को धारण करती है, क्योंकि वह सर्वात्मा है और जो सर्वात्मा है वह क्यों न धारण करे? जैसे एक ही समुद्र में अनेक तरंग उठते हैं, परन्तु सभी समुद्र के आश्रित हैं और वही रूप हैं, वैसे ही सब जीव परमात्मा में प्रकट होते हैं। परमात्मा के आश्रित

⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙ <span style="float:right;">८२१</span>

हैं और वही रूप हैं। जैसे तरंग अपने को जाने कि मैं जल ही हूँ तो उसकी तरंग संज्ञा जाती रहती है, जलरूप ही दिखता है, वैसे ही जीव जब परमात्मा से अपने को अभिन्न जाने, जाने कि 'मैं आत्मा ही हूँ' तब उसके जीवत्वभाव का अभाव हो जाता है, परमात्मा ही दिखता है।

हे राम! जैसे जल में द्रवता से तरङ्ग उठते हैं, परन्तु तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन से आदि-ब्रह्मा उपजे हैं और उन्होंने इस जगत् की मनोराज्य से कल्पना की है। वह आकाशरूप निराकार है, और कुछ बना नहीं। जो विराट् ही आकाश-रूप हुआ तो उसका शरीर कैसे साकार हो। वह भी निराकार है जैसे अपना अनुभव स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, जड़ और चैतन्य होकर दिखता है, वैसे ही सब जगत् जो दिखता है, वह भी आत्मरूप है। हे राम! जैसे एक निद्रा के दो स्वरूप हैं—स्वप्न और सुषुप्ति, वैसे ही एक ही आत्मा ने जड़ और चैतन्य, दो स्वरूप धारण किये हैं। जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, यह आभासरूप हैं, और आत्मसत्ता ही अपने किञ्चन द्वारा जगत्रूप होकर दिखाई देती है। जैसे आकाश में घन शून्यता के कारण नीलता दिखती है, सो वह अविचारसिद्ध है-नीलता कुछ बनी नहीं, वैसे ही आत्मा में घन चैतन्यता से जगत् दिखता है, परन्तु जगत् का आकार कुछ बना नहीं, सर्वदा आत्मा अद्वैत निराकार है।

अनन्त सृष्टि आत्मा में आभासरूप उपज कर लीन हो जाती है, और आत्मा ज्यों का त्यों है। जैसे समुद्र में तरंग उपजकर लीन हो जाते हैं, परन्तु जलरूप हैं, वैसे ही परब्रह्म में सृष्टि परब्रह्मरूप है। हे राम! यह जगत् विराट् का शरीर है। महाकाश उसका शीश है। दसों दिशा उसकी भुजा हैं। पृथ्वी उसके चरण हैं। पातालरूप तली हैं। मध्यलोक अन्तरिक्ष उदर है। सब जीव उसकी रोमावली हैं और सब पदार्थ विराट् के अंग हैं। वह विराट् आकाशरूप है। जैसे विराट् ब्रह्माजी आकाशरूप हैं, वैसे ही उनका जगत् भी आकाशरूप है। इससे सब जगत् विराटरूप है। वह ब्रह्म ही है, और कुछ बना नहीं। चन्द्रमा

८२२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

और सूर्य उसके नेत्र हैं। सुभासे और तुषसे लेकर सब शब्दों का अधि- ष्ठान ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म में हूँ। जिसमें दूसरा बना नहीं, सदा में अपने ही आपमें स्थित हूँ। हे राम! शून्यवादी पांचरात्रिक, शैव, शक्ति आदि जो शास्त्र हैं, उन सबका अधिष्ठान ब्रह्मरूप है, और सबका सार- रूप वही सर्वात्मरूप है। जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही उसको वह सर्वरूप होकर फल देता है और कुछ बना नहीं। इति श्रीनि० ब्रह्मजगदेकता नामद्विशताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥५७॥

वशिष्टजी बोले, हे राम! इस जगत् के आदि में शुद्ध ब्रह्मसत्ता थी। उसमें जो जगत् का आभास फुरा है, उसको भी तुम वही स्वरूप जानो। जैसे स्वप्न में आदि-अनुभव आकाश होता है, और उसमें स्वप्न की सृष्टि प्रकट होती है, सो वह अनुभवरूप है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, भिन्न नहीं। जैसे समुद्र द्रवता से तरंगरूप होकर दिखता है, वैसे ही चैतन्य ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। सो यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! वास्तव में कोई दुःख नहीं है। दुःख और सुख अज्ञान से प्रतीत होते हैं। जैसे एक निद्रा में दो वृत्तियाँ दिखती हैं—एक स्वप्नावृत्ति और दूसरी सुषुप्तिवृत्ति; वैसे ही अज्ञानी की दो वृत्तियाँ होती हैं—सुख की और दुःख की। किन्तु ज्ञानवान् ब्रह्मरूप है। जैसे कोई पुरुष स्वप्न से जाग उठता है तो उसको स्वप्न की सृष्टि असत्यरूप दिखती है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह सृष्टि असत्य दिखती है। जैसे जिसने मरुस्थल को नदी के जल का अत्यन्ताभाव जाना है, वह जल- पान की इच्छा नहीं करता, वैसे ही सम्यक्दर्शी पुरुष जगत् को असत्य जानता है, इसलिए वह जगत् के पदार्थों की इच्छा भी नहीं करता। जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको जगत् सत्य प्रतीत होता है और वे किसी पदार्थ को ग्रहण करते हैं और किसी का त्याग करते हैं।

हे राम! परमात्मा ईश्वर है। उसमें जगत् इसी प्रकार है, जैसे समुद्र में तरंग होते हैं। जैसे समुद्र और तरंग में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जो तुम कहो कि अविद्या ही जगत् का कारण है तो अविद्या जगत् का कारण तब कहलाती, जब वह जगत् से प्रथम

⚙️ निर्वाण प्रकरण ८२३

सिद्ध होती है, पर अविद्या तो अविद्यमान है । जैसे परमात्मा में जगत् आभासमात्र है, वैसे ही अविद्या भी आभासमात्र है । जो आप ही आभासमात्र हो, उसे जगत् का कारण कैसे कहिये ? जगत् आभास और अविद्या का आभास इकट्ठा ही जगा है । जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसमें घट-घटादि पदार्थ दिखते हैं । वे किसी कुम्हार ने मृत्तिका लेकर तो नहीं बनाये । जैसे घट उपजा है, वैसे ही कुम्हार और मृत्तिका भी उपजे हैं । जैसे इन सबका भासित होना इकट्ठा ही होता है, वैसे ही जगत् और अविद्या एक साथ ही उपजे हैं । अविद्या पहले तो सिद्ध नहीं होती, तब उसको जगत् का कारण कैसे मानिये ? हे राम ! परमात्मा से जगत् और अविद्या एक साथ ही आभासमात्र उपजे हैं, पर वह आभास कुछ वस्तु नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । न कहीं अविद्या है, न जगत् है । आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों स्थित है । हे राम ! निर्विकल्प में जगत् का अत्यन्ता-भाव होता है, तब निर्विकल्प कैसे हो ? जब निर्विकल्प होता है, तब जड़ता आती है और जब विकल्प उठता है, तब संसार उदय होता है । जब ध्यान लगाता है, तब ध्याता, ध्यान और ध्येय त्रिपुटी हो जाती है । इस प्रकार तो निर्विकल्पता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि निर्विकल्प से भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । निर्विकल्प वह है, जहाँ चित्त की वृत्ति न स्फुरे । पर तब भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि वहाँ भी अभाव वृत्ति सुषुप्ति सी रहती है । सुषुप्तरूप जड़ात्मक है । सविकल्प सुषुप्ति में भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए सम्यक् बोध का नाम निर्विकल्प है ।

जिसको सम्यकबोध निर्विकल्पता से जगत् का अत्यन्ताभाव हुआ है, वह जीवन्मुक्त है । वही निर्विकल्प पद कहलाता है और वही परम जड़ता है, जहाँ जगत् का होना असम्भव है । हे राम ! निर्विकल्प और सविकल्प स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि ये दोनों मन की वृत्तियाँ हैं । जैसे एक निद्रा की वृत्ति स्वप्न और सुषुप्तिरूप है, वैसे ही यह निर्विकल्प और सविकल्प मन की वृत्ति है । निर्विकल्प सुषुप्तिरूप और

८२४ योगवाशिष्ट

पत्थर सदृश है और सविकल्प स्वप्नसदृश चञ्चलरूप है। निर्विकल्प में भी अभाववृत्ति रहती है, इससे उससे भी मुक्ति नहीं होती। मुक्ति तब होती है, जब दृश्य का अत्यन्ताभाव होता है। हे राम! जहाँ आत्म-अनुभव में आकाश से इतर उत्थान नहीं होता—उसका नाम अत्यन्त सुषुप्ति निर्विकल्पता है। हे राम! ऐसे होकर तुम चेष्टा करोगे, तो भी तुमको कर्तृत्व और भोक्तृत्व का अभिमान न होगा। आत्मा को अद्वैत और जगत का अत्यन्ताभाव जानने ही का नाम बोध है। जब बोध और ध्यान की दृढ़ता हो, उसका नाम परमपद है। उसी का नाम निर्वाण है और उसी को मोक्ष भी कहते हैं। जो पद किञ्चन और अकिञ्चन है और सर्वदा अपने आपमें स्थित है, उसमें न नानात्व कहना है, न अनाना शब्द है। न सविकल्प है, न निर्विकल्प है। वह न सत्य है, न असत्य है। न एक है और न दो। उसमें सब शब्दों का अन्त है और किसी शब्द से वाणी प्रवृत्त नहीं होती। उसी सत्ता को प्राप्त होने का उपाय में कहता हूँ।

हे राम! यह मोक्ष का उपाय ग्रन्थ जो मैंने तुमसे कहा है, इसको विचारना। जो पुरुष अर्धप्रबुद्ध और पदपदार्थ जाननेवाला है, उसको यदि मोक्ष की इच्छा है तो वह इस ग्रन्थ को विचारता है, शुभ आचार करके बुद्धि को निर्मल करता है और अशुभ क्रिया का त्याग करता है। तब उसको शीघ्र आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे राम! जो मोक्ष का उपाय शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है, वह तीर्थ-स्नान, तप और दान से नहीं प्राप्त होता। तप, दानादिक करके स्वर्ग प्राप्त होता है, मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षपद अध्यात्मशास्त्र के अर्थ के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। यह जगत आभासमात्र है। वही ब्रह्मसत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। जैसे जल ही तरङ्गरूप होकर दिखता है और वायु ही स्पन्दन-रूप है, वैसे ही ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। जैसे स्पन्दन और निष्स्पन्द में वायु ज्यों की त्यों है, परन्तु स्पन्दन होता है, तब भासित होती है, और निष्स्पन्द होती है तब नहीं भासित होती, वैसे ही ब्रह्म में संवेदन फुरता है तब जगत होकर भासित होता है और जब निर्वेदन