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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1623, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1623

८२० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिसमें सब अनुभव होता है, उसके देह में अहंप्रत्यय किस प्रकार होता है? वह तो सर्वात्मा है। उस सर्वात्मा को एक देह में अहंप्रत्यय क्योंकर होता है, और काष्ठ, पाषाण, पर्वत और चेतनता का अनुभव किस प्रकार हो गया है? वह तो अद्भुत स्वरूप है। उसमें जड़ और चैतन्य, ये दोनों भेद कैसे हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे शरीर में हाथ आदि अपने अङ्ग हैं और उन सब अंगों में एक शरीर का भाव व्यापा हुआ है, पर जो उन अंगों में एक अङ्ग को पकड़कर कहे कौन है, सब प्राणी उसका नाम कहता है; तो तुम देखो कि उस एक अङ्ग को भिन्न कहा, परन्तु सब अंगों में उसकी आत्मा का तो नाश नहीं हो जाता है; वैसे ही आत्मा अनुभवरूप है तो भी एक अंग में उसकी आत्मता होते हुए सर्वात्मता खण्डित नहीं हो जाती। जैसे पत्ते, फूल, फल और टहनी आदि सब अंगों में एक ही वृक्ष व्यापा हुआ है परन्तु जो एक टहनी अथवा पत्ते को पकड़कर कहता है कि यह वृक्ष है, तो उसके एक अंग में वृक्षभावना कहने से वृक्ष का सर्वात्मभाव नष्ट नहीं होता; वैसे ही सर्वात्मा का एक देह में अहंभाव सिद्ध होता है। जड़ और चैतन्य, दोनों भाव एक ही ने धारण किये हैं और एक ही के दोनों स्वरूप हैं।

जैसे एक ही शरीर में दोनों सिद्ध होते हैं, तथा हाथ, पाँव आदि जड़ हैं और नेत्र इसके द्रष्टा चेतन हैं, सो एक ही शरीर दोनों हैं और दोनों एक ही शरीर के स्वरूप हैं, वैसे ही एक आत्मा ने दोनों धारण किये हैं और एक ही के स्वरूप हैं। जैसे वृक्ष अपने अंग को रखता है और वृक्ष स्वभाव को भी रखता है, वैसे ही सर्वात्मा सबको धारण करता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि को अनुभव ही धारण करता है और सब क्रियाओं को भी धारण करता है, वैसे ही आत्मसत्ता सब जगत् और जगत् की सब क्रिया को धारण करती है, क्योंकि वह सर्वात्मा है और जो सर्वात्मा है वह क्यों न धारण करे? जैसे एक ही समुद्र में अनेक तरंग उठते हैं, परन्तु सभी समुद्र के आश्रित हैं और वही रूप हैं, वैसे ही सब जीव परमात्मा में प्रकट होते हैं। परमात्मा के आश्रित