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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1624, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1624

⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙ <span style="float:right;">८२१</span>

हैं और वही रूप हैं। जैसे तरंग अपने को जाने कि मैं जल ही हूँ तो उसकी तरंग संज्ञा जाती रहती है, जलरूप ही दिखता है, वैसे ही जीव जब परमात्मा से अपने को अभिन्न जाने, जाने कि 'मैं आत्मा ही हूँ' तब उसके जीवत्वभाव का अभाव हो जाता है, परमात्मा ही दिखता है।

हे राम! जैसे जल में द्रवता से तरङ्ग उठते हैं, परन्तु तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में संवेदन से आदि-ब्रह्मा उपजे हैं और उन्होंने इस जगत् की मनोराज्य से कल्पना की है। वह आकाशरूप निराकार है, और कुछ बना नहीं। जो विराट् ही आकाश-रूप हुआ तो उसका शरीर कैसे साकार हो। वह भी निराकार है जैसे अपना अनुभव स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, जड़ और चैतन्य होकर दिखता है, वैसे ही सब जगत् जो दिखता है, वह भी आत्मरूप है। हे राम! जैसे एक निद्रा के दो स्वरूप हैं—स्वप्न और सुषुप्ति, वैसे ही एक ही आत्मा ने जड़ और चैतन्य, दो स्वरूप धारण किये हैं। जगत् आत्मा में कुछ बना नहीं, यह आभासरूप हैं, और आत्मसत्ता ही अपने किञ्चन द्वारा जगत्रूप होकर दिखाई देती है। जैसे आकाश में घन शून्यता के कारण नीलता दिखती है, सो वह अविचारसिद्ध है-नीलता कुछ बनी नहीं, वैसे ही आत्मा में घन चैतन्यता से जगत् दिखता है, परन्तु जगत् का आकार कुछ बना नहीं, सर्वदा आत्मा अद्वैत निराकार है।

अनन्त सृष्टि आत्मा में आभासरूप उपज कर लीन हो जाती है, और आत्मा ज्यों का त्यों है। जैसे समुद्र में तरंग उपजकर लीन हो जाते हैं, परन्तु जलरूप हैं, वैसे ही परब्रह्म में सृष्टि परब्रह्मरूप है। हे राम! यह जगत् विराट् का शरीर है। महाकाश उसका शीश है। दसों दिशा उसकी भुजा हैं। पृथ्वी उसके चरण हैं। पातालरूप तली हैं। मध्यलोक अन्तरिक्ष उदर है। सब जीव उसकी रोमावली हैं और सब पदार्थ विराट् के अंग हैं। वह विराट् आकाशरूप है। जैसे विराट् ब्रह्माजी आकाशरूप हैं, वैसे ही उनका जगत् भी आकाशरूप है। इससे सब जगत् विराटरूप है। वह ब्रह्म ही है, और कुछ बना नहीं। चन्द्रमा