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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1625, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1625

८२२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

और सूर्य उसके नेत्र हैं। सुभासे और तुषसे लेकर सब शब्दों का अधि- ष्ठान ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म में हूँ। जिसमें दूसरा बना नहीं, सदा में अपने ही आपमें स्थित हूँ। हे राम! शून्यवादी पांचरात्रिक, शैव, शक्ति आदि जो शास्त्र हैं, उन सबका अधिष्ठान ब्रह्मरूप है, और सबका सार- रूप वही सर्वात्मरूप है। जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही उसको वह सर्वरूप होकर फल देता है और कुछ बना नहीं। इति श्रीनि० ब्रह्मजगदेकता नामद्विशताधिकसप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥५७॥

वशिष्टजी बोले, हे राम! इस जगत् के आदि में शुद्ध ब्रह्मसत्ता थी। उसमें जो जगत् का आभास फुरा है, उसको भी तुम वही स्वरूप जानो। जैसे स्वप्न में आदि-अनुभव आकाश होता है, और उसमें स्वप्न की सृष्टि प्रकट होती है, सो वह अनुभवरूप है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है, भिन्न नहीं। जैसे समुद्र द्रवता से तरंगरूप होकर दिखता है, वैसे ही चैतन्य ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। सो यह जगत् भी वही रूप है। हे राम! वास्तव में कोई दुःख नहीं है। दुःख और सुख अज्ञान से प्रतीत होते हैं। जैसे एक निद्रा में दो वृत्तियाँ दिखती हैं—एक स्वप्नावृत्ति और दूसरी सुषुप्तिवृत्ति; वैसे ही अज्ञानी की दो वृत्तियाँ होती हैं—सुख की और दुःख की। किन्तु ज्ञानवान् ब्रह्मरूप है। जैसे कोई पुरुष स्वप्न से जाग उठता है तो उसको स्वप्न की सृष्टि असत्यरूप दिखती है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह सृष्टि असत्य दिखती है। जैसे जिसने मरुस्थल को नदी के जल का अत्यन्ताभाव जाना है, वह जल- पान की इच्छा नहीं करता, वैसे ही सम्यक्दर्शी पुरुष जगत् को असत्य जानता है, इसलिए वह जगत् के पदार्थों की इच्छा भी नहीं करता। जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको जगत् सत्य प्रतीत होता है और वे किसी पदार्थ को ग्रहण करते हैं और किसी का त्याग करते हैं।

हे राम! परमात्मा ईश्वर है। उसमें जगत् इसी प्रकार है, जैसे समुद्र में तरंग होते हैं। जैसे समुद्र और तरंग में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जो तुम कहो कि अविद्या ही जगत् का कारण है तो अविद्या जगत् का कारण तब कहलाती, जब वह जगत् से प्रथम