योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1626, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚙️ निर्वाण प्रकरण ८२३
सिद्ध होती है, पर अविद्या तो अविद्यमान है । जैसे परमात्मा में जगत् आभासमात्र है, वैसे ही अविद्या भी आभासमात्र है । जो आप ही आभासमात्र हो, उसे जगत् का कारण कैसे कहिये ? जगत् आभास और अविद्या का आभास इकट्ठा ही जगा है । जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसमें घट-घटादि पदार्थ दिखते हैं । वे किसी कुम्हार ने मृत्तिका लेकर तो नहीं बनाये । जैसे घट उपजा है, वैसे ही कुम्हार और मृत्तिका भी उपजे हैं । जैसे इन सबका भासित होना इकट्ठा ही होता है, वैसे ही जगत् और अविद्या एक साथ ही उपजे हैं । अविद्या पहले तो सिद्ध नहीं होती, तब उसको जगत् का कारण कैसे मानिये ? हे राम ! परमात्मा से जगत् और अविद्या एक साथ ही आभासमात्र उपजे हैं, पर वह आभास कुछ वस्तु नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । न कहीं अविद्या है, न जगत् है । आत्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों स्थित है । हे राम ! निर्विकल्प में जगत् का अत्यन्ता-भाव होता है, तब निर्विकल्प कैसे हो ? जब निर्विकल्प होता है, तब जड़ता आती है और जब विकल्प उठता है, तब संसार उदय होता है । जब ध्यान लगाता है, तब ध्याता, ध्यान और ध्येय त्रिपुटी हो जाती है । इस प्रकार तो निर्विकल्पता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि निर्विकल्प से भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । निर्विकल्प वह है, जहाँ चित्त की वृत्ति न स्फुरे । पर तब भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि वहाँ भी अभाव वृत्ति सुषुप्ति सी रहती है । सुषुप्तरूप जड़ात्मक है । सविकल्प सुषुप्ति में भी स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, इसलिए सम्यक् बोध का नाम निर्विकल्प है ।
जिसको सम्यकबोध निर्विकल्पता से जगत् का अत्यन्ताभाव हुआ है, वह जीवन्मुक्त है । वही निर्विकल्प पद कहलाता है और वही परम जड़ता है, जहाँ जगत् का होना असम्भव है । हे राम ! निर्विकल्प और सविकल्प स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि ये दोनों मन की वृत्तियाँ हैं । जैसे एक निद्रा की वृत्ति स्वप्न और सुषुप्तिरूप है, वैसे ही यह निर्विकल्प और सविकल्प मन की वृत्ति है । निर्विकल्प सुषुप्तिरूप और