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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1627, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1627

८२४ योगवाशिष्ट

पत्थर सदृश है और सविकल्प स्वप्नसदृश चञ्चलरूप है। निर्विकल्प में भी अभाववृत्ति रहती है, इससे उससे भी मुक्ति नहीं होती। मुक्ति तब होती है, जब दृश्य का अत्यन्ताभाव होता है। हे राम! जहाँ आत्म-अनुभव में आकाश से इतर उत्थान नहीं होता—उसका नाम अत्यन्त सुषुप्ति निर्विकल्पता है। हे राम! ऐसे होकर तुम चेष्टा करोगे, तो भी तुमको कर्तृत्व और भोक्तृत्व का अभिमान न होगा। आत्मा को अद्वैत और जगत का अत्यन्ताभाव जानने ही का नाम बोध है। जब बोध और ध्यान की दृढ़ता हो, उसका नाम परमपद है। उसी का नाम निर्वाण है और उसी को मोक्ष भी कहते हैं। जो पद किञ्चन और अकिञ्चन है और सर्वदा अपने आपमें स्थित है, उसमें न नानात्व कहना है, न अनाना शब्द है। न सविकल्प है, न निर्विकल्प है। वह न सत्य है, न असत्य है। न एक है और न दो। उसमें सब शब्दों का अन्त है और किसी शब्द से वाणी प्रवृत्त नहीं होती। उसी सत्ता को प्राप्त होने का उपाय में कहता हूँ।

हे राम! यह मोक्ष का उपाय ग्रन्थ जो मैंने तुमसे कहा है, इसको विचारना। जो पुरुष अर्धप्रबुद्ध और पदपदार्थ जाननेवाला है, उसको यदि मोक्ष की इच्छा है तो वह इस ग्रन्थ को विचारता है, शुभ आचार करके बुद्धि को निर्मल करता है और अशुभ क्रिया का त्याग करता है। तब उसको शीघ्र आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे राम! जो मोक्ष का उपाय शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है, वह तीर्थ-स्नान, तप और दान से नहीं प्राप्त होता। तप, दानादिक करके स्वर्ग प्राप्त होता है, मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षपद अध्यात्मशास्त्र के अर्थ के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। यह जगत आभासमात्र है। वही ब्रह्मसत्ता जगतरूप होकर भासित होती है। जैसे जल ही तरङ्गरूप होकर दिखता है और वायु ही स्पन्दन-रूप है, वैसे ही ब्रह्म जगतरूप होकर भासित होता है। जैसे स्पन्दन और निष्स्पन्द में वायु ज्यों की त्यों है, परन्तु स्पन्दन होता है, तब भासित होती है, और निष्स्पन्द होती है तब नहीं भासित होती, वैसे ही ब्रह्म में संवेदन फुरता है तब जगत होकर भासित होता है और जब निर्वेदन