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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1628, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1628

* निर्वाण प्रकरण * ८२५

होता है और अन्तर्मुख अधिष्ठान की ओर आता है, तब जगत् समेटा जाता है। परन्तु संवेदन के फुरने में भी वही है और न फुरने में भी वही है।

इसलिए हे राम ! सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है । ब्रह्म से इतर कुछ नहीं बना । और जो इतर भासित होता है उसे भ्रममात्र ही जानना । जब आत्मपद का अभ्यास होता है, तब भ्रान्ति शान्त हो जाती है । जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के अभ्यास से भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है । यद्यपि नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है, परन्तु कुछ हुई नहीं । जैसे स्वप्न में सृष्टि दिखती है, परन्तु कुछ बनी नहीं, वही अनुभवरूप आत्मसत्ता सृष्टि आकार होकर दिखती है, वैसे ही यह जगत् सब अनुभवरूप है । जैसे रत्न और रत्न की चमक में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राम ! तुम निश्चय करके स्वभाव को देखो, तो भ्रम मिट जावेगा । सृष्टि, स्थिति और प्रलय, सब उसी की संज्ञा है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मगीतापरमनिर्वाणवर्णन-
नाम द्विशताधिकाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ? ये सब आकार जो तुमको दिखते हैं, संवेदनरूप हैं, कुछ बने नहीं । सृष्टि के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी वही रहती है और मध्य में जो आकार दिखते हैं, उन्हें भी वही रूप जानो । जैसे स्वप्न की सृष्टि के आदि में जो शुद्ध संवित् होती है और उसमें आकार प्रकट होता है, वह भी अनुभवरूप है, और कुछ नहीं बना, आत्मसत्ता ही पिण्डाकार होकर भासित होती है, और जितने पदार्थ दिखते हैं, सो आकाशरूप आभासमात्र हैं । आत्मसत्ता सदा शुद्ध है, परन्तु अज्ञान से अशुद्ध की नाईं लगती है; विकार से रहित है, परन्तु विकारसहित लगती है; अनाना है परन्तु नाना की नाईं दिखती है और आकार से रहित है परन्तु आकार-सहित प्रतीत होती, जैसे स्वप्न की सृष्टि अपना अनुभवरूप होती है, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न भासित होती है और जागने पर एक आत्मरूप हो जाती है, वैसे ही यह सृष्टि भी अज्ञान से नाना