योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1629, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८२६ * योगवाशिष्ठ *
एकार को भासित होती है और ज्ञान में एकरूप भासित होती है । विद्यमान लगती है, पर उसे असत्य हो जाना । आत्मसत्ता सदा शुद्धरूप, शान्त और अनन्त है । उसमें देश, काल और पदार्थ आभासमात्र है ।
जो तुम कहो कि आभासमात्र है तो अर्थक्रिया क्यों होती है ? तो उसका उत्तर यह है कि जैसे स्वप्न में कोई नारी गले में लगती है और उसमे प्रत्यक्ष राग और विषयरस होता है, सो वह आभासमात्र होता है, वैसे ही जाग्रत् में विषय, क्षुधा को अन्न, तृषा को जल और और भी सब ऐसे ही होते हैं, और मन पदार्थ प्रत्यक्ष लगते हैं, पर जो इनका कारण विचारिये तो कारण कोई नहीं मिलता । जिसका कोई कारण न मिले, उसे आभासमात्र जानिये । हे राम ! यह जगत् बुद्धिपूर्वक नहीं बना । आदि में जो आभास जगा है, वह बुद्धिपूर्वक नहीं हुआ । उसमें जब जगत् का संकल्प दृढ़ हुआ है, तब कारण से कार्य भासित होने लगा । परन्तु जिनको स्वरूप का प्रमाद हुआ है, उनको कारण में कार्य दिखने लगे । पर जो आत्मस्वभाव में स्थित हैं, उनका सब जगत् आत्मस्वरूप है । हे राम ! कारण से कार्य तब हो, जब पदार्थ भी कुछ वस्तु हो । जैसे पिता की संज्ञा तब होती है, जब पुत्र होता है, और जो पुत्र ही न हो तो पिता कैसे कहिये ! वैसे ही कारण तब कहिये जब कार्य हो । जो कार्य जगत् ही कुछ नहीं, तो कारण कैसे कहिये ?
हे राम ! कारण और कार्य अज्ञानी के निश्चय में होते हैं । जैसे चरखे पर बालक घूमता है तो उसको सब पृथ्वी घूमती लगती है वैसे ही अज्ञानी को मोह दृष्टि से कारण-कार्यभाव दिखता है, पर ज्ञानी को कारण-कार्य भाव नहीं भासित होता । स्मृति को भी जगत् का कारण तब कहिये, जब स्मृति जगत् से पहले हो । पर स्मृति अनुभव भी जगत् में ही उपजे हैं । ये भी आभासमात्र हैं । परन्तु जिनको प्रतीत हुए हैं उनको वैसे ही हैं । हे राम ! स्मृति, संस्कार और अनुभव ये तीनों आभासमात्र हैं । जैसे सूर्य की किरणों में जल भासित होता है, वैसे ही आत्मा में तीनों भासित होते हैं । इसलिए इस कल्पना को त्यागकर