योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1630, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८२७
जगत् को आभासमात्र जानो। जैसे स्वप्न में घट दिखते हैं, पर उनका कारण मृत्तिका को कहिये तो नहीं बनता, क्योंकि घट और मृत्तिका का आभास इकट्ठा जगा है, इसलिए वे आभासमात्र हुए। उनमें कारण किसे कहिये और कार्य किसे कहिये। वैसे ही स्मृति, संस्कार, अनुभव और जगत् सब इकट्ठे प्रगटे हैं, इनमें कारण किसे कहिये और कार्य किसे कहिये? इसलिए सब जगत् आभासमात्र है।
हे राम! यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह आत्मसत्ता का आभास है; आत्मसत्ता ही इस प्रकार होकर भासित होती है। जैसे नेत्र का खोलना और मूँदना होता है, वैसे ही परमात्मा में जगत् की उत्पत्ति और प्रलय होता है। जब चित्तसंवेदन फुरता है, तब जगत्रूप दिखता है और जब फुरने से रहित होता है, तब जगत् का आभास मिट जाता है। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय में आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है। जैसे खुलना और मूँदना नेत्रों का स्वभाव है वैसे ही फुरना और न फुरना संवेदन के स्वभाव हैं। जैसे चलना और ठहर जाना दोनों वायु के स्वभाव हैं, जब चलती है तब जान पड़ती है और जब नहीं चलती तब नहीं जान पड़ती। चलने में वायु की तीन संज्ञा होती हैं—एक मन्द-मन्द चलती है अथवा बहुत चलती है, दूसरी का शीतल अथवा उष्ण स्पर्श होती है और तीसरी सुगन्ध अथवा दुर्गन्धयुक्त होती है। ये तीनों संज्ञा फुरने में होती हैं। पर जब फुरने से रहित होती है, तब तीनों संज्ञा मिट जाती हैं। जैसे एक ही अनुभव में स्वप्न और सुषुप्ति की कल्पना होती है। स्वप्न में जगत् ही भासित होता है और सुषुप्ति में नहीं भासित होता, परन्तु दोनों में अनुभव एक ही है—वैसे ही संवित् के फुरने से जगत् भासित होता है और ठहरने में अच्युतरूप हो जाता है। पर आत्मसत्ता ज्यों की त्यों एकरूप है। इसलिए जो कुछ जगत् दिखता है, वह आत्मा से भिन्न नहीं, वही रूप है। जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय, तीनों आत्मा के आभास हैं—उनमें आस्था न करना।
हे राम! मैंने इस परम सिद्धान्त का तुमको उपदेश किया है। जिन युक्तियों से कहा है, वैसी कोई नहीं कहेगा। अज्ञानी को संसाररूपी