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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1631, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1631

८२ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊

बड़ी भ्रान्ति उदय हुई है, परन्तु जो मेरे शास्त्र को बारम्बार विचारेगा, उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। दिन के दो भाग करे। आधे दिन तक मेरा शास्त्र विचारे और आधा दिन अपने आचार में व्यतीत करे। जो आधे दिन इस शास्त्र का विचार न कर सके तो एक पहर ही विचारे। जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार निवृत्त होता है, वैसे ही उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। जो मेरे वचनों को वृथा जानकर उनकी निन्दा करेगा, उसको आत्मपद की प्राप्ति न होगी, क्योंकि उसने शास्त्र के तत्त्व को नहीं जाना। जीव का यह कर्तव्य है कि प्रथम और शास्त्रों को विचार ले, फिर पीछे से इसको विचारे, जिसमें उसे इस शास्त्र की महिमा ज्ञात हो। हे राम ! यह मोक्षोपाय शास्त्र आत्म-बोध का परम कारण है। यदि जीव पदपदार्थों का जाननेवाला हो और इस शास्त्र को बारम्बार विचारे तो उसकी भ्रान्ति निवृत्त हो जावेगी। जो सम्पूर्ण ग्रन्थ के आशय को न समझ सके तो थोड़ा-थोड़ा बाँचै और विचारे तो उसको सब समझ पड़ेगा।

हे राम ! यदि मनुष्य कुल भी पदार्थ जानता है तो इसके विचारने और पढ़ने से बुद्धिमान हो जाता है और इस शास्त्र में उसे प्रीति होती है। इसको विचारनेवाले की बुद्धि और शास्त्रों की ओर नहीं जाती, इससे यह विचारने योग्य है। जो पुरुष आत्मविचार से रहित है, उसका जीवन वृथा है। जिनको यह तत्त्व विचार है, उनको सब पदार्थ आत्म-रूप हो जाते हैं । । जो एक साँस भी आत्मविचार से रहित होती है, वह वृथा जाती है। मनुष्य की ऐसी एक साँस के समान सम्पूर्ण पृथ्वी का धन भी नहीं है। यदि एक साँस निष्फल जाय तो फिर माँगे नहीं मिलती। ऐसी साँस को जो वृथा गँवाते हैं, उनको तुम पशु जानो। हे राम ! आयु बिजली की चमक के समान है। जैसे बिजली की चमक तुरन्त मिट जाती है, वैसे ही आयु नष्ट हो जाती है। ऐसे शरीर को पाकर जो सुख की तृष्णा करते हैं, वे महामूर्ख हैं। हे राम ! यह सम्पूर्ण जगत् आभासमात्र है। सत्य लगता है तो भी इसको असत्य जानो जैसे स्वप्न की सृष्टि में कोई मृतक होता है, उसके बान्धव रुदन करते हैं