योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1632, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹ [८२६]
और इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, परन्तु हुआ कुछ नहीं, सब भ्रान्ति-मात्र है, वैसे ही इस जगत् को भ्रममात्र जानो ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थगीतावर्णनं नाम द्विशताधिकैकोनषष्टितमसर्गः ॥ २५६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जगत् तो अनेक और असंख्य हुए हैं और आगे होंगे, पर उन जगतों की कथाओं से आपने मुझे उपदेश करके क्यों न जगाया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये जो जगज्जाल के समूह हैं, उनमें जो पदार्थ हैं, वे सब शब्द-अर्थ से रहित हैं । और जब शब्द-अर्थ से रहित हुए तो कुछ न हुए । इसलिए व्यर्थ कहने का क्या प्रयोजन है । हे राम ! जब तुम विदितवेद्य और निर्मल त्रिकालदर्शी होगे, तब इन जगतों को स्वयं जानोगे । मैंने पहले भी तुमसे बहुत बार कहा है । बारम्बार वही वर्णन करने में पुनरुक्ति दोष होता है । परन्तु समझाने के लिए मैंने ऐसा किया है । जैसे एक सृष्टि को जाना, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टियों को जानो । जैसे अन्न के ढेर में एक मुट्ठी भर को देखकर जान लिया जाता है कि सब दाने ऐसे ही हैं, वैसे ही एक ही सृष्टि का यथार्थ स्वरूप जाना तो सब सृष्टियों को भी जान लिया । हे राम ! यह सब जगत् किसी कारण से नहीं उत्पन्न हुआ । जिसमें कारण बिना पदार्थ भासित हो, उसे जानिये कि वही रूप है । सृष्टि के आदि में भी वही सत्ता थी; अन्त में भी वही होगी और मध्य में जो कुछ दिखता है, उसे भी वही रूप जानिये । स्वप्न के आदि में भी अपना निर्मल अनुभव होता है, स्वप्न के निवृत्त होने पर भी वही रहता है और स्वप्न के बीच जो पदार्थ भासित होता है, उसे भी वही जानिये । और वस्तु कुछ नहीं, अनुभवसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है । जब तुम विदितवेद्य होगे, तब सब जगत् तुमको अपना रूप भासित होगा । हे राम ! एक-एक अणु में अनेक सृष्टियाँ हैं । वे सब आकाशरूप हैं, कुछ हुई नहीं । इस पर एक आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो । एक समय मैंने ब्रह्माजी को एकान्त में पाकर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ये सृष्टियाँ कितनी हैं और किसमें हैं ।