योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1633, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८३० योगवाशिष्ट
तब पितामह ने कहा, हे मुनीश्वर ! सब जगतों के सब शब्द-अर्थ ब्रह्मरूप हैं, ब्रह्म से इतर कुछ नहीं। जो अज्ञानी हैं, उनको नाना प्रकार का जगत् दिखता है, और जो ज्ञानवान् हैं उनको सब जगत् आत्मरूप भासित होता है। जिस प्रकार जगत् हुआ है, वह भी सुनो। हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश के सूक्ष्म अणु में स्फुरण हुआ कि 'अहमस्मि' (मैं हूँ)। तब उस अणु ने अपने को जीव जाना। जैसे अपने स्वप्न में अपने को जीव जाने और सर्वात्मा हो वैसे ही चित् अणु सर्वात्मा अहंकार को अङ्गीकार करके अपने को जीव जानने लगा। उसमें जो निश्चय हो गया, वही बुद्धि हुई। जैसे वायु में स्फुरण होता है, वैसे ही उसमें संकल्प-विकल्परूपी स्फुरण हुआ। उसका नाम मन हुआ। तब मन के साथ मिलकर चितअणु ने देह को चेता और अपने में देह और इन्द्रियाँ भासित होने लगीं। उसने अपने साथ शरीर देखा कि यह शरीर मेरा है। जैसे स्वप्न में अपने साथ कोई शरीर को देखे और बड़ा स्थूल देख पड़े, वैसे ही उसने अपने साथ स्थूल शरीर देखा। जैसे स्वप्न में सूक्ष्म अनुभव से बड़े पर्वत दिखते हैं, वैसे ही सूक्ष्म अणु में स्थूल विराट् शरीर भासित होने लगा। फिर देश-काल की कल्पना की, तब नाना प्रकार के स्थावर-जङ्गम प्राणी और विराट् भासित होने लगा। जैसे स्वप्न में दिखनेवाले देश, काल और पदार्थ कुछ नहीं हैं वैसे ही देश-काल पदार्थ भासित हुए परन्तु हैं कुछ नहीं। जब चित्तसंवित् बहिर्मुख जगती है, तब नाना प्रकार का जगत् दिखता है, और जब अन्तर्मुख होती है, तब अवाच्यरूप हो जाती है। जैसे वायु चलने और ठहरने में एकरूप होती है, वैसे ही फुरने और न फुरने में संवित् एक तथा अभेद है।
हे राम ! सब जगत् आकाश में आकाशरूप अपने आपमें स्थित है और अणु-अणु प्रति सर्वदा सृष्टि है। परन्तु सब आभासमात्र है। जो चेत्य सम्बन्धी होकर जीव सृष्टि का अन्त ले तो सृष्टि अनन्त है। इसका अन्त कहीं नहीं आता। यह सृष्टि अविद्यारूप है। वह अविद्या ही चेत्य है। जब जीव अविद्यासम्बन्धी होकर जगतों का अन्त देखेगा, तब