योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❋ निर्वाण प्रकरण ❋ =३१
अन्त कहीं न आवेगा । किन्तु संस्मरण का नाम संसार है । जब स्वरूप में स्थित होगे, तब सब जगत् ब्रह्मरूप हो जावेगा और जगत् की कल्पना कुछ न भासित होगी । हे राम ! इस जगत् के आदि में भी अद्वैतसत्ता थी, अन्त में भी अद्वैतसत्ता रहेगी और मध्य में जो कुछ दिखता है, उसको भी वही रूप जानो, और कुछ बना नहीं । यह जगत् अकारण है, अधिष्ठानसत्ता के अज्ञान से भासित होता है । इसी का नाम जगत् और इसी का नाम अविद्या है । अधिष्ठान को जानने का नाम विद्या है । हे राम ! न कोई अविद्या है और न जगत् है, ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है । चाहे जगत् कहो और चाहे ब्रह्म कहो, दोनों एक ही वस्तु के नाम हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्माण्डोपाख्यानं नाम द्विशताधिकषष्टितमसर्गः ॥ २६० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह मैंने जाना कि जगत् अकारण है । जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर होता है, वैसे ही यह जगत् है । पर जो अकारण ही है तो अब यहाँ सब पदार्थ कारण से उपजते क्यों देख पड़ते हैं ? कारण बिना तो नहीं होते, फिर ये क्यों भासित होते हैं ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्मसत्ता सर्वात्म है । उसमें जैसे निश्चय होता है, वैसा ही होकर दिखता है । पर क्या दिखता है ? अपना अनुभव ही ऐसे होकर दिखता है । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही नाना प्रकार के पदार्थ होकर दिखता है, परन्तु उपजा कुछ नहीं, सब पदार्थ आकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत् कुछ उपजा नहीं, कारण से रहित आकाश रूप है । हे राम ! आदि सृष्टि अकारण हुई है; पीछे से सृष्टि में आभास-रूप मन ने जैसा-जैसा निश्चय किया है, वैसा ही दिखता है, क्योंकि मन सर्व-शक्तिरूप है । आदि-सृष्टि जो उपजती है, वह अकारणरूप है । पीछे से सृष्टिकाल में कारण-कार्यरूप हुए हैं । जैसे स्वप्न-सृष्टि आदि कारण बिना होती है और पीछे से कारण-कार्य दिखता है, पर वास्तव में न कोई आकाश है, न शून्य है, न अशून्य है, न सत्य है, न असत्य है, न असत्य सत्य के मध्य है, न नित्य है, न अनित्य है, न परम है,