सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1635, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1635

८३२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न अपरम् है, न शुद्ध है, न अशुद्ध है। द्वैत कुछ नहीं, सब भ्रम है। हे राम! ज्ञानवान् को सब शब्द और अर्थ ब्रह्मरूप भासित होते हैं। मुझको तो कारण-कार्य-भाव की कल्पना कुछ नहीं। जैसे सूर्य में अन्धकार का अभाव है, वैसे ही ज्ञानवान् के लिए कारण-कार्य का अभाव है। जो सब आत्मा ही है तो कारण या कार्य किसको कहिये?

राम ने कहा, हे भगवन्! मैं ज्ञानी की बात पूछता हूँ। उनको कारणकार्यभाव किस कारण नहीं भासित होता? जो कारण-कार्य नहीं तो मृत्तिका और कुम्हार आदि द्वारा घटादिक क्योंकर उत्पन्न होते देख पड़ते हैं? बताइये ज्ञानवान् को अकारण कैसे दिखता है और अज्ञानी को सकारण क्योंकर भासित होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई कारण है, न कार्य है और न कोई अज्ञानी है। मैं तुमसे क्या कहूँ? जो ज्ञानवान् पुरुष है, उनके निश्चय में जगत् की कोई कल्पना नहीं फुरती। उनके निश्चय में तो जगत् है ही नहीं। तब ज्ञानी और अज्ञानी क्या? हे राम! आकाश में वृक्ष हो नहीं तो उसका वर्णन क्या कीजिये! जैसे हिमालय पर्वत में अग्नि का कण नहीं पाया जाता, वैसे ही ज्ञानी के निश्चय में जगत् नहीं है। ज्ञानी और अज्ञानी, कारण और कार्य, ये शब्द जगत् में होते हैं। पर जब जगत् ही नहीं उपजा तो कारण, कार्य, ज्ञानी और अज्ञानी तुमसे क्या कहूँ? जैसे स्वप्न की सृष्टि सुषुप्ति में लीन हो जाती है और वहाँ शब्द और अर्थ कोई नहीं फुरता, वैसे ही ज्ञानवान् के निश्चय में जगत् ही नहीं फुरता। हे राम! मुझको तो सब ब्रह्म ही भासित होता है। मुझको कुछ कहना नहीं। परन्तु तुमने पूछा है, इसलिए अज्ञानी के निश्चय को अङ्गीकार करके कुछ कहता हूँ।

हे राम! यह जगत् अकारण और आभासमात्र है; किसी आरम्भ और परिणाम से नहीं हुआ। जब पदार्थों का कारण विचारिये तो सबका अधिष्ठान ब्रह्म ही निकलता है। वह अद्वैत, अच्युत और सब इच्छाओं से रहित है। तब उसको कारण कैसे कहिये? इससे जाना जाता है कि जगत् आभासमात्र है। और कुछ वस्तु नहीं, आत्मसत्ता