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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1636, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1636

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ =३३

ही इस प्रकार भासित होती है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण होती है और उसमें अनेक पदार्थ दिखते हैं, पर उसका कारण विचारिये तो सबका अधिष्ठान अनुभव ही निकलता है । उसमें आरम्भ और परिणाम कुछ नहीं हुआ । सृष्टि अनुभवरूप भासित होती है । जो पुरुष स्वप्न देख रहा है, उसको स्वरूप के प्रमाद से कारण, कार्य, जगत् और पुण्य, पाप सब यथार्थ लगते हैं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् दिखता है । हे राम ! आदि सृष्टि अकारण हुई है । पीछे सृष्टिकाल में कारण-कार्यरूप भासित होते हैं । जिसको अपना वास्तव स्वरूप स्मरण है, उसको अकारण दिखती है और जिस अज्ञानी को अपने वास्तव स्वरूप का प्रमाद है उसको कारण-कार्यरूप सृष्टि भासित होती है । हे राम ! वास्तव में एक ही अनुभव आत्मसत्ता है, परन्तु जैसा-जैसा अनुभव में संकल्प दृढ़ होता है, उसी की सिद्धि होती है, और जिसका तीव्र संवेग होता है, वही होकर दिखता है । इसमें कुछ संदेह नहीं कि कल्पवृक्ष के पदार्थ संकल्प की तीव्रता से प्रत्यक्ष होते हैं । तो उन्हें किसका कार्य कहिये ? यदि जगत् किसी कारण से उत्पन्न होता तो महाप्रलय में भी कुछ शेष रहता—जैसे अग्नि के पीछे राख रह जाती है, पर जगत् के पीछे तो कुछ नहीं रहता । जैसे स्वप्न की सृष्टि जागने पर कुछ नहीं रहती, वैसे ही महाप्रलय में जगत् का शेष कुछ नहीं रहता । इससे जाना जाता है कि यह जगत् आभासमात्र है ।

जैसे ध्यान में ध्याता पुरुष किसी आकार को रचता है तो उसका कारण कोई नहीं होता, वह तो आकाशरूप है और अनुभवसत्ता ही फुरने से इस प्रकार होकर भासित होती है—आकार तो कोई नहीं, और जैसे गन्धर्वनगर कारण से रहित दिखता है, वैसे ही यह जगत् कारण बिना प्रकट हुआ है । न कोई पृथ्वी है, न कोई जल है । न तेज, वायु और आकाश है । सब आकाशरूप है । परन्तु संकल्प की दृढ़ता से पिण्डाकार भासित होते हैं । हे राम ! जब मनुष्य मर जाता है, तब शरीर यहीं भस्म हो जाता है, फिर जीव परलोक में अपने साथ शरीर देखता है और उस शरीर से स्वर्ग-नरक में सुख-दुःख भोगता है,