योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1622, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें*** निर्वाण प्रकरण *** ८१६
जैसे नट स्वाँग भरता है, पर सब स्वाँगों को आभासमात्र जानता है, किसी को सत्य नहीं जानता, पर उससे भिन्न कुछ होता नहीं, वैसे ही मुझको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । अज्ञानी के निश्चय को हम नहीं जानते । जिस प्रकार उसके लिए जगत् शब्द है, उसके उस निश्चय को कोई नहीं जानता । मेरे निश्चय में सब चिन्मात्र है । अज्ञानी को जगत् द्वैतरूप दिखता है और उसे विपर्यय भावना होती है और ज्ञानवान् को चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं भासित होती । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने अनुभव में स्थित होती है और सबका अधिष्ठान अनुभवसत्ता है, परन्तु निद्रादोष से भिन्न-भिन्न भासित होती है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् भिन्न-भिन्न लगता है । पर जो जागे हुए ज्ञानवान् हैं, उनको भिन्न कुछ नहीं भासित होता । उनको न अविद्या, न मूर्खता और न मोह भासित होता है । उन्हें सब अपना रूप ब्रह्म-स्वरूप ही दिखता है । जहाँ कुछ दूसरी वस्तु नहीं बनी, वहाँ स्मृति और अनुभव किसका कहिये ? यह सभी कलना मिथ्या है ।
हे राम ! सब अर्थों का जो अर्थभूत है, सो ब्रह्म है । उसी में सब पदार्थ कल्पित हैं । स्मृति और अनुभव मन में होता है । वह मन आत्मा में ऐसे है, जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है । तो उसमें स्मृति और अनुभव क्या कहिये ? सब कल्पित है । पृथ्वी आदिक तत्त्व आत्मा में कुछ बने नहीं । ब्रह्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है—ज्ञानवान् को सदा ऐसे ही भासित होता है । आभास भी आत्मा में आभास है और कारण-कार्य भाव कभी नहीं भासित होता । जैसे सूर्य को अन्धकार कभी नहीं दिखता, वैसे ही ज्ञानवान् को कारण-कार्यभाव नहीं दिखाई देता । जैसे स्वप्न के आदि में अद्वैतसत्ता होती है और उसमें अकारण स्वप्न की सृष्टि जग जाती है, वैसे ही अद्वैतसत्ता में अकारण आदि सृष्टि प्रकट हुई है । न पृथ्वी है और न कोई दूसरा पदार्थ है, सब चिदाकाशरूप है, और कुछ बना नहीं तो आभासमात्र जगत् में स्मृति की कल्पना कैसे हो ?
इति नि० वर्शननामद्विशताधिकषट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ २५६ ॥